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इराक में फंसे भारतीयों की सुरक्षा का सवाल

सुन्नी सर्मथित आईएसआईएल के चरमपंथियों ने शिया सर्मथित इराक सरकार के खिलाफ सीधी जंग छेड़ रखी है।

इराक में फंसे भारतीयों की सुरक्षा का सवाल
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इराक के मोसुल शहर में एक प्रॉजेक्ट के लिए काम कर रहे 40 भारतीयों को सुन्नी चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड लेवांत (आईएसआईएल) के आतंकवादियों द्वारा अगवा कर लेने की खबर चिंताजनक है। अगवा हुए ज्यादातर लोग पंजाब के हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी भारतीयों के अपहरण की पुष्टि की है। उसने माना है कि 40 लोगों से संपर्क नहीं हो पा रहा है। वहीं टिकरित में भी 46 भारतीय नर्सों के फंसे होने की खबर है।
केंद्र सरकार ने अपने नागरिकों की सुरक्षा के प्रति सजगता दिखाते हुए पूर्व राजदूत सुरेश रेड्डी को इराक रवाना कर दिया है और एक कंट्रोल रूम का गठन किया है। इराक में बड़ी संख्या में अस्पतालों में नर्सें और निर्माण कार्य में मजदूर काम करते हैं, जिन्हें सुरक्षित निकालना केंद्र सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। ये वे लोग हैं जो कुछ रुपये कमाने और अपने परिवार के पालन-पोषण की उम्मीद में वहां गए हैं।
इस घटना से सीख लेते हुए अब विकसित देशों की तरह भारत के विदेश विभाग को भी समय-समय पर इस तरह की चेतावनी जारी करनी चाहिए कि किस देश में जाना अभी खतरनाक है। इसके साथ ही किस देश में कितने लोग हैं, उनकी पूरी जानकारी भी रखनी चाहिए। हालांकि युद्ध में घिरे देशों से पहले भी भारत सेना की मदद से अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने में कामयाब रहा है परंतु इराक में दिन प्रतिदिन हालात खराब होते जा रहे हैं।
सुन्नी सर्मथित आईएसआईएल के चरमपंथियों ने शिया सर्मथित इराक सरकार के खिलाफ सीधी जंग छेड़ रखी है। उन्होंने मोसुल और टिकरित जैसे बड़े शहरों को अपने कब्जे में ले लिया है और बगदाद की ओर बढ़ रहे हैं। इसे आधुनिक विश्व के इतिहास में शिया और सुन्नी के बीच हिंसक टकराव की संज्ञा दी जा रही है। यह संकट जिस तेजी से गहराता जा रहा है विश्व समुदाय की ओर से इससे पार पाने की कोशिश उतनी ही लचर दिखाई दे रही है।
इराकी सेना आतंकवादियों से लोहा तो ले रही है, परंतु यह बात समझ से परे है कि संयुक्त राष्ट्र की ओर से कोई पहल क्यों नहीं हो रही है। अमेरिका अपने पुराने दुश्मन ईरान के साथ मिलकर इराक की सेना की मदद करने को आगे आ रहा है पर यह काफी नहीं है। बेहतर तो यही होगा कि संयुक्त राष्ट्र इसमें पहल करे क्योंकि उसका गठन ही विश्व में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए हुआ है।ईरान शिया बहुल इराक सरकार की मदद करना चाहता है वहीं सऊदी अरब सरकार इराक में किसी तरह के दखल के खिलाफ है। लिहाजा संयुक्त राष्ट्र के आगे आने से ही विश्व समुदाय एकजुट होगा।
सऊदी अरब पर यह आरोप लगता रहा है कि उसने ही आईएसआईएल को आर्थिक मदद दे कर इतना मजबूत बनाया है कि आज यह संगठन तालिबान से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है। यदि टकराव को रोका नहीं गया तो तेल बहुल इराक में घोर तबाही आएगी। जिसकी आंच पूरी दुनिया पर पड़ेगी। तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव अभी से दिखाईदेने लगे हैं। इराक के इस हालात के लिए अमेरिका की दोहरी नीति कहीं ज्यादा जिम्मेदार है। फिलहाल भारत को वहां फंसे और अगवा हुए नागरिकों की सुरक्षित वापसी के लिए कोईठोस कदम उठाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
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