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कई सवाल छोड़ गर्इं अरुणा शानबाग

अरुणा शानबाग अब हमारे बीच नहीं हैं। इंसानी क्रूरता किसी हंसती-खेलती जिंदगी को किस हद तक तबाह कर सकती है, उसकी वह मिसाल थीं।

कई सवाल छोड़ गर्इं अरुणा शानबाग

अरुणा शानबाग अब हमारे बीच नहीं हैं। इंसानी क्रूरता किसी हंसती-खेलती जिंदगी को किस हद तक तबाह कर सकती है, उसकी वह मिसाल थीं। भारत में इच्छा मृत्यु पर छिड़ी बहस का चेहरा बनीं अरुणा को पिछले सप्ताह न्यूमोनिया के गंभीर संक्रमण के बाद जीवनरक्षक प्रणाली पर रखा गया था। वह पिछले 42 साल से कोमा में थीं। इस दौरान वे जिस पीड़ा से गुजरीं उसे बयां तो कभी नहीं कर पार्इं, लेकिन उनके आसपास मौजूद लोगों ने खूब महसूस किया। उनका दर्द दूर करने के लिए कोर्ट से मदद मांगी गई, लेकिन राहत नहीं मिली। देश का सिस्टम भी उनके प्रति उदासीन रहा। पीड़ा की घड़ी में एक-एक कर सभी नाते रिश्तेदार उनका साथ छोड़ गए। जाहिर है, अंत-अंत तक वे हमारे समाज और कानून व्यवस्था के समक्ष एक सवाल के रूप में मौजूद रहीं।

टकराव नहीं संवाद के रास्ते पर चलें केजरीवाल

अरुणा ने तो पेशा के रूप में मानव सेवा का लक्ष्य चुना था पर जिंदगी को कुछ और ही मंजूर था। वे बड़े अरमानों के साथ मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में नर्स के पेशे से जुड़ी थीं। वहीं काम कर रहे एक वार्ड ब्याव को उसके लापरवाह रवैये के लिए डांटना भारी पड़ गया। एक दिन उसने क्रूरता की सारी हदें पार कर दी। उसने अरुणा का बलात्कार करने की कोशिश के दौरान कुत्ता बांधने वाली चेन से उनके गले को बांध दिया। गला ऐसे कसा कि अरुणा के मस्तिष्क का रक्त प्रवाह ही रुक गया। वह कोमा में चली गर्इं। वे अस्पताल के बेसमेंट में घंटों पड़ी रहीं। अंतत: खोज खबर के बाद इलाज के लिए उसी अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन अच्छे से अच्छा इलाज भी उन्हें कोमा से बाहर न निकाल सका। तब से अरुणा शानबाग एक जिंदा लाश के रूप में वार्ड नंबर चार की स्थाई मरीज बन गई थीं। उस घटना से अरुणा को इतना गहरा सदमा लगा था कि वे किसी पुरुष की आवाज से भी घबराने लगी थीं। अपनों के छोड़ने के बाद उनकी सेवा का बीड़ा अस्पताल की नर्सों और अन्य स्टाफ ने उठाया। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने उनकी प्रशंसा भी की थी। हालांकि, वह वार्ड ब्याव पकड़ा गया, सजा भी हुई।

विवादित मुद्दों को परे रख भरोसा बहाली की कोशिश

हमले और लूटपाट के लिए सात साल की दो सजाएं साथ-साथ चलीं, लेकिन बलात्कार, यौन उत्पीड़न या कथित अप्राकृतिक यौन हमले के लिए उसे सजा नहीं मिली। अरुणा की पीड़ा और असहाय कष्ट को देखते हुए उनकी दोस्त व संरक्षक पिंकी वीरानी ने 2011 में सुप्रीम कोर्ट में उनकी मृत्यु के लिए आवेदन किया, लेकिन तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय बेंच ने अंतत: इस मांग को ठुकरा दिया। हालांकि उन्होंने देश में पैसिव यूथनेशिया के लिए दिशा-निर्देश जारी किया। आखिरकार सोमवार को अरुणा के संघर्ष ने भी जवाब दे दिया और उन्होंने इस दुनिया को विदा कह दिया, लेकिन वे जाते-जाते कुछ ज्वलंत प्रश्न छोड़ गई हैं। मसलन देश का सिस्टम पीड़िता के प्रति मानवता क्यों नहीं दिखाता है? अरुणा का गुनाहगार सात साल बाद रिहा होकर आराम की जिंदगी गुजारता रहा, तो अरुणा इतने साल किस बात की सजा भुगती? साथ ही असहनीय पीड़ा और लाइलाज बीमारियों से जूझ रहे लोगों को इच्छा मृत्यु की इजाजत मिले, क्या इस पर गंभीर और तर्कपूर्ण बहस की जरूरत नहीं है?

द्विपक्षीय रिश्तों को नया आयाम देने की कोशिश

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