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वन रैंक वन पेंशन को व्यावहारिक रूप दें

गत दिनों लाल किले के प्राचीर से PM ने सैनिकों को उनका हक देने का भरोसा दिया। उ

वन रैंक वन पेंशन को व्यावहारिक रूप दें
वन रैंक वन पेंशन पर केंद्र सरकार और पूर्व सैनिकों के प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की वार्ता के बाद भी अभी तक इसे कोई अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। इस बीच सरकार पर और दबाव बनाने के लिए रिटायर्ड सैनिकों ने 1965 के युद्ध में मिली जीत के पचास वर्षपूरे होने पर मनाए गए समारोह का बहिष्कार भी किया है। दूसरी ओर करीब दो महीने से दिल्ली के जंतर मंतर पर पूर्व सैनिक अनशन पर बैठे हैं, जिसमें से कई की हालत खराब होने के चलते उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सैनिकों को वन रैंक वन पेंशन देने की अपनी प्रतिबद्धता बार बार दोहराई है।
गत दिनों लाल किले के प्राचीर से भी उन्होंने सैनिकों को उनका हक देने का भरोसा दिया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार सैद्धांतिक रूप से वन रैंक वन पेंशन की व्यवस्था स्वीकार ली है, लेकिन प्रक्रियागत अड़चनों को दूर करने में कुछ वक्त लग रहा है। उम्मीद है, जल्द ही वे बाधाएं दूर कर ली जाएंगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि सेना का किसी भी देश में एक महत्वपूर्ण स्थान होता है। वे अपनी जान जोखिम में डालकर देश की सुरक्षा करते हैं। देश को सुरक्षित रखने के लिए वे अपना बलिदान तक देने से नहीं हिचकते हैं। यही वजह हैकि लोगों के दिल में सेना के जवानों के प्रति सम्मान और आदर का भाव होता है। यह भी सच हैकि अर्धसैनिक बलों और अन्य सरकारी कर्मचारियों की तुलना में सैनिकों का करियर सीमित अवधि का होता है। इन दोनों बातों को देखते हुए समान रैंक से रिटायर हुए सैनिकों को एक समान पेंशन देने की मांग जायज है। लेकिन इसके नाम पर ऐसी भी व्यवस्था नहीं अपनाई जानी चाहिए कि बाद में उस पर प्रश्न उठने लगे।
उदाहरण के तौर पर पूर्व सैनिकों की मांग है कि वन रैंक वन पेंशन की व्यवस्था लागू होने के बाद पेंशन में संशोधन के लिए इसकी हर वर्ष समीक्षा होनी चाहिए। अर्थात हर वर्ष रिटायर होने वाले प्रत्येक रैंक के अधिकारी की पेंशन के मुताबिक रिटायर सैनिकों और अधिकारियों की पेंशन में भी संशोधन होना चाहिए। जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि इसकी समीक्षा हर पांच वर्ष में होनी चाहिए। यहां हर वर्ष समीक्षा की मांग अव्यावहारिक लगती है क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में विविध रैंक वाले पेंशनधारियों की पेंशन में हर साल संशोधन करना किसी भी सरकारी मशीनरी के लिए न सिर्फ कई तरह की दिक्कतें पैदा कर सकता है बल्कि इससे उसका अतिरिक्त खर्च भी बढ़ सकता है। वैसे भी कहीं भी हर साल पेंशन में बदलाव नहीं होता है। यह काफी पेचीदा हो सकता है। ऐसे में हर पांच साल में पेंशन की समीक्षा करने का सरकार का फॉर्मूला ज्यादा तार्किक लगता है। बहरहाल, उनकी बकाया राशि का भुगतान करने का वादा सरकार कर भी रही है। कहा जा रहा है कि इस एक बिंदु को छोड़कर बाकी बिंदुओं पर दोनों पक्षों के बीच सहमति बन गई है। ऐसे में अब यह जरूरी हो गया हैकि पूर्व सैनिक और सरकार इस पर भी लचीला रुख अपनाते हुए कोई बीच का रास्ता जल्दी से निकालें, जिससे कि वन रैंक वन पेंशन पर बना यह गतिरोध बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा होने से पूर्व टूट सके।
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