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हकीकत से मुंह मोड़ने की कांग्रेसी रवायत

केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि असम में हिंसा भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के कारण हुआ है।

हकीकत से मुंह मोड़ने की कांग्रेसी रवायत
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किसी समस्या से मुंह फेर लेने का नतीजा क्या होता है असम की हिंसा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहां हिंसा में अब तक तीस से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और बड़ी संख्या में लोगों का पलायन हो रहा है। असम की मुख्य समस्या बांग्लादेशी नागरिकों की अवैध घुसपैठ है, परंतु पिछले दस वर्षों में न तो केंद्र सरकार और ना ही राज्य सरकार ने कभी इस समस्या को सुलझाने में दिलचस्पी दिखाई। और अब कांग्रेसी नेता दंगे पर अपनी संकीर्ण राजनीति का ही परिचय दे रहे हैं। दरअसल, केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि असम में हिंसा भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के कारण हुआ है। इसे एक तरह से हकीकत से मुंह मोड़ने और अपनी नाकामी को छिपाने का सत्तापक्ष का प्रयास ही कहा जाएगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस चुनावों में हिंसा का सियासी लाभ लेने की कोशिश कर रही है। यह समाधान का रास्ता नहीं है। भला असम की हिंसा से नरेंद्र मोदी का क्या लेना देना है? उन्होंने तो अपनी रैलियों में वहां की समस्याओं का ही जिक्र किया है, जिससे वहां की कांग्रेसी सरकार वर्षों से आंखें मूंदी हुई है। यह कोई अपराध नहीं है। दरअसल, इस समस्या के मूल में बांग्लादेशी नागरिकों को वोट बैंक के रूप में देखा जाना भी है और इसमें कोई दो राय नहीं कि कुछ दलों को इसका फायदा भी मिलता रहा है। लिहाजा वे इस समस्या को दूर करने और बाग्लादेश से आ रहे घुसपैठियों पर लगाम लगाने तथा जल्द से जल्द उनकी पहचान कर उन्हें वापस भेजने में दिलचस्पी नहीं ले रही हैं। इस घुसपैठ से असम के मूल नागरिकों के मन में एक तरह से असुरक्षा की भावना पैदा होना लाजमी है, उनकी इस आशंकाओं को दूर करने की अभी तक कोई बड़ी कोशिश नहीं हुई है। यहां तक कि उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं कि सरकार पड़ोसी देश बांग्लादेश से आए नागरिकों की पहचान कर उन्हें वापस उनके वतन भेजे जाने का प्रबंध करे, परंतु न तो केंद्र सरकार और ना ही राज्य सरकार इसे ज्यादा तवज्जो दे रही है। यह स्थिति तब हैजब केंद्र और राज्य दोनों में कांग्रेस की सरकार है। यहां तक कि प्रधानमंत्री भी राज्यसभा के सांसद के रूप में असम से ही चुनकर आए हैं। क्या कारण हैकि गुजरात में कथित महिला जासूसी कांड की जांच कराने और नये सेनाध्यक्ष की नियुक्ति के लिए तत्पर कांग्रेस इसको सियासत से जोड़ रही है। इस तरह वह इस मुद्दे और अपनी नाकामी से देश का ध्यान भटकाती प्रतीत हो रही है। बांग्लादेशी नागरिकों के कारण उपजी समस्याओं का समय से समाधान नहीं करने से ही असम में बार-बार हिंसा भड़कती है। इसके पहले 2012 में बड़े पैमाने पर हिंसा भड़की थी, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे और करीब चार लाख लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा था। उस समय राज्य और केंद्र सरकार ने देश से ढेर सारे वादे किए थे, लेकिन उन्हें धरातल पर उतारने के लिए कुछ नहीं किया गया। इससे उसकी मंशा पर भी सवाल खड़ा होता है। इससे तो यही लगता हैकि कांग्रेस घुसपैठियों को असम में ही रहने देने ही हिमायती है?

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