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चिंतन: अफगानिस्तान की संसद पर आतंकी हमला दुखद

सुरक्षाबलों की जवाबी कार्रवाई में सभी सात आतंकी मार गिराए गए। यह घटना सुरक्षा व्यवस्था में एक बड़ी चूक की ओर भी इशारा कर रही है।

चिंतन: अफगानिस्तान की संसद पर आतंकी हमला दुखद
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अफगानिस्तान में इन दिनों जिस तरह से आतंकवादी घटनाएं बढ़ी हैं, वह चिंताजनक है। ऐसा लग रहा है कि अमेरिका की वापसी के बाद आतंकवादी बेखौफ होते जा रहे हैं। सोमवार को अफगानिस्तान की संसद के बाहर हुए नौ धमाकों से पूरा काबुल दहल गया। आतंकियों के हौसले इस कदर बढ़ गए हैं कि वे सबसे सुरक्षित संसद तक को निशाना बनाने से नहीं घबरा रहे हैं। हालांकि सुरक्षाबलों की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने तुरंत मोर्चा संभाल लिया और एक बड़ी अनहोनी टल गई। क्योंकि बताया जा रहा है कि आतंकी बड़ी तैयारी के साथ आए थे। सुरक्षाबलों की जवाबी कार्रवाई में सभी सात आतंकी मार गिराए गए। यह घटना सुरक्षा व्यवस्था में एक बड़ी चूक की ओर भी इशारा कर रही है। आमतौर पर संसद भवन के आसपास मजबूत सुरक्षा घेरा रहता है। ऐसे में सवाल उठता हैकि इसके बावजूद आतंकी वहां कैसे घुस गए? बहरहाल, इस हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन तालिबान ने ली है। हाल के दिनों में तालिबान अफगानिस्तान में लगातार हिंसक घटनाओं को अंजाम दे रहा है। पिछले महीने में ही उसने काबुल के डिप्लोमैटिक एरिया, गेस्ट हाउस और हवाई अड्डे के पास यूरोपीय संघ के काफिले पर बड़ा हमला किया था। जिसमें दर्जनों लोगों की जान चली गई थी। आतंकी घटनाओं की बढ़ती संख्या पर विशेषज्ञों का कहना है कि आतंकी अफगानिस्तान में अमन नहीं आने देना चाहते हैं। प्रधानमंत्री अशरफ गनी तालिबान से वार्ता कर समस्या को सुलझाना चाहते हैं। दोनों पक्षों के बीच कुछ दौर की बातचीत हुई भी है, लेकिन माना जा रहा हैकि तालिबान का एक गुट और दूसरे आतंकी समूह इससे खुश नहीं हैं। वे तनाव बढ़ाने के लिए हिंसा फैला रहे हैं। कईएजेंसियां तालिबान को भड़काने में पाकिस्तान के आईएसआई की भी भूमिका देख रही हैं। क्योंकि पाक को लग रहा हैकि यदि अफगानिस्तान में शांति कायम हुई तो उसका सबसे ज्यादा फायदा भारत को होगा। दोनों के संबंध और मजबूत होंगे तो वह हाशिए पर चला जाएगा। जिसकी वजह से वह अमन कायम नहीं होने देना चाहता है। जाहिर है, जब वार्ता की प्रक्रिया चल रही है और शांति के मार्ग खोजे जा रहे हैं तब इस तरह के हमले दुखद हैं। हालांकि यह भी सच हैकि अमेरिका की लंबी मौजूदगी और सैन्य कार्रवाई के बाद भी तालिबान कमजोर नहीं हुआ है। अमेरिका की वापसी के बाद अफगानिस्तान में पैदा हुए सुरक्षा संकट का फायदा उठाते हुए तालिबान ने अपना पैर फैलाना आरंभ कर दिया है। अफगानिस्तान अलकायदा का भी गढ़ रहा है। इन दिनों वह भी अपनी शक्तियों को बढ़ाने में लगा है। अभी कुछ ही दिन हुए हैं जब वहां दुनिया के खूंखार आतंकी संगठन आईएसआईएस की दस्तक देने की खबरें आई थीं। करीब-करीब ऐसी ही स्थिति इस समय पाकिस्तान में है। भारत इन दोनों देशों में शांति और स्थिरता देखना चाहता है, लेकिन इन घटनाओं को देखकर तो ऐसा प्रतीत होता है कि आने वाले दिनों में अफगानिस्तान आतंकवादियों का एक बार फिर पड़ाव बन जाएगा। एशियाई देशों, खासकर भारत, के लिए यह दोहरे चिंता की बात है, क्योंकि यह इन दोनों देशों के पड़ोस में स्थित है।
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