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चिंतन: ब्रसेल्स के इस हमले से सबक लें पश्चिमी देश

कुछ दिनों से इस तरह के हमलों की धमकियां सोशल मीडिया में दी जा रही थी, जिन्हें बेल्जियम सरकार ने उतनी गंभीरता से नहीं लिया।

चिंतन: ब्रसेल्स के इस हमले से सबक लें पश्चिमी देश
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बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और एक मेट्रो स्टेशन पर हुए आत्मघाती हमले से एक बार फिर यह साफ हो गया है कि आतंकवाद न केवल गंभीर अंतरराष्ट्रीय समस्या बन चुका है बल्कि इसके समग्र एवं समूल उपचार में जितनी देरी की जाएगी, यह उतना ही भयावह और विनाशकारी होता जाएगा। शुरुआती जांच-पड़ताल में ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि फ्रांस की राजधानी पेरिस में हुए सीरियल धमाकों के आरोपी की कुछ दिनों पहले ब्रसेल्स से हुई गिरफ्तारी से चिढ़कर ताजा हमलों को अंजाम दिया गया है। कुछ दिनों से इस तरह के हमलों की धमकियां सोशल मीडिया में दी जा रही थी, जिन्हें बेल्जियम सरकार ने उतनी गंभीरता से नहीं लिया। गौरतलब है कि पेरिस पर हमला तब किया गया था, जब वहां जलवायु परिवर्तन को लेकर बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन होने वाला था, जिसमें पूरी दुनिया के राष्ट्रप्रमुख पहुंचने वाले थे। अब 30 मार्च को ब्रसेल्स में यूरोपियन यूनियन की अहम बैठक प्रस्तावित है, जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी शिरकत करनी है। पेरिस हमले भी जलवायु परिवर्तन सम्मेलन को रोकने में नाकाम रहे और बेल्जियम सरकार तीस मार्च की इस महत्वपूर्ण बैठक को भी टालने के मूड में नहीं है। और यही उन जमातों को माकूल जवाब है, जो विध्वंसक हमलों के जरिए विकास और शांति के प्रयासों को पलीता लगाकर अलोकतांत्रिक व्यवस्था कायम कर पूरे विश्व को तबाही की तरफ धकेलने के मंसूबे पाले बैठे हैं। ऐसी सूचनाएं मिल रही हैं कि ब्रसेल्स के हमलों में आईएसआईएस की भूमिका हो सकती है। पेरिस में एक पत्रिका के दफ्तर पर हमला करके कई जाने-माने कार्टूनिस्टों और संपादक की हत्या किए जाने के बाद आईएसआईएस ने उसकी जिम्मेदारी लेते हुए आगे भी इस तरह के हमलों को अंजाम देने की धमकी दी थी। यहां यह जानना जरूरी है कि फ्रांस, र्जमनी और ब्रिटेन से सैकड़ों युवकों के सीरिया और इराक जाने तथा वहां से प्रशिक्षण प्राप्त करके वापस लौटने की खबरें पिछले कुछ महीनों में पश्चिमी मीडिया में सुर्खियां बनती रही हैं। वहां की सुरक्षा एजेंसियां भी मानती हैं कि इन देशों के युवाओं के जिस तरह से वहां ब्रेन वाश किए जा रहे हैं, वह यूरोप ही नहीं, समूची दुनिया के लिए गंभीर खतरा है। अमेरिका और यूरोप के कई देशों की फौजें नैटों की छतरी के तले पिछले कई महीनों से सीरिया पर निरंतर हमले कर आईएसआईएस के लड़ाकों और ठिकानों को तबाह करने में लगे हैं। कई महीने पहले रूस ने भी सीरिया पर जमकर बमबारी शुरू की थी, जिसे हाल ही में उसने स्थगित किया है। यह माना जा रहा है कि इन संयुक्त कार्रवाइयों ने आईएसआईएस की बहुत हद तक कमर तोड़ दी है परन्तु अमेरिका और यूरोपीय देशों का यह एक भ्रम भी साबित हो सकता है। आईएसआईएस की जडें़ बेशक सीरिया और इराक में हैं परन्तु उसने सोशल मीडिया के जरिए दुनिया के हर कोने तक अपनी विचारधारा को फैलाकर खासकर युवाओं के दिमागों में खतरनाक तरीके से विषवमन करने में सफलता पा ली है। यही वजह है कि जिन यूरोपीय देशों को आतंकवाद की दृष्टि से सुरक्षित समझा जाता था, अब वहां बड़े हमले हो रहे हैं। ये देश निशाने पर हैं। भारत पिछले पच्चीस साल से आतंकवाद की विभीषिका को झेल रहा है। यूरोप ही नहीं, अमेरिका तक इसकी गंभीरता और भयावहता को समझने को तैयार नहीं था परन्तु अब चूंकि ये सब इसकी आग में झुलस रहे हैं, इसलिए भारत की कही बातों पर उन्हें भरोसा होने लगा है। भारत ने बार-बार यह कहा है कि जब तक आतंक में फर्क बंद नहीं किया जाएगा, तब तक इसे समूल नष्ट नहीं किया जा सकता। अच्छे बुरे के फेर से निकलकर हर तरह के आतंक का खात्मा करना ही होगा।

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