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चौरासी के दंगा पीड़ितों को न्याय मिलना चाहिए

1984 का सिख विरोधी दंगा कलंक की तरह देश के माथे पर अंकित है।

चौरासी के दंगा पीड़ितों को न्याय मिलना चाहिए
नई दिल्ली. किसी भी लोकतांत्रिक देश में दंगे बदनुमा दाग की तरह होते हैं। क्योंकि इनमें अंतत: मनुष्यता ही मरती है। असमय मरने वालों के परिवारों, रिश्तेदारों को पूरी जिंदगी जो मानसिक वेदना सहनी पड़ती उसकी कल्पना ही की जा सकती है। वहीं समाज की एकता भी छिन्नभिन्न होती है सो अलग। भारत जैसे विविधताओं वाले देश में तो दंगा होना और खतरनाक बात है। 1984 का सिख विरोधी दंगा कलंक की तरह देश के माथे पर अंकित है। इसके पीड़ितों को 29 वर्ष बाद भी न्याय के लिए भटकना पड़ रहा है। यही वजह है कि जब तब यह मामला सामने आता रहा है।
हाल ही में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एक अंग्रेजी न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि 84 के दंगे में शायद कुछ कांग्रेसी शामिल थे, लेकिन उन्हें सजा भी मिली है। साथ ही उन्होंने कहा कि उस समय की कांग्रेस सरकार दंगे में शामिल नहीं थी, परंतु तथ्य उनकी बातों को झुठलाते हैं। इस बयान के बाद पीड़ित सिख न्याय की मांग करते हुए सड़कों पर हैं और वहीं दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने उपराज्यपाल से मामले की निष्पक्ष जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने की मांग की है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है।
एसआईटी के गठन की मांग लंबे अरसे से हो रही है। हालांकि अब तक इस मामले की तीन आयोगों और सात कमेटियों ने जांच की है, परंतु सभी के साथ कोई न कोई विवाद जुड़ते रहे और इनमें से ज्यादातर सही रिपोर्ट नहीं दे पाए। हालांकि कुछ ने कांग्रेस व दिल्ली पुलिस के कुछ तत्कालीन अधिकारियों को कठघरे में खड़ा किया है। सीबीआई ने तो यहां तक कहा है कि यह दंगा नियोजित था। इसमें देश भर में करीब आठ हजार सिख मारे गए थे, अकेले दिल्ली में करीब तीन हजार सिखों की नृशंस हत्या कर दी गई थी।
नानावती आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली में करीब 587 मामले दर्ज कराए गए थे परंतु उसमें से 241 मामले पुलिस ने बिना छानबीन के बंद कर दिए और वे मामले कोर्ट में भी नहीं पहुंचे। अन्य मुकदमों में भी सुनवाई धीमी रही और बहुत कम लोगों को ही सजा मिली है। मुख्य आरोपी अभी भी खुलेआम घूम रहे हैं। कांग्रेस के तीन बड़े नेता सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर और एचकेएल भगत (अब नहीं हैं) पर आरोप लगे हैं, लेकिन उन्हें पार्टी से कभी निकाला नहीं गया।
कांग्रेस गुजरात दंगे की बात तो करती रही है लेकिन 84 के दंगे पर दोहरा मापदंड अपनाती है। गुजरात में एसआईटी बनी है, कइयों को सजा हुई है। नरेंद्र मोदी को एसआईटी और कोर्ट से क्लीन चिट मिली है, परंतु यहां कांग्रेस को कभी क्लीन चिट नहीं मिली। वहीं केजरीवाल पर जो लोग यह आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने कांग्रेस से साठगांठ करके सरकार बनाई है शायद एसआईटी के गठन की मांग कर केजरीवाल ने भी उन्हें जवाब देने की कोशिश की है। हालांकि कांग्रेस की ओर से आश्वासन दिया जाता रहा है कि सिखों को इंसाफ मिलेगा परंतु हर बार उन्हें निराशा ही मिली है। कुल मिलाकर 84 के दंगों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वह भी एक निश्चित समय सीमा में, क्योंकि सिखों को अभी तक न्याय नहीं मिला है और यह मामला अपनी परिणति तक नहीं पहुंच पाया है।
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