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चिंतन: मंदी के मुहाने पर विश्व, सतर्क रहें बैंक

वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले यूरोपीय देश कर्ज संकट से जूझ रहे हैं। ग्रीस दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गया है।

चिंतन: मंदी के मुहाने पर विश्व, सतर्क रहें बैंक
रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने दुनिया के केंद्रीय बैंकों से कहा है कि वे अपनी कार्यनीति के नए नियम बनाएं क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था वैसी ही परिस्थितियों की ओर बढ़ रही है जो 1930 के दशक की विश्वव्यापी मंदी के दौर में थी। उन्होंने दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के बीच मौद्रिक नीति यानी मुद्रा आपूर्ति की नीति को उदार बनाने की होड़ के प्रति आगाह किया है। उन्होंने कहा है कि हालांकि भारत में हालात अलग हैं, यहां अभी निवेश की ढेरों संभावनाएं हैं। लिहाजा उसे प्रोत्साहित करने के लिए ब्याज दरों में कटौती की जा रही है। जाहिर है, वे दुनिया के प्रमुखों से विश्व अर्थव्यवस्था के सामने आ रही चुनौतियों से निपटने के लिए समाधान खोजने को कह रहे हैं। वैसे भी अर्थतंत्र की मौजूदा कार्यप्रणाली की सीमाएं सामने आ गई हैं। नई चुनौतियों से पार पाने में पूंजीवाद के सिद्धांत सक्षम नहीं रह गए हैं। रघुराम राजन के बयान को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए क्योंकि वे पहले ऐसे शख्स थे जिन्होंने 2008 की विश्व मंदी को भांप लिया था। अभी उस मंदी से दुनिया पूरी तरह उबर नहीं पाई है। लिहाजा जिस तरह 1930 की मंदी से उबारने में अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कींस का रोजगार, ब्याज और मुद्रा का सिद्धांत सहायक हुआ था, आज विश्व अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए वैसे ही क्रांतिकारी नियमों की दरकार है। ऐसे में अब समय आ गया हैकि नए नियमों के बारे में बहस की जाए। विश्व बैंक ने भी अपनी सालाना रिपोर्टमें कहा है कि दुनिया पर मंदी का खतरा मंडरा रहा है। लिहाजा समय रहते नए उपाय ढूंढ़ लेने चाहिए। हालांकि उसने साफ कहा हैकि इस मंदी से भारत अछूता रहेगा। आंकड़ों में भी देखें तो वैश्विक अर्थव्यवस्था की विकास दर में गिरावट मंदी के संकेत देते हैं। इस साल इसके 2.8 फीसदी रहने का अनुमान है। कई सालों से विश्व अर्थव्यवस्था का अगुआ रहा चीन फिसलन के दौर में है। वहीं जापान और ब्राजील भी कोई अच्छी स्थिति में नहीं हैं। रूस कई मोर्चों पर संघर्ष कर रहा है। तमाम प्रतिबंधों का सामना कर रहे रूस की अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई है। तेल की कम हुई कीमतों के कारण भी उसकी परेशानी बढ़ी है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले यूरोपीय देश कर्ज संकट से जूझ रहे हैं। ग्रीस दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गया है। इस बीच अमेरिका में हालात कुछ सुधरे हैं, लेकिन उसका भी संकट अभी टला नहीं है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में आई सिकुड़न से कच्चे तेल की मांग कम हुई है जिससे कीमतों में भारी कमी आई है। तेल के दामों में गिरावट और केंद्र में आई मोदी सरकार द्वारा आर्थिक सुधार की दिशा में उठाए गए कदम भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी साबित हुए हैं। यही वजह है कि विकसित और कई विकासशील देशों को जहां मंदी के खतरे का सामना करना पड़ रहा है, भारत विश्व का सबसे तेज गति से विकास करने वाला देश बन गया है। हालांकि अभी भी इसके सामने ढेर सारी चुनौतियां बरकरार हैं, जिनमें ढांचागत क्षेत्र पर दबाव और बैंकों के फंसे कर्ज के मामले प्रमुख हैं। लिहाजा, सुधारवादी एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए केंद्र सरकार को इन कमजोरियों को दूर करने पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
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