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हाईकमान संस्कृति की शिकार हुई ''आप'' भी, करने लगी है पारंपरिक राजनीति

अभी पार्टी पर अरविंद केजरीवाल की मजबूत पकड़ है।

हाईकमान संस्कृति की शिकार हुई
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आम आदमी पार्टी (आप) से जिस तरह से चार संस्थापक सदस्यों योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, प्रो. आनंद कुमार व अजीत झा को निकाला गया है, उससे देश भर में यही संदेश जा रहा है कि जो कोई भी अरविंद केजरीवाल या उनके फैसलों पर सवाल उठाएगा उसको बाहर कर दिया जाएगा। तो क्या यह मान लिया जाए कि आम आदमी पार्टी मौजूदा पारंपरिक राजनीतिक दलों की तरह ही हो गई है? जिसमें अब सिर्फ वही होगा जो अरविंद केजरीवाल या उनके सर्मथक चाहेंगे। पिछले दिनों राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) से निकाले जाने के बाद से इन चारों नेताओं ने पार्टी के अंदर ही स्वराज संवाद नाम का मंच बनाया था। तभी से माना जा रहा था कि आने वाले दिनों में संभव है कि अरविंद गुट इन लोगों को पार्टी से बाहर कर दे। अभी पार्टी पर अरविंद केजरीवाल की मजबूत पकड़ है। ज्यादातर सांसद और विधायक उनके पक्ष में हैं। हालांकि कुछ विधायक योगेंद्र यादव व प्रशांत भूषण का भी सर्मथन कर रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषक आशंका जता रहे हैं कि आने वाले दिनों में आप टूट भी सकती है। निष्कासित सदस्य यह आरोप लगा रहे हैं कि जिन सिद्धांतों और उम्मीदों के साथ इस पार्टी का गठन हुआ था उससे यह भटक गई है। जो लोग इस भटकाव को रोकना चाहते हैं उन्हें केजरीवाल के सर्मथकों द्वारा पार्टी विरोधी ठहरा दिया जा रहा है। कितने दुख की बात है कि आम आदमी पार्टी के जो नेता हाल तक भारतीय राजनीति में आई इन्हीं बुनियादी समस्याओं को लेकर दूसरे दलों की आलोचना करते थे, अब वे ही तमाम नियमों-कायदों को ताक पर रखकर सुविधाजनक फैसले ले रहे हैं। इससे यही जाहिर होता है कि करीब ढाई साल पहले देश में एक नई और साफ सुथरी राजनीति के वादे के साथ वजूद में आई आप उन्हीं बुराइयों में जकड़ रही है, जिसका वह विरोध करती रही है। आप के मौजूदा स्वरूप को देखकर यह प्रतीत होने लगा है कि इसमें अब आंतरिक लोकतंत्र, स्वराज, पारदर्शिता और नैतिकता मात्र दिखावे के ही रह गए हैं। यह दिल्ली के मतदाताओं के साथ एक तरह से छलावा है क्योंकि उसने एक नई तरह की राजनीति करने के दावे के साथ आई पार्टी को पिछले चुनावों में हाथों हाथ लिया था, लेकिन नेताओं की निजी महत्वाकांक्षा और अहम सिद्धांतों पर भारी पड़ रहे हैं। आप के अधिकांश नेताओं की मानें तो केजरीवाल को पार्टी का हाईकमान मान लेने में कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि मतदाताओं को आकर्षित करने की उनमें क्षमता है। पार्टी ने दिल्ली का चुनाव उन्हीं के नाम पर लड़ा था। आम भारतीय संस्कृति भी यही कहती है। ज्यादातर दलों में व्यक्तिवाद भी इसी वजह से पैदा हुआ कि लोग वोट लोकप्रिय नेता के नाम पर देते हैं। सत्ता वोट से ही मिलती है न कि आंतरिक लोकतंत्र, स्वच्छ व पारदर्शी व्यवहार या एक व्यक्ति-एक पद जैसे सिद्धांतों से। केजरीवाल पार्टी का हाईकमान बनना भारतीय राजनीति की स्वाभाविक घटना ही है। मौजूदा घटनाक्रम से साफ है कि जो लोग इस सच्चाई से समझौता करेंगे उनकी ही आप में जगह है। बहरहाल, जिन्होंने आप को नई राजनीति का वाहक मान लिया था उनके लिए यह निराशाजनक है।
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