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पांच दशक बाद भी रिपोर्ट का गोपनीय रहना

अपनी फॉरवर्ड पॉलिसी के प्रति चीन को विश्वास में न ले पाना नेहरू सरकार की कूटनीतिक असफलता थी।

पांच दशक बाद भी रिपोर्ट का गोपनीय रहना
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नई दिल्ली. भारत-चीन के बीच 1962 में हुए युद्ध से संबंधित हेंडरसन ब्रूक्स-भगत रिपोर्ट का अंश पिछले दिनों सार्वजनिक करने वाले ऑस्ट्रेलिया के पत्रकार नेवेल मेक्सवेल का अब कहना है कि उस युद्ध के लिए नेहरू और उनकी नीति जिम्मेदार थी। दरअसल, भारत-चीन युद्ध से जुड़ी बातों का बार-बार सामने आने की घटना अहम बन रही है और लोगों का उस पर ध्यान जा रहा है तो इसकी एक बड़ी वजह केंद्र सरकार द्वारा उस रिपोर्ट को पांच दशक बाद भी गोपनीय बनाए रखने की मंशा है।
62 के युद्ध की जांच का जिम्मा तत्कालीन सरकार ने भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल हेंडरसन ब्रूक्स और ब्रिगेडियर पीएस भगत को सौंपा था, परंतु उस रिपोर्ट को आज तक जारी नहीं किया गया है। देश में बार-बार उसे सार्वजनिक करने की मांग भी उठती रही है, इसके बावजूद भारत सरकार उस रिपोर्ट को इस कदर छिपा कर रखी है जैसे यदि वह उजागर हो जाती है तो घोर अनर्थ हो जाएगा और देश किसी मुसीबत में फंस जाएगा।
यही नहीं गत दिनों मेक्सवेल ने उस रिपोर्ट से जुड़े कुछ अंशों को इंटरनेट पर डाल दिया उसके बाद भी भारत सरकार की कोशिश यही रही है कि जहां तक संभव हो सके उस रिपोर्ट की बातों को लोगों तक पहुंचने से रोका जाए। सरकार भी यह जानती हैकि आज सूचना क्रांति के दौर में ऐसा संभव नहीं है। और तो और सरकार इस पर प्रतिक्रिया तक देने से भाग रही है। उसका कहना है कि यह अतिगोपनीय रिपोर्ट है। हम सभी जानते हैं कि एक निश्चित अवधि के बाद संवेदनशीलता और गोपनीयता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। विश्व के कई देश इस सिद्धांत को मानते हुए एक अवधि के बाद अति संवेदनशील और गोपनीय दस्तावेज भी सार्वजनिक कर देते हैं।
तीस-चालीस वर्षों के बाद उसके बाहर आने से किसी को हानि नहीं होती। ऐसा करने के पीछे यह भी मकसद होता है कि तत्कालीन हालातों में सरकार द्वारा लिए गए फैसलों पर नए तरीके से सोचा जा सके और जहां तक हो सके नए सबक सीखे जा सकें। जिससे नई पीढ़ी उन गलतियों को न दोहराए जो सालों पहले उसके पूर्वज कर गए थे, परंतु सरकार के रुख को देखकर कहा जा सकता हैकि वह अभी भी 62 के सच को देश के सामने स्वीकारने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। मेक्सवेल की बातों में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे देश की जनता पहले से अवगत नहीं हो।
इससे पहले भी भारत-चीन युद्ध पर गहन शोध और किताबें आ चुकी हैं जिसमें चीन के साथ उस युद्ध में भारतीय सेना की दुर्गति के लिए हमारी रक्षा तैयारियों में कमी और नेहरू सरकार के कुछ अफसरों की नाकामी की बात की जा चुकी है। अपनी फॉरवर्ड पॉलिसी के प्रति चीन को विश्वास में न ले पाना नेहरू सरकार की कूटनीतिक असफलता थी, यह भी विशेषज्ञ कहते रहे हैं। यदि आम चुनावों के मुहाने पर खड़े देश में आधी सदी बाद भारत-चीन युद्ध से जुड़ी यह रिपोर्ट एक चुनावी मुद्दा बनती है तो इसका खामियाजा केंद्र की सत्ताधारी दल को ही भुगतना पड़ेगा।
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