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जब सोच ही ऐसी तो किसी बदलाव की उम्मीद बेमानी

यहां समस्या मानसिकता की है, मुलायम जिसके उदाहरण बनकर सामने आए हैं।

जब सोच ही ऐसी तो किसी बदलाव की उम्मीद बेमानी
उच्च व जिम्मेदार पदों पर बैठे हुए नेताओं और अधिकारियों से उम्मीद की जाती है कि वे देश, समाज, संस्था और कानून से जुड़े किसी मुद्दे पर संवेदनशीलता से पेश आएंगे और जो उचित है उसी के पक्ष में तर्क देंगे। जिसका उनके मातहत भी अनुसरण करते हैं और देश एक सही दिशा में अग्रसर होते हुए सबके कल्याण को सुनिश्चित करता है, परंतु जब ये लोग ही असंवेदनशील हो जाएंगे और भौंडा बयान देने लगेंगे तो समझा जा सकता है कि देश किस ओर जा रहा है।
समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव, जो कि खुद एक सांसद हैं और इस बार भी मैदान में हैं, का यह कहना कि बलात्कार जैसे मामले में फांसी की सजा गलत है। लड़कों से गलतियां हो जाती हैं। उन्होंने यहां तक कहा डाला कि उनकी सरकार आती है तो इसके कानून में संशोधन किया जाएगा। यही नहीं गत दिनों मुंबई के शक्ति मील रेप कांड के दोषियों को फांसी की सजा को भी गलत ठहरा दिया। मुलायम खुद मुख्यमंत्री और केंद्र में मंत्री रह चुके हैं। अब वे प्रधानमंत्री बनने का सपना भी देख रहे हैं। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी की सरकार है। यदि महिलाओं से संबंधित मुद्दे पर उनकी यह सोच है तो क्या देश उम्मीद कर सकता है कि वे महिला सशक्तिकरण व उनके उत्थान के लिए सजगता दिखाएंगे? गत वर्ष ऐसा ही असंवेदनशील बयान सीबीआई के निदेशक रंजीत सिन्हा ने दिया था।
महिलाओं से जुड़े यौन उत्पीड़न पर इससे ज्यादा असंवेदनशील बयान और कुछ नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट तक ने कहा है कि बलात्कार जैसा अपराध न केवल एक महिला के शरीर बल्कि आत्मा पर हमला है। यह नैतिक और शारीरिक रूप से सबसे ज्यादा निंदनीय अपराध है। बलात्कार पूरे समाज के खिलाफ किया गया अपराध है। इसके कारण महिला को ऐसा जख्म मिलता है, जो जीवन भर नहीं भरता। फिर मुलायम बलात्कार को लेकर ऐसी सोच क्यों रखे हैं। इससे समाज में कुत्सित मानसिकता के लोगों को और बढ़ावा ही मिलेगा। इससे एक बात तो पूरी तरह जगजाहिर हो जाती है कि महिलाओं के प्रति खुद कानून बनाने वालों की सोच कितनी गलत है। और जब बड़े नेताओं की यह धारणा है तो छोटे स्तर पर हालात क्या होंगे, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
यहां समस्या मानसिकता की है, मुलायम जिसके उदाहरण बनकर सामने आए हैं। हम समझ सकते हैं कि ऐसी धारणा रखने वाले लोग कैसी व्यवस्था देंगे। महिलाएं आज सबसे ज्यादा हिंसा का शिकार हो रही हैं और समाज में खुद को असुरक्षित महसूस कर रही हैं तो उसके पीछे कहीं न कहीं यह धारणा भी काम कर रही है। 16 दिसंबर के दिल्ली गैंगरेप कांड के बाद जिस तरह से जनता में पुलिस के खिलाफ आक्रोश दिखा था, राजनीतिक दलों को लोगों के सामने आना पड़ा था और जिसके बाद महिलाओं के खिलाफ अपराध को लेकर कड़े कानून बने थे उससे एक आस बंधी थी कि हालात बदले होंगे, नेता और प्रशासन सजग हुए होंगे, परंतु इस बयान के बाद नाउम्मीदी छा गई है। क्योंकि जब सोच ही ऐसी है तो परिवर्तन की उम्मीद नहीं की जा सकती।
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