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चिंतन: एक सौम्य राजनेता मुफ्ती मोहम्मद सईद का जाना

12 जनवरी 1936 को जन्मे सईद हमेशा कश्मीर को भारत से जोड़कर रखने वाले राजनेता के रूप में याद किए जाते रहेंगे।

चिंतन: एक सौम्य राजनेता मुफ्ती मोहम्मद सईद का जाना
अपने शुरूआती करियर में एक काबिल अधिवक्ता के रूप में पहचान बनाने वाले मुफ्ती मोहम्मद सईद राज्य से उठकर केंद्र की राजनीति में अपना एक अलग मुकाम बनाया। देश के अब तक के एकमात्र मुस्लिम गृहमंत्री बनने वाले सईद ने एक मंझे हुए सियासदां की तरह जम्मू-कश्मीर और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी एक सौम्य व 'हमदर्द' राजनेता की छवि बनाई। लगभग छह दशक तक के अपने राजनीतिक करियर में सईद जम्मू-कश्मीर में ताकतवर अब्दुल्ला परिवार के खिलाफ प्रतिद्वंदी सत्ताशक्ति का केंद्र बनकर उभरे। राजनीति के खेल में हमेशा पत्ते छिपाकर रखने वाले सईद ने अपने राजनीतिक एजेंडे के अनुरूप चलने के लिए विरोधाभासी विचारधाराओं वाले दलों के साथ भी सियासी दोस्ती करने में कभी गुरेज नहीं किया। इसके चलते उन पर अवसरवादिता की राजनीति करने का आरोप भी लगा। 1950 के दशक में जीएम सादिक की डेमोक्रेटिक नेशनल कांफ्रेंस से राजनीति में आए। उसके बाद वे कांग्रेस में आए। उन्होंने 1987 में कांग्रेस छोड़ दी और विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ जनता दल के संस्थापक नेताओं में शामिल रहे। उनका यह फैसला उनके लिए राजनीतिक रूप से काफी परिपक्व साबित हुआ। वे अचानक से राज्य की राजनीति से राष्ट्रीय फलक पर छा गए। 1989 में जब केंद्र में वीपी सिंह की सरकार बनी तो सईद गृहमंत्री बने। उस समय जम्मू-कश्मीर गहरे आतंकवाद की चपेट में था। गृहमंत्री रहते हुए उन्हें आतंकवाद का घिनौना रूप देखने को मिला और उन्हें उनकी बेटी रूबैया अपहरण प्रकरण का सामना करना पड़ा। कथित तौर पर अलगाववादी गुट जेकेएलएफ ने सईद की तीसरी बेटी डा. रूबैया सईद का अपहरण कर लिया और छोड़ने के बदले पांच खूंखार आतंकवादियों को जेल से रिहा करने की मांग की। उनके गृहमंत्री रहते हुए ही केंद्र सरकार ने आतंकवादियों की मांग पूरी कर दी। उसके बाद मीडिया में सुर्खियां बनीं कि रूबैया अपहरण प्रकरण एक सुनियोजित षड़यंत्र था और इसमें कहीं न कहीं सईद की भी 'सहमति' थी। जिसके बाद सईद रोते हुए देखे गए और उन पर देश हितों की बलि चढ़ाने का आरोप लगा। यह खबर भी आई कि रूबैया प्रकरण को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में खुद मुफ्ती मोहम्मद सईद ने पांच आतंकियों को छोड़ने का विरोध किया था, लेकिन वीपी सिंह नहीं माने थे। सईद के कार्यकाल में रूबैया प्रकरण के चलते भारत पर पहली बार एक 'कमजोर देश' होने का ठप्पा भी लगा। रूबैया अपहरण की साजिश के पीछे सईद की 'सहमति' की धारणा बनने के पीछे शायद उनकी राजनीतिक शैली रही हो। सईद जेहन से कश्मीरी भी थे और कट्टर भारतीय भी। लेकिन वे इसी के साथ अलगाववादियों के प्रति नरम रुख भी रखते थे और कश्मीर मसले पर पाकिस्तान से वार्ता जारी रखने के पैरोकार भी थे। इसलिए उनकी राजनीति पर सवाल उठते थे और कश्मीर से बाहर के लोग उन्हें अलगाववादी के 'हमदर्द' मानते थे। हालांकि वे कश्मीर की नजाकत को समझते हुए सूझबूझ के साथ राजनीति करते थे। जनता दल के बिखरने के बाद उन्होंने अपनी पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीपी) बनाई। 2002 में पीडीपी को केवल 14 सीट मिलने के बावजूद उन्होंने कांग्रेस के साथ मिल जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाई और खुद सीएम बने। तीन साल तक वे सीएम रहे। दुबारा भी 2015 में भाजपा के साथ गठबंधन कर उन्होंने राजनीति की नई मिसाल पेश की। अनंतनाग जिले में बिजबेहड़ा के बाबा मोहल्ला में 12 जनवरी 1936 को जन्मे सईद हमेशा कश्मीर को भारत से जोड़कर रखने वाले राजनेता के रूप में याद किए जाते रहेंगे। देश और कश्मीर में उनके सूनेपन को कोई नहीं भर पाएगा। अब कश्मीर में नजरें उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती पर होंगी कि वह पिता की विरासत को किस तरह आगे ले जाती हैं।
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