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बजट 2015:फिलहाल उम्मीद ही दी है

2015-16 में यह सकल घरेलू उत्पाद का 3.9 प्रतिशत रहेगा, 2016-17 में यह गिरकर 3.5 प्रतिशत हो जाएगा। फिर आगे 2017-18 में यह और गिरकर 3 प्रतिशत हो जाएगा।

बजट 2015:फिलहाल उम्मीद ही दी है

बजट की सुबह से बजट की दोपहर के बीच कुछ घंटे यूं बहुत खास गुजरे, जिनमें वित्तमंत्री अरुण जेटली ने 2015-16 का बजट पेश किया। पर गौर से देखें, तो बजट भविष्य बेहतर की करने की बात करता है, पर तत्काल कुछ नहीं देता है। बल्कि कुछ लेने के इंतजाम ही करता है। सेवा कर को 12.36 प्रतिशत से बढ़ाकर 14 प्रतिशत कर दिया गया है। मोबाइल से लेकर कोचिंग पढ़ना तक महंगा होगा। वित्त मंत्री ने भरोसा दिलाया है कि वित्तीय घाटा आनेवाले सालों में लगातार कम होगा। 2015-16 में यह सकल घरेलू उत्पाद का 3.9 प्रतिशत रहेगा, 2016-17 में यह गिरकर 3.5 प्रतिशत हो जाएगा। फिर आगे 2017-18 में यह और गिरकर 3 प्रतिशत हो जाएगा।

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घाटा कम होने का मतलब सिर्फ इतना नहीं है कि सरकार की उत्पादकता बढ़ा रही है। इसका एक मतलब यह भी होगा रिजर्व बैंक इस गिरते घाटे को देखकर ब्याज दरों में गिरावट को प्रेरित होगा। ब्याज दरें अगर गिरीं और कार, मकान, बाइक की मासिक किश्त में लगातार कमी आएगी। बजट और आर्थिक सर्वेक्षण ने राष्ट्रीय कृषि बाजार बनाने की बात की है। यह किसानों की हालत को बहुत बेहतर कर सकता है। बजट ने बताया कि अब आर्थिक बेहतरी का मसला सिर्फ केंद्र सरकार के हाथ की बात नहीं रह गया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली के मुताबिक देश के तमाम संसाधनों में 62 प्रतिशत राज्यों के पास होंगे, केंद्र के पास सिर्फ 48 प्रतिशत होंगे। यह बहुत बड़ी बात है। इस सबके परिणाम आएंगे। पर उनके लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा। पर अभी की सचाई यह है कि बजट ने किसी की जेब में कुछ डाला नहीं है। कुछ बचत नहीं करवाई है। ढाई लाख रुपये से पांच लाख रुपये की सेलरी वाले पर टैक्स 10 प्रतिशत ही रहना है, पहले भी इतना ही था। पांच लाख रुपये से 10 लाख रुपये की सेलरीवाले पर टैक्स 20 प्रतिशत ही रहना है, पहले ही इतना ही था।

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दस लाख रुपये से ऊपर की सेलरी वाले पर टैक्स 30 परसेंट ही रहना है, पहले भी इतना ही था। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि आज के जीवन की बुनियादी जरुरतों-रोटी, कपड़ा और मोबाइल में से कुछ भी सस्ता नहीं हुआ है। कंपनियों पर लगने वाले न्यूनतम कर को तीस प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया है। यानी कंपनियों के पास अपने लिए ज्यादा रकम बचेगी। अगर ये रकम कंपनियां नई परियोजनाओं में लगाएं, तो नए प्लांट-फैक्टरी खुलेंगी, इनसे लोगों को रोजगार मिल सकता है।

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रोजगार के मामले में अच्छे दिन आना बहुत ही जरूरी है। भारत में हर महीने दस लाख लोग रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। जितने लोग प्रवेश करते हैं, उतने रोजगार अवसर उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। हाल में आर्थिक सर्वे ने भी स्वीकार किया है कि रोजगार बाजार में आनेवालों की तादाद बहुत ज्यादा है, उनके मुकाबले पैदा होनेवाले रोजगार अवसरों की तादाद कम ही है। रोजगार अवसर बढ़ाने की संभावना है, पर बजट के फौरन बाद नहीं है। दरअसल बजट के फौरन बाद कुछ होने का सीन नहीं हैं। यह सरकार एकाध साल की नहीं, आगे चार सालों की बात कर रही है।

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