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विकास में बाधक बन रहा विपक्ष का रवैया

लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन भी संसद के अंदर उसके सांसदों के व्यवहार से आहत हैं।

विकास में बाधक बन रहा विपक्ष का रवैया
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संसद का मानसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ता हुआ नजर आ रहा है। देश के विकास और सुरक्षा आदि के मुद्दों पर उम्मीद की जाती है कि सभी पार्टियां मतभेदों को भुलाकर एकजुटता दिखाएंगी, लेकिन लगता है कि सियासी लाभ के लिए विपक्ष खासकर कांग्रेस ने देश के विकास को ही दांव पर लगा दिया है। वह उस बिल का विरोध कर रही है जिसको सत्ता में रहते समय स्वयं पारित कराना चाहती थी।

हालांकि तब वह सभी राज्यों व दलों के बीच एक आम राय नहीं बना पाई थी जिससे उसे इसमें सफलता नहीं मिली। गत वर्ष एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद इस पर पूरे देश में एक आम सहमति बनी है, लिहाजा वह इसे जल्द से जल्द कानून का रूप देना चाहती है। इसमें कोई दो राय नहीं की वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी को कानून का रूप देना बेहद जरूरी हो गया है। देश में कर सुधारों से जुड़े इस बिल को बहुत पहले ही संसद की मंजूरी मिल जानी चाहिए थी, लेकिन कई कारणों से इसमें विलंब होता गया है।

इसे दोनों सदनों की सलेक्ट कमेटियों ने बारी बारी से मंजूरी दे दी है, लोकसभा में पहले ही पारित हो गया है, लिहाजा राज्यसभा में रोक कर रखना देश का अहित होगा। यदि राज्यसभा से इसे मंजूरी मिल जाती है तो केंद्र और राज्यों के स्तर पर लगने वाले सभी अप्रत्यक्ष कर खत्म हो जाएंगे और उनकी जगह पर पूरे देश में वस्तुओं और सेवाओं पर सिर्फ एक कर लगेगा। कर का एकसमान ढांचा होने से समूचा देश एक बाजार में तब्दील हो जाएगा। इससे महंगाई कम होगी, कर की वसूली बढ़ेगी, कारोबार आसान होगा, तो जाहिर है कि अर्थव्यवस्था का भी विकास होगा। अभी हर राज्य में कर की दरें अलग अलग हैं।

वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि जिस तरह से आजादी मिलने के बाद देश का राजनीतिक रूप से एकीकरण हुआ था, ठीक उसी तरह से जीएसटी देश को आर्थिक रूप से एकीकृत करेगा। दरअसल, यह संविधान संशोधन बिल है जिसे पारित करने के लिए सदन में दो तिहाई बहुमत होना जरूरी है। एनडीए सरकार के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है, इसका फायदा कांग्रेस उठा रही है। लगता है कि वह संख्याबल के जरिए बिल को रोकना चाह रही है, लेकिन उसे ध्यान रखना होगा कि इस तरह वह देश के विकास में बाधक भी बन रही है। क्योंकि उसे और वामपंथी दलों को छोड़कर बाकी सभी पार्टियां इसके पक्ष में हैं और राज्यसभा से पास करने में सरकार का साथ देने को राजी हैं।

बाकी दलों के सरकार के साथ आने से कांग्रेस अलग थलग पड़ती नजर आ रही है। दूसरे दल तो अब खुलकर कहने भी लगे हैं कि वे सदन में चर्चा करना चाहते हैं, हंगामा नहीं चाहते हैं। पूरा देश देख रहा है कि संसद का मानसून सत्र कांग्रेस के जिद के कारण किस तरह ठप है। अब तो यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या सुषमा स्वराज के बहाने उसकी मंशा जीएसटी को रोकना तो नहीं है? संसद की र्मयादा को ठेस पहुंचाने के लिए 25 सांसदों के निलंबन से भी कांग्रेस कुछ सीखती दिखाई नहीं दे रही है।

लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन भी संसद के अंदर उसके सांसदों के व्यवहार से आहत हैं। मंगलवार को उन्होंने अपना दुख जाहिर करते हुए कहा कि पूरे देश को संसद के अंदर विपक्षी सांसदों के आचरण को दिखाया जाना चाहिए। उन्होंने यहां तक कहा कि 40 सांसद बाकी सांसदोंका हक मार रहे हैं। यह लोकतंत्र की हत्या है। जाहिर है, कांग्रेस मोदी सरकार के विरोध के क्रम संवैधानिक पदों का अपमान तो कर ही रही है, देशहित को भी चोट पहुंचाती प्रतीत हो रही है।

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