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बेनकाब होने की डर से वार्ता से पीछे हटा पाक

भारत ने 60 मोस्ट वांटेड आतंकवादियों की सूची तैयार की है, जिसमें उनकी पूरी जानकारी दी गई है।

बेनकाब होने की डर से वार्ता से पीछे हटा पाक
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पाकिस्तान आखिरकार राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की वार्ता कार्यक्रम से पीछे हट ही गया। पिछले कुछ दिनों से वह जिस तरह का रवैया अख्तियार किए हुए था उससे सहज ही अंदाजा हो गया था कि वह बातचीत को लेकर गंभीर नहीं है। वरना रूस के उफा शहर में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच तय हुए एजेंडे का वह पालन करते हुए अमन बहाली के रास्ते खोजने में भारत का साथ देता। इसके बावजूद वह कश्मीर को बातचीत का मुख्य मुद्दा बनाने और राज्य के अलगाववादियों को तीसरा पक्ष बनाने पर अड़ा रहा। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच उफा में जिस सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए थे उसमें साफ लिखा हुआ हैकि नईदिल्ली में दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच जो बैठक होगी उसमें सिर्फ आतंकवाद पर ही वार्ता होगी।

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शनिवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा भी कि यह समग्र वार्तानहीं है, जब समग्र वार्ताहोगी तब कश्मीर सहित सभी मुद्दों पर बातचीत होगी, लेकिन उसके पहले आतंकवाद और सीमा पर शांति बहाली जरूरी है, लिहाजा इन्हीं समस्याओं का हल निकालने के लिए दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बैठक करने वाले थे। दरअसल, पाक के पीछे हटने की वजह यह हैकि उसे आतंकवाद पर बेनकाब होने का डर हो गया था। उसे वार्ता की मेज पर बैठने पर आतंकवाद के मसले पर बुरी तरह घिर जाने का भय हो गया था। भारत ने 60 मोस्ट वांटेड आतंकवादियों की सूची तैयार की है, जिसमें उनकी पूरी जानकारी दी गई है। दाऊद इब्राहिम के ही नौ ठिकाने की पुख्ता जानकारी जुटाई गई है। इन सभी आतंकवादियों को पाकिस्तान पनाह दिए हुए है। उन दर्जनों आतंकी संगठनों के बारे में भी भारत के हाथ सबूत लगे हैं जो आतंकवाद की ट्रेनिंग दे रहे हैं। मसलन कहां-कहां आतंकी कैंप हैं, आतंकवादियों को किस तरह प्रशिक्षित किया जा रहा है, उन्हें किस तरह सीमा पार भेजा जा रहा है और इसमें उनकी कौन मदद कर रहा है, सबके साक्ष्य भारत के पास हैं। इन सबसे बढ़कर भारत के पास मोहम्मद नावेद नाम का पाकिस्तानी आतंक का जिंदा सबूत है।

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यही वजह है कि जबसे वार्ता का माहौल बना था, उसे बिगाड़ने में पाकिस्तान लग गया था। यह अकारण नहीं हैकि इन दिनों संघर्ष विराम के उल्लंघन और घाटी में आतंकी घटनाओं में तेजी आई है। वह भारत को उकसाने के लिए पहले हुर्रियत को बातचीत का निमंत्रण देता है, जबकि दोनों देशों के बीच हुए शिमला समझौते में यह साफ-साफ कहा गया है कि कश्मीर मुद्दे का हल दोनों देश स्वयं निकालेंगे इसमें कोईतीसरा पक्ष नहीं होगा। स्पष्ट है कि पाकिस्तान में तीन शक्तियों काम करती हैं। एक निर्वाचित सरकार, दूसरी सेना और तीसरी कट्टरपंथी जमातें हैं। उफा सहमति पत्र में आतंकवाद और शांति बहाली के मुद्दे को शामिल करने के बाद से ही सेना और कट्टरपंथी नवाज सरकार पर इस वार्ता से हटने का दबाव डाल रहे थे। जाहिर है, पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार उनके दबाव में आ गई। इस पूरे प्रकरण से यह साबित हो गया है कि पाकिस्तान की सेना के आगे चुनी हुई सरकार बहुत कमजोर है।

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