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यूरोप में अलफांसो पर पाबंदी के निहितार्थ

भारत से होने वाले आम के निर्यात में खाड़ी देशों का हिस्सा करीब 20 फीसदी है।

यूरोप में अलफांसो पर पाबंदी के निहितार्थ
यूरोपीय यूनियन (ईयू) द्वारा विश्व प्रसिद्ध भारतीय अलफांसो आम सहित पांच भारतीय सब्जियों बैंगन, अरबी, करेला, ककड़ी और चिचिण्डा में कीड़े पाए जाने का हवाला दे कर आगामी एक मई से इनके आयात पर पाबंदी लगाना चिंताजनक है। इससे देश में फलों और सब्जियों के रख-रखाव और पैकेजिंग के तौर-तरीकों पर एक बार फिर प्रश्न चिह्न् लग गया है। जाहिर है, ऐसे समय में जब देश के निर्यातकों और अर्थव्यवस्था को रुपये के अवमूल्यन से फायदा हो रहा है तब यह प्रतिबंध सैकड़ों निर्यातकों के लिए आर्थिक हानि का बड़ा सबब बन सकता है। हालांकि, भारत से यूरोप के 28 देशों में आयात होने वाले कुल फल और सब्जियों में इनकी हिस्सेदारी मात्र पांच प्रतिशत ही है, परंतु अब भारतीय निर्यातकों के सामने नया बाजार खोजने की चुनौती होगी।
खाड़ी देश एक विकल्प नजर आ रहे हैं। क्योंकि भारत से होने वाले आम के निर्यात में खाड़ी देशों का हिस्सा करीब 20 फीसदी है, लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं है। यूरोपीय यूनियन ने प्रतिबंध लगाने का फैसला पौधों के स्वास्थ्य से जुड़ी अपनी स्थायी समिति की पहल पर लिया है। उसका कहना है कि समिति ने गत वर्ष ही भारत से आयातित फलों और सब्जियों की कई खेपों को फलों पर लगने वाले कीटों से दूषित पाया था। उसी के मद्देनजर यह कदम उठाया गया है। हालांकि यह प्रतिबंध अस्थायी है और यूरोपीय यूनियन इसकी समीक्षा 31 दिसंबर, 2015 के पहले करेगा। उससेपहले ही देश में फलों व सब्जियों के रख-रखाव के तरीकों और उनकी गुणवत्ता की जांच में जरूरी बदलाव करने होंगे।
अब जबकि यूरोप में अलफांसो आम की सप्लाई नहीं होगी तो ये भारतीय बाजारों में पहुंचेंगी। इससे कीमतों में कमी आएगी। लिहाजा घरेलू उपभोक्ताओं को लाभ हो सकता है। ब्रिटेन ही हर साल भारत से 1.6 करोड़ आमों का आयात करता है। वहां इसका बाजार करीब 62 करोड़ रुपये का है। दरअसल, यूरोपीय यूनियन ने विभिन्न देशों से आयात होने वाले फलों और सब्जियों के लिए कड़े दिशा-निर्देश बनाए हैं। ऐसा उसने यूरोपीय देशों में पर्यावरण और कृषि की सुरक्षा की दृष्टि से किया है। साथ ही ये फलों को स्वच्छ, स्वास्थ्यप्रद और टिकाऊ बनाए रखने में भी मददगार साबित हो रहे हैं।
सभी निर्यातक देशों को इन मानकों पर खरा उतरना जरूरी है। वहीं भारत में महाराष्ट्र अलफांसो आम का प्रमुख उत्पादक है। यहां के रत्नागिरि और देवगढ़ इलाके को इसके लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। यूरोपीय यूनियन के नये दिशा-निर्देशों के मुताबिक अलफांसो का निर्यात करने के लिए आम को पेड़ से तोड़ने के बाद प्रमाणित पैक हाउस में कई प्रक्रियाओं से गुजारना होता है। महाराष्ट्र में इस समय दो ही प्रमाणित पैक हाउस हैं। इनकी क्षमता इतनी नहीं है कि वह निर्यात किए जाने वाले आमों की पूरी फसल का परीक्षण कर सकें। भारत की मुख्य समस्या यही है। और यह समस्या लगभग हर क्षेत्र में है। आखिर क्यों हम जरूरत के अनुसार अपनी क्षमता का विकास नहीं कर पाते हैं? निर्यात में तेजी लानी है तो सरकार को इस पर समय रहते ध्यान देना होगा।
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