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लोकतंत्र की राह पर आगे बढ़ता अफगानिस्तान

यह चुनाव उसके भविष्य और बाकी दुनिया की कूटनीति को भी बहुत हद तक प्रभावित करेगा।

लोकतंत्र की राह पर आगे बढ़ता अफगानिस्तान
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अफगानिस्तान की जनता द्वारा तीसरे राष्ट्रपति और प्रांतीय चुनावों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना दिखाता हैकि उनका लोकतंत्र में विश्वास बढ़ रहा है। वे बुलेट से नहीं बल्कि बैलेट से समस्याओं का समाधान चाहते हैं। तालिबानियों की ओर से वहां के लागों को चुनावों में हिस्सा न लेने के लिए बड़े पैमाने पर धमकी दी गई थी। यदि वहां की चुनाव प्रक्रिया सफल रहती है तो यह ऐतिहासिक सफलता होगी, क्योंकि आधुनिक इतिहास में अफगानवासी पहली बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया से अपना नेता चुनेंगे। इससे निश्चित रूप से वहां लोकतंत्र को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
अफगानिस्तान में कुल मतदाताओं की संख्या एक करोड़ बीस लाख है। चुनाव में कुल आठ उम्मीदवार मैदान में हैं। जिससे चुनाव प्रक्रिया जटिल हो गई है। माना जा रहा है कि तीन प्रमुख उम्मीदवारों में वोट बंट सकता है। यदि ऐसा होता है तो किसी भी प्रत्याशी को जरूरी पचास फीसदी मतदान नहीं मिल पाएगा। दरअसल, वहां के संविधान के अनुसार किसी एक उम्मीदवार को कुल मतों का 50 फीसदी मत मिलना जरूरी होता है तभी उसे विजेता घोषित किया जाएगा। यदि किसी को भी पचास फीसदी या उससे ज्यादा मत नहीं मिलते तब 28 मई के बाद वहां दोबारा मतदान कराना पड़ेगा।
वर्तमान राष्ट्रपति हामिद करजई की सरकार में शामिल रहे अशरफ गनी, 2009 के चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे पूर्व विदेश मंत्री अब्दुल्ला अब्दुल्ला और पूर्व विदेश मंत्री जलमे रसूल राष्ट्रपति पद के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। वर्तमान में अफगानिस्तान पर समूचे विश्व की निगाहें हैं, क्योंकि वह दुनिया की भू-राजनीति का केंद्र बना हुआ है। दरअसल, अफगानिस्तान एक दशक से आतंकवाद से लड़ाईका केंद्र बना हुआ है।
यह चुनाव उसके भविष्य और बाकी दुनिया की कूटनीति को भी बहुत हद तक प्रभावित करेगा। वहीं अफगानिस्तान की नई सरकार के सामने भी ढेरों चुनौतियां होंगी। गरीबी, बेरोजगारी, कमजोर स्वास्थ्य सेवाएं प्रमुख समस्याएं हैं। सबसे बड़ी समस्या तो सुरक्षा की है। अब यह भी कहा जा रहा हैकि तालिबान दूर-दराज के इलाकों में पांव पसार रहा है। वहीं आतंकवाद के खिलाफ पिछले 13 साल से संघर्ष कर रहे अमेरिका के नेतृत्व वाली विदेशी सेनाएं अफगानिस्तान छोड़ने की तैयारी में हैं। क्योंकि मौजूदा राष्ट्रपति करजई ने अमेरिका के साथ द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग संधि करने से इंकार कर दिया है।
अब अमेरिका नए राष्ट्रपति से उम्मीद लगाया हैकि मई के बाद आने वाली सरकार उससे संधि कर लेगी जिससे विदेशी सैनिकों को वहां रहने की अनुमति मिल जाएगी, परंतु विशेषज्ञों का मानना है कि अफगानिस्तान की नई सरकार पर भी करजई का प्रभाव बना रह सकता है। इस तरह करजई तालिबानियों की सहानुभूति लेना चाहते हैं। अब देखना है कि नए राष्ट्रपति कैसे बीच का रास्ता निकालते हैं और अफगानिस्तान में लोकतंत्र को बचाए रखते हैं।
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