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चिंतन: शहरों को रहने लायक बनाने की नई पहल

आवास योजना के तहत आने वाले सात वर्षों में बेघर परिवारों के लिए दो करोड़ घर बनाए जाएंगे।

चिंतन: शहरों को रहने लायक बनाने की नई पहल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बृहस्पतिवार को लांच की गई तीनों योजनाओं, जिनमें सौ स्मार्ट शहरों का विकास, पांच सौ नगरों के लिए अटल शहरी पुनर्जीवन एवं परिवर्तन मिशन (एएमआरयूटी) और 2022 तक शहरी क्षेत्रों में सभी के लिए आवास शामिल हैं, का मुख्य उद्देश्य शहरी भारत की बदहाल तस्वीर को बदलना है। आने वाले वर्षों में इन तीनों योजनाओं पर चार लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। स्मार्ट शहरों का चुनाव तय किए गए मानकों के आधार पर होगा। जो नगर उन पर खरा उतरंगे उन्हें स्मार्ट शहर के तर्ज पर विकसित किया जाएगा। एएमआरयूटी के तहत देश में एक लाख से अधिक आबादी वाले पांच सौ शहरों में आधारभूत ढांचा तैयार कर उन्हें रहने लायक बनाया जाएगा। वहीं आवास योजना के तहत आने वाले सात वर्षों में बेघर परिवारों के लिए दो करोड़ घर बनाए जाएंगे। मौजूदा समय में देश की करीब 40 फीसदी आबादी शहरों में रहती है। आज ग्रामीण क्षेत्रों से जिस तेजी से लोगों का रोजी रोटी और बेहतर जीवन की तलाश में शहरों की ओर पलायन हो रहा है, उसे देखते हुए कहा जा रहा है कि बहुत जल्द ही शहरी और ग्रामीण आबादी का अनुपात बदल जाएगा। गांवों से ज्यादा लोग शहरों में रहने लगेंगे। मगर क्या हमारे शहर इस बढ़ती आबादी का बोझ ढोने को तैयार हैं। सच कहा जाए तो नहीं। देश में नगरीकरण तेजी से हो तो रहा है, लेकिन वह व्यवस्थित न हो कर बेतरतीब है। उसमें न तो उस शहर का फायदा है, न ही वहां निवास करने वाली आबादी का। लोग बढ़ते जा रहे हैं लेकिन सुविधाओं का विस्तार नहीं हो रहा है। जिससे आधे से भी अधिक लोगों को मूलभूत सुविधाएं नसीब नहीं हो पा रही हैं। प्रदूषण, साफ पानी व बिजली का अभाव, जर्जर सड़कें, बदहाल स्वस्थ्य सेवाएं, गंदगी, बंद सीवर आदि तमाम समस्याओं ने मिलकर ऐसी कुव्यवस्था फैलाई है कि शहर स्वयं अपनी संस्कृति बचाने को जद्दोजहद कर रहे हैं। ऐसे में स्मार्ट शहर और एएमआरयूटी योजना का फोकस शहरों में इन्हीं मूलभूत सुविधाओं के विकास पर होना चाहिए। जिससे वहां के लोगों को अच्छी हवा, साफ पानी और दूसरी सभी नागरिक सेवाएं समय पर प्राप्त हो सकें। साफ सफाई की उचित व्यवस्था बनानी होगी। तभी शहरों में रहने वाले लोगों का जीवन बेहतर हो सकेगा। वहीं आजादी के छह दशक बीतने के बाद भी देश की एक बड़ी आबादी बेघर है तथा सड़कों और झुग्गी-झोपड़ियों में जीवन जीने को अभिशप्त है। वह ऐसी हालत में नहीं है कि अपने लिए छत का इंतजाम कर सके। ऐसे में जहां हर साल सड़क दुर्घटनाओं में उनकी जान चली जाती है, तो दूसरी ओर प्रकृति के कहर का भी उन्हें शिकार होना पड़ता है। आज भी देश में विश्वस्तरीय शहरों का अभाव क्यों है? इसके कारणों को जानने की जरूरत है। तभी ये योजनाएं प्रभावित ढंग से लागू हो पाएंगी। दिल्ली के विज्ञान भवन में अगले दो दिनों तक देश के सभी शहरों से आए मेयर और राज्यों के मंत्री इन योजनाओं पर मंथन करेंगे ताकि र्मज को समझा जा सके। एक बार बीमारी का सही तरीके से आकलन हो गए तो इन योजनाओं को अंजाम तक पहुंचाना आसान हो जाएगा। जाहिर है, यह मोदी सरकार की सही शुरुआत है।
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