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वैश्विक मंदी से नहीं प्रभावित होगा भारत

सरकार के स्तर पर तेज निर्णय लिए जाने से देश में नीतिगत अपंगता की स्थिति खत्म हुई है।

वैश्विक मंदी से नहीं प्रभावित होगा भारत
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वैश्विक स्तर पर तैयार किए गए ग्रोथ चार्ट में भारत अग्रणी अर्थव्यवस्था बनकर उभरा है। यह कम सुखद नहीं है कि आज विश्व स्तरीय संस्थाएं भारत को दुनिया की तेज गति से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था बताने लगी हैं। विश्व बैंक की एक ताजा रिपोर्ट में भी कहा गया है कि दुनिया में मंदी जैसे हालात बन रहे हैं, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था बेहतर स्थिति में रहेगी। उसके अनुसार इस साल भारत की अर्थव्यवस्था 7.5 फीसदी की विकास दर हासिल करेगी, जबकि ब्राजील, रूस, चीन और अमेरिका की वृद्धि दर घटने की भविष्यवाणी की गई है। यह दिखाता है कि मोदी सरकार के नेतृत्व में बड़े आर्थिक सुधारों की बदौलत भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और उसे गति देने में मदद मिली है।
सरकार के स्तर पर तेज निर्णय लिए जाने से देश में नीतिगत अपंगता की स्थिति खत्म हुई है। लंबित योजनाओं को जमीन पर उतारने में तेजी आई है। देश में निवेश का माहौल बनने से निवेशकों में आशा का संचार हुआ है। केंद्र सरकार देश में बड़े पैमाने पर निवेश हो इसके लिए कई कानूनी बदलाव कर रही है। इसके लिए र्शम और उद्योग से जुड़े कानूनों में सुधार किए जा रहे हैं। वहीं कई सेक्टरों को विदेशी निवेशकों के लिए खोला गया है। जैसे कि बीमा और रक्षा क्षेत्र में 49 फीसदी विदेशी निवेश की मंजूरी दी गई है। हालांकि देश में बैंकों द्वारा ब्याज दरों में कमी नहीं होना चिंता का सबब बना है। उनकी चिंताओं को दूर करने के लिए वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बृहस्पतिवार को बैठक की, जिसके बाद उम्मीद की जा रही हैकि देश में जल्द ही सस्ते कर्ज का दौर शुरू होगा। वैसे भी इस साल रिर्जव बैंक तीन बार रेपो दर में कटौती कर चुका है। वहीं मोदी सरकार देश में कारोबार को आसान बनाने के लिए नियमों को और सरल बनाने में जुटी है। पेट्रोलियम के बड़े आयातक भारत को तेल के दाम घटने का फायदा मिल रहा है। इससे देश को अपने चालू खाते में घाटे को काबू में रखने में मदद मिली है।
जब देश का आयात बिल निर्यात बिल से ज्यादा हो जाता हैतो उसे चालू खाते में घाटा कहा जाता है। इससे बड़े पैमाने पर मुद्रा देश से बाहर जाने लगती है। इस वजह से देसी मुद्रा भी दबाव में आ जाती है। वहीं सरकार के स्तर पर बेहतर वित्तीय प्रबंधन से राजकोषीय घाटे को भी नियंत्रित किया जा सका है। सरकार की आमदनी से ज्यादा खर्च में बढ़ोतरी को राजकोषीय घाटा कहा जाता है। इसके बढ़ने से सरकार के ऊपर कर्ज का बोझ बढ़ जाता है। सरकार के दिवालिया तक होने की स्थिति आ जाती है। एक साल पहले चालू खाते में घाटा व राजकोषीय घाटा सरकार के लिए चिंता का सबब बने हुए थे, लेकिन मोदी सरकार की सजगता और नीतिगत फैसलों के कारण इनके साथ-साथ महंगाई भी नियंत्रण में है। हालांकि अभी भी अर्थव्यवस्था के सामने ढेर सारी चुनौतियां बरकरार हैं, जिनकी ओर विश्व बैंक ने भी इशारा किया है। मानसून में देरी से कृषि को नुकसान पहुंचने की संभावना है, इससे महंगाई में वृद्धि की आशंका जताई जा रही है। ढांचागत क्षेत्र पर दबाव साफ देखा जा सकता है। वहीं बैंकों में फंसे कर्ज के मामले बढ़ रहे हैं। लिहाजा, सुधारवादी एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए केंद्र सरकार को इन कमजोरियों को दूर करने पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
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