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चिंतन: सबको छोड़ मुकम्मल जहां में चले गए निदा

फाजली का जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में हुआ था। लेकिन उनकी परवरिश व शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर में हुई।

चिंतन: सबको छोड़ मुकम्मल जहां में चले गए निदा
'कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता', 'घर से मस्जिद है बहुत दूर', 'जीवन क्या है कोई ना जाने' जैसी मर्मस्पर्शी लाइनें लिखने वाले मशहूर शायर निदा फाजली का जाना उर्दू साहित्य ही नहीं वरन समूचे देश के लिए एक बड़ी क्षति है। मीरा और गालिब से प्रभावित निदा फाजली ने उर्दू शायरी की बंधी-बंधायी सीमाओं को तोड़ कर अपनी अलग अनूठी शैली ईजाद की। पद्म श्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार जैसे सम्मानों से नवाजे गए फाजली का जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में हुआ था। लेकिन उनकी परवरिश व शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर में हुई। उनका असली नाम मुक्तदा हसन था। 78 बसंत पूरा करने के बाद दुनिया से रुखसत होने वाले फाजली ने अपने लेखन में हमेशा धार्मिक कट्टरपंथ को निशाने पर लिया और प्रेम, भाईचारा, संवेदना व करुणा जैसे श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों को बढ़ावा दिया। उनके नज़्मों में जीवन का गूढ़ संदेश है। अदब का चिराग निदा आम जनता के लोकप्रिय शायर रहे। उनके पांच संग्रह प्रकाशित हुए। ग्वालियर कॉलेज से स्नातकोत्तर की शिक्षा पूरी करने के बाद अपने सपनों को पूरा करने के लिए वे 1964 में मुंबई आ गए। यहां उन्हें मुफलिसी के दौर से भी गुजरना पड़ा। इस दौरान उन्होंने धर्मयुग और ब्लिट्ज जैसी पत्रिकाओं में लिखा। इससे उन्हें पहचान मिली तो मुशायरों में शिरकत करने का मौका मिलने लगा। उनकी शोहरत बढ़ने लगी। उन्होंने फिल्मों के लिए भी गीत लिखना शुरू कर दिया। लेकिन राह आसान नहीं थी। फिल्में हिट नहीं हो पा रही थीं। फिर भी संघर्ष जारी रखा। 1980 में प्रदर्शित फिल्म 'आप तो ऐसे न थे' में अपने गीत 'तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है' की सफलता के बाद निदा ने गीतकार के रूप में पहली बार सफलता का स्वाद चखा। खय्याम के संगीत निर्देशन में फिल्म आहिस्ता-आहिस्ता के लिए 'कभी किसी को मुक्कमल जहां नहीं मिलता'गीत ने उन्हें मुंबई में स्थापित कर दिया। वर्ष 1983 में फिल्म रजिया सुल्तान के निर्माण के दौरान गीतकार जां निसार अख्तर की आकस्मिक मृत्यु के बाद बाकी गीतों के लिए निर्माता कमाल अमरोही ने निदा फाजली पर ही भरोसा जताया था। इसके बाद वे शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचे। गजल सम्राट जगजीत सिंह ने निदा के लिखे कई गीत गाए, जिनमें 1999 में प्रदर्शित फिल्म सरफरोश का यह गीत 'होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है' भी शामिल है। अपने मुल्क के प्रति उनका प्रेम इस कदर था कि जब उनके माता-पिता ने पाकिस्तान जाने का फैसला किया, तो उन्होंने भारत में ही रहने का निर्णय किया। इसी साल जनवरी के आखिर में यूपी के गोरखपुर में फाजली का असहिष्णुता पर दर्द छलका था। कहा था राष्ट्रपति व अमेरिका के प्रेसिडेंट असहिष्णुता की बात करते हैं तो कोई विरोध नहीं होता है, लेकिन जब कोई आम आदमी असहिष्णुता की बात करता है तो उसकी जाति पूछी जाती है। 12वीं-13वीं शताब्दी में बाबा फरीद से शुरू हुई दोहों की परंपरा में वर्तमान समय में सबसे बड़ा नाम निदा फाजली को आसान भाषा में लिखे नज़्मों के लिए खास तौर पर याद किया जाएगा। वे हमारे दिलों में सदा जिंदा रहेंगे।
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