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जम्मू-कश्मीर में रिकॉर्ड मतदान के मायने

लोकतंत्र ही उनकी समस्त समस्याओं का निदान कर सकता है।

जम्मू-कश्मीर में रिकॉर्ड मतदान के मायने

जम्मू-कश्मीर में दूसरे चरण में 18 विधानसभा क्षेत्रों में 72 फीसदी मतदान हुआ है। इससे पहले 15 विधानसभा क्षेत्रों में भी 71 फीसदी मतदान हुआ था। राज्य की जनता का यह उत्साह आतंकियों और अलगाववादियों की गाल पर जोरदार तमाचे की तरह है। क्योंकि उनकी ओर से लोगों को लोकतंत्र के इस महापर्व में शामिल नहीं होने देने की हरसंभव कोशिश की गई।

बीते दिनों पूरी दुनिया ने देखा कि प्रथम चरण के मतदान के बाद आतंकी किस तरह दो दिनों तक एक बंकर को अपने कब्जे में ले जानलेवा फायरिंग करते रहे। इस हमले में कई लोगों की मौत हो गई थी। श्रीनगर के लाल चौक पर भी ग्रेनेड से हमला किया गया जिसमें आठ लोग घायल हो गए। इसके साथ ही आतंकियों ने दहशत फैलाने के लिए एक सरपंच की भी हत्या कर दी, परंतु इसके बाद भी वे जम्मू-कश्मीर की जनता को नहीं रोक पाए। इसे भारतीय लोकतंत्र की जीत और अलगाववादियों तथा पाक समर्थित आतंकवादियों की हार के रूप में देखा जाना चाहिए।

सबसे प्रमुख बात तो यह है कि घाटी के कई इलाकों में विकसित कहे जाने वाले पुणे, बंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों से भी अधिक मतदान प्रतिशत दर्ज किए गए हैं। इससे जाहिर होता है कि राज्य की फिजा तेजी से बदल रही है। हालांकि राज्य में पांच चरणों में मतदान होने वाले हैं। अभी भी तीन दौर का मतदान शेष है। कईलोग यह भी मान रहे हैं कि इन आंकड़ों पर अभी कुछ निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसे एक संकेत के रूप में देखा जाए तो इसकी अहमियत काफी बढ़ जाती है। क्योंकि एक ऐसा भी दौर था जब आतंकियों और अलगाववादियों के भय से लोग बाहर निकलने से कतराते थे। बीते लोकसभा चुनावों में ही मतदान प्रतिशत काफी कम था।

यदि आंकड़ों से अलग हटकर देखने की कोशिश करें तो मतदान को लेकर जिस तरह का उत्साह लोगों में देखने को मिला, वह इस दावे की हवा निकालने के लिए काफी है कि ऐसा अभूतपूर्व मतदान प्रतिशत पुलिस और प्रशासन की जबर्दस्ती का नतीजा है। दरअसल, आम कश्मीरियों के इस रुख से अलगाववादी और पाक समर्थित आतंकवादी बौखला गए हैं। और खिसियाहट में वे भारी मतदान की कई अनोखी व्याख्याएं पेश कर रहे हैं। अगर पुलिस और फौज की कोशिशों से ही मतदान प्रतिशत बढ़ता, तो ऐसा पहले के चुनावों में क्यों नहीं हुआ? फौज कोई आज तो जम्मू-कश्मीर पहुंची नहीं।

एक और दलील यह दी जा रही है कि दरअसल अलगाववादियों ने चुनाव बहिष्कार की अपनी अपील पर जोर नहीं दिया था। चुनाव की सफलता साफ बता रही है कि जम्मू-कश्मीर की आम जनता, बुलेट की जगह बैलट में अपना भविष्य देखने लगी है। उन्हें लगने लगा है कि लोकतंत्र ही उनकी समस्त समस्याओं का निदान कर सकता है।

इसमें सूबे और मुल्क में लोकतंत्र की जड़ों को और मजबूती मिलने की आहट सुनाई दे रही है। यह सबूत है, इस बात का भी कि कश्मीर बीती त्रासदियों को भुलाकर सुनहरे भविष्य की ओर कदम बढ़ाना चाहता है। राज्य और राष्ट्रीय नेतृत्व का यह दायित्व है कि वे भी दलगत हितों से ऊपर उठकर कश्मीर की इस करवट लेती आकांक्षा को समझें।

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