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पंद्रहवीं लोकसभा के इस आखिरी सत्र से उम्मीदें

यूपीए सरकार के लिए अपने चुनावी एजेंडे को पूरा करने के अंतिम मौके के रूप में है?

पंद्रहवीं लोकसभा के इस आखिरी सत्र से उम्मीदें
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नई दिल्ली. चुनावी माहौल को देखते हुए बुधवार से शुरू हो रहे संसद के इस सत्र में केंद्र की यूपीए-2 सरकार अपने वादों से जुड़े प्रमुख विधेयकों को पास कराने की तैयारी में दिख रही है। वैसे भी इस सत्र में लेखानुदान पास होना है, लेकिन जिस तरह से सत्र की रूप रेखा तैयार की गई है उससे तो यही आभास हो रहा है।
यह सत्र खास है, क्योंकि यूपीए सरकार के लिए अपने चुनावी एजेंडे को पूरा करने के अंतिम मौके के रूप में है? यह सत्र महज 12 दिनों का ही होगा और सरकार भी करीब 39 विधेयकों की सूची तैयार कर रखी है, जिसमें राहुल गांधी की छह महत्वाकांक्षी भ्रष्टाचार निरोधक संबंधी विधेयक सहित महिला आरक्षण, तेलंगाना और सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक प्रमुख हैं। इतने कम दिनों में इतने महत्वपूर्ण कार्य तभी संपन्न होंगे जब सभी दल बिना हंगामे के सत्र को चलाने में अपना योगदान देंगे।
हालांकि सत्र कितना फलदायी होगा यह तो वक्त ही बतायेगा, परंतु राजनीतिक गलियारों में विभिन्न मुद्दों व विधेयकों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्षी दलों के बीच जिस तरह के मतभेद हैं, उससे इस बात के कयास लगाये जा सकते हैं कि इस सत्र का क्या हश्र होगा। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने भी आशंका जताई है कि जिस तरह से बीते सत्र में तेलंगाना के मुद्दे पर आंध्र प्रदेश के कांग्रेस के ही नेता हंगामा करते रहे और संसद को बाधित करते रहे। वैसे ही आसार इस बार भी बन रहे हैं, क्योंकि आंध्र प्रदेश विधानसभा ने तेलंगाना विधेयक को खारिज कर दिया है, जबकि वहां केंद्र की सत्ताधारी पार्टी की सरकार है।
विपक्ष ने कहा है कि वह भ्रष्टाचार से जुड़े सभी छह विधेयक पारित करने को तैयार है परंतु आंध्र प्रदेश के सांसद हंगामा न करें और सदन चलने दें तब। वहीं महिला आरक्षण विधेयक को लेकर भी यूपीए के कई सहयोगी दलों में मतभेद है। हालांकि सत्तापक्ष ने विपक्ष से आग्रह है कि वह सभी विधेयकों को पारित कराने में सरकार का सहयोग करे। यहां यदि सत्तापक्ष यह साबित करना चाहता है कि संसद की कार्यवाही बाधित होने के लिए केवल विपक्ष ही जिम्मेदार है तो इसे सही नहीं कहा जा सकता।
अभी दोनों सदनों में मिलाकार 126 विधेयक लंबित पड़े हैं परंतु भ्रष्टाचार, घपलों-घोटालों व महंगाई के मोर्चे पर चौतरफा घिरी यूपीए सरकार अपनी सुविधानुसार कुछ विधेयकों पर ज्यादा जोर दे रही है तो इसकी वजह साफ है कि वह चुनावों में राजनीतिक लाभ लेना चाहती है। यहां हैरानी की बात यह भी है कि इन विधेयकों की सरकार को तभी याद क्यों आई है जब 15वीं लोकसभा अपने समापन की ओर है और देश आम चुनाव के मुहाने पर खड़ा है। 15वीं लोकसभा को भारत की संसदीय इतिहास में इसलिए भी याद रखा जाएगा कि इसके ज्यादातर समय हंगामे और शोरगुल की भेंट चढ़ गए हैं। संसद का सत्र बहुमूल्य होता है, यह बहस के लिए है न कि हंगामा करने के लिए। इसका अधिक से अधिक उपयोग होना चाहिए, तभी जनता के पैसे का सदुपयोग हो पायेगा और इस प्रकार से अंतत: लोकतंत्र की जड़ें ही गहरी होंगी। यह आखिरी सत्र होगा लिहाजा सभी दलों को इस बात की कोशिश करनी चाहिए कि इसका पूरा उपयोग हो और हंगामे की भेंट न चढ़े।
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