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नीतीश कुमार के इस्तीफा के राजनीतिक मायने

नीतीश कुमार लोकसभा में पार्टी के खराब प्रदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए शनिवार को इस्तीफा दे था।

नीतीश कुमार के इस्तीफा के राजनीतिक मायने
लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद देश की राजनीति तो बदली ही है साथ ही साथ राज्यों की राजनीति पर भी इसका प्रभाव दिखाई देने लगा है। कई राज्यों में सियासी हलचल मची है, कहीं पार्टी टूटने का डर है तो कहीं राजनीति नई शक्ल अख्तियार करती दिख रही है। पहला उठापठक बिहार में देखने को मिला है। बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के नेता नीतीश कुमार लोकसभा में पार्टी के खराब प्रदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए शनिवार को इस्तीफा दे दिया। हालांकि उन्होंने विधानसभा भंग करने की सिफारिश नहीं की और वैकल्पिक सरकार बनाने का रास्ता छोड़ दिया। मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल अगले वर्ष नवंबर मेंखत्म होगा। दरअसल, लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की लहर ने कई क्षेत्रीय दलों के सामने गंभीर संकट पैदा कर दिया है। उत्तर प्रदेश में जहां बसपा का सूफड़ा साफ हो गया और सपा कुछ सीटों पर सिमट गई है, वहीं बिहार में नीतीश कुमार की पार्टी दो सीटों का आंकड़ा ही छू पाई है, जबकि पिछली बार इसे 20 सीटें मिली थीं। यही हाल राजद और कांग्रेस की भी है। हालांकि लोकतंत्र में हार जीत कोई नई बात नहीं होती। यह उसका हिस्सा होता है, परंतु इसके बावजूद भी नीतीश कुमार को यह कदम क्यों उठाना पड़ा? क्या इसके राजनीतिक मायने भी हैं? क्योंकि भाजपा इसे नौटंकी करार दे रही है। दरअसल, जदयू में अंदर ही अंदर विधायकों में बड़े पैमाने पर असंतोष है। आने वाले दिनों में नीतीश कुमार के लिए ये बड़ी समस्या बनने वाले हैं। यह असंतोष उनकी कार्यशैली और रवैये को लेकर भी है। वहीं इसकी दूसरी वजह पिछले साल भाजपा द्वारा नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने के मुद्दे पर सत्रह वर्षों के राजग गठबंधन से अलग होने का उनका फैसला भी है। ऐसा आरोप हैकि नीतीश ने मनर्मजी से यह कदम उठाया था। हालांकि जिस मकसद के लिए नीतीश ने वह फैसला लिया था उसमें उन्हें कामयाबी नहीं मिल सकी। विधायकों का यहां तक मानना हैकि उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप ही लोकसभा में जदयू की करारी हार हुई है, जिसकी कल्पना नीतीश ने भी नहीं की होगी। जदयू के विधायक मान रहे हैं कि विधानसभा का चुनाव होने पर नीतीश कुमार उन्हें रिपीट भी नहीं करेंगे। उन्हें यह भी लग रहा है कि जनता भाजपा की नीतियों व कार्यक्रमों में रुचि ले रही है। अब नरेंद्र मोदी के देश का प्रधानमंत्री बन जाने के बाद बिहार में भी भाजपा बड़ी शक्ति बन कर उभरेगी। इस तरह की खबरें पहले ही आ रही थीं कि जदयू के करीब 50 विधायक भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के संपर्क में हैं। यदि यह सही है तो इसमें कोई दो राय नहीं कि बिहार की सरकार कभी भी गिर सकती थी। यही वजह हैकि नीतीश कुमार को यह नौटंकी करनी पड़ी। उन्हें नैतिकता का सहारा लेना पड़ा। उन्होंने बड़ी चतुराई से असंतोष को दबाने के लिए इसका उपयोग किया है। इस प्रकार वे एक नैतिक मानदंड दे कर अपनी पार्टी की संभावित टूट को बचाना चाहते हैं। पूर्व जदयू नेता साबिर अली ने कहा हैकि इससे वे भले ही अपनी पार्टी के ऊपर आए संकट को कुछ दिनों के लिए टाल दें, परंतु ज्यादा दिनों तक इस आक्रोश को दबाए नहीं रख पाएंगे।
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