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भारत में बदले हालात को समझे पाकिस्तान

बीते सोमवार को भारत में पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने अलगाववादी हुर्रियत नेताओं से मुलाकात की।

भारत में बदले हालात को समझे पाकिस्तान
कूटनीति के संबंध में यह आम धारणा है कि देश में सरकारें बदल जाती हैं पर विदेश नीति में अधिकतर निरंतरता बनी रहती है, परंतु इसके साथ यह भी सच है कि इसमें हर प्रधानमंत्री अपनी एक छाप छोड़ता है। देश के मौजूदा नेतृत्व का असर भी विदेश नीति पर साफ दिखाई दे रहा है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को अपने शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने का न्यौता भेजा था, तब उन्हें यह खास संदेश भी दे दिया था कि वे अपनी यात्रा में अलगाववादी ताकतों से न मिलें। शरीफ ने इस बात को समझा था और अलगाववादी ताकतों से नहीं मिले थे। तबसे उम्मीद की जा रही थी कि पाकिस्तान आगे भी इस बात का खयाल रखेगा, परंतु उसने बात नहीं समझी और भारत पाक सचिव स्तरीय वार्ता से ठीक पहले बीते सोमवार को भारत में पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने अलगाववादी हुर्रियत नेताओं से मुलाकात की। भारत की भावनाओं से खिलवाड़ करने वाले इस कदम के बाद वार्ता स्थगित होनी स्वाभाविक है। पाक ने करीब दो दशक पहले इस तरह की हिमाकत की शुरुआत की थी। उसके बाद वह इस गलती को बार-बार दोहराता रहा पर किसी ने टोका नहीं। अब प्रधानमंत्री मोदी ने अपने रुख से स्पष्ट कर दिया है कि यह दस्तूर नहीं चलेगा। क्योंकि कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है और कश्मीर के मुद्दे पर कोई भी मुलाकात हमारे अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप है। दरअसल, पाकिस्तान अभी भी भारत के बदले हुए राजनीतिक हालात को समझ नहीं पा रहा है। और यही वजह है कि जो गलतियां वह अब तक करता आ रहा था, उन्हीं को दोहरा रहा है। भारत का संदेश साफ है कि पाक को आतंकवादियों और अलगाववादियों को शह देना बंद करना होगा। अगर वह द्विपक्षीय मुद्दों पर गंभीर चर्चा करना चाहता है तो उसे भारत की चिंताओं का सम्मान करना होगा। भारत अपने पड़ोसियों के साथ रिश्ते सुधारना चाहता है। इसका सबूत वह कई बार दे चुका है। देश के नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसका संकेत अपने शपथ ग्रहण समारोह में पाक सहित दक्षेस देशों के प्रमुखों को बुलाकर दे दिया है। अब यह पाक जैसे दूसरे पड़ोसी देशों को तय करना है कि वे भारत की सद्भावना पर राजनीति करना चाहते हैं या गंभीरता से शांति के पथ पर आगे बढ़ना चाहते हैं। कुटिल राजनीति करते रहना चाहते हैं या रिश्तों को एक नया आयाम देना चाहते हैं। भारत के बदले हुए निजाम को यदि पाकिस्तान गंभीरता से नहीं ले रहा व पुराने ढर्रे पर चलते रहना चाह रहा है तो वो एक बड़ी चूक कर रहा है। भारत में इस समय राजनीतिक हालात बदल चुका है, नेतृत्व बदला है, जिसकी सोच नई है, दृष्टि नई है। अब देश की बागडोर एक मजबूत इरादों वाले नेता के हाथों में है। पाक जितनी जल्दी इस बात को समझ जाएगा उतना ही फायदे में रहेगा। फिर दोनों देश वार्ता के जरिए आगे बढ़ सकेंगे। भारत के सख्त हिदायत के बाद भी अलगाववादियों के साथ दो दिन तक बात करते रहना पाक की हिमाकत को दिखाता है। और उसके बाद अब्दुल बासित का प्रेस कॉन्फ्रेंस करना और सीमा पर संघर्ष विराम के उल्लंघन का आरोप भारत पर मढ़ना दुस्साहस की पराकाष्ठा है। इससे हालत सुधरने की बजाय और बिगड़ने की आशंका पैदा हो गई है।
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