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ब्रिक्स विकास बैंक का गठन अहम परिघटना

यह तथ्य है कि पांचों ब्रिक्स देशों में आर्थिक शक्ति के रूप में चीन का पलड़ा भारी है।

ब्रिक्स विकास बैंक का गठन अहम परिघटना
ब्राजील के फोर्तालेजा शहर में ब्रिक्स देशों रूस, भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के छठे शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स विकास बैंक और रिजर्व फंड के गठन की घोषणा अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य की महत्वपूर्ण परिघटना मानी जा सकती है। यह बैंक ब्रिक्स देशों सहित अन्य विकासशील देशों की विकास संबंधी वित्तीय जरूरतों को पूरा करेगा। हालांकि यह अहम प्रस्ताव बैंक के ढांचे को लेकर सदस्य देशों में मतभेद के कारण गत वर्ष डरबन में सिरे नहीं चढ़ पाया था। यह तथ्य है कि पांचों ब्रिक्स देशों में आर्थिक शक्ति के रूप में चीन का पलड़ा भारी है। वह चाहता था कि विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की तरह ब्रिक्स विकास बैंक की पूंजी पर हक भी सदस्य देशों के जीडीपी के आकार के अनुसार हो।
भारत का तर्क था कि यह व्यवस्था न्यायसंगत नहीं होगी, क्योंकि विश्व बैंक और आईएमएफ के कामकाज का ढांचा भी यही है। इनपर ताकतवर और अमीर देशों का प्रभुत्व है। जिससे तीसरी दुनिया के देशों को उचित भागीदारी नहीं मिल पाती है और कर्ज लेने के लिए उनकी बेजा शर्तों को मानना पड़ता है, जिसकी शिकायत विकासशील देशों को रहती है। लिहाजा इस दोष से ब्रिक्स बैंक को बचाने के लिए सभी देशों की बराबर की हिस्सेदारी होनी चाहिए। अंतत: भारत की बात मानी गई। इस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली अंतरराष्टÑीय बैठक कई मायने में सफल रही। वे इस बैठक में भारत के पक्ष को मजबूती से रखने में सफल रहे। चीन और रूस के राष्टÑपतियों सहित बाकी देशों के प्रमुखों के साथ उनकी अलग से वार्ता द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूती देने में अहम साबित हो सकती है। वहीं नरेंद्र मोदी ने हिंदी में अपनी बात रख कर भारत की सांस्कृतिक पहचान को गौरव प्रदान करने की कोशिश भी की।
अभी ब्रिक्स बैंक को लेकर जो सहमति बनी है, उसके मुताबिक इसका मुख्यालय चीन के शंघाई में होगा और पहला अध्यक्ष भारत से होगा, जिसका कार्यकाल छह साल का होगा। शुरुआत में 50 बिलियन डॉलर की आधार पूंजी होगी, जिसे 100 बिलियन डॉलर तक बढ़ाया जायेगा। इसमें सभी सदस्य देशों की देनदारी बराबर होगी। वहीं 100 बिलियन डॉलर के रिजर्व फंड में चीन 41 बिलियन डॉलर, ब्राजील, भारत व रूस 18-18 बिलियन डॉलर और दक्षिण अफ्रीका 5 बिलियन डॉलर जमा करेंगे। ये दोनों संस्थाएं विश्व बैंक व आईएमएफ का प्रतिद्वंद्वी न होकर उनकी पूरक होंगी और इनका कार्यक्षेत्र वैश्विक होगा।
यह बैंक ब्रिक्स देशों सहित विकासशील देशों में विकास कार्य के लिए भी वित्तीय सहायता मुहैया कराएगा। उम्मीद है, भारत को सड़क, रेल, बंदरगाह जैसे ढांचागत निर्माण कार्यों के लिए वित्त की कमी जैसी बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि आने वाले दिनों में ढांचागत विकास के लिए भारी पूंजी की जरूरत होगी। वहीं विदेशी पूंजी के पलायन से देश के पूंजी बाजार में मचने वाली अफरा-तफरी से भी बचा जा सकेगा। पश्चिमी देशों में इसको लेकर हलचल है, क्योंकि यदि यह बैंक कामयाब हो जाता है तो दुनिया का वित्तीय संतुलन बदल जाएगा। अब सब कुछ ब्रिक्स देशों के परिश्रम, सहयोग और कौशल पर निर्भर है।
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