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पहले अपने गिरेवान में झांके पाकिस्तान

पाक सेना अक्सर सीमा पर सीजफायर का उल्लंघन कर गोलीबारी करती है, ताकि आतंकी भारत में घुसपैठ कर सकें।

पहले अपने गिरेवान में झांके पाकिस्तान
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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ संयुक्त राष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण मंच से कितना ही कश्मीर राग अलाप लें, लेकिन अब दुनिया उनका साथ देने वाली नहीं है। कश्मीर में अपनी करतूतों को लेकर उनका देश दुनिया के सामने पूरी तरह बेनकाब हो गया है। अनेक कुदरती खूबियों से परिपूर्ण कश्मीर आज रक्तरंजित है, तो इसकी सिर्फ एक ही वजह है, पाकिस्तान की कुत्सित मानसिकता या कहें इसे बलपूर्वक या छलपूर्वक हड़पने की मानसिकता। 1947 से लेकर अब तक वह इसी के लिए भारत के साथ तीन लड़ाइयां लड़ चुका है, सभी में उसे मुंह की खानी पड़ी है। जब उसे लगा कि वह भारत से सीधा मुकाबला नहीं कर सकता तो छद्म युद्ध का सहारा लेने लगा है। उसने प्रायोजित रूप से आतंकवाद को बढ़ावा देना आरंभ किया, जिसमें वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई और सेना का भरपूर साथ मिल रहा है।
आज दुनिया में उसे आतंकवाद की फैक्ट्री कहा जाने लगा है तो इसका कारण भी है। साठ से ज्यादा आतंकी संगठन पूरी तरह सक्रिय हैं। वे बाकायदा प्रशिक्षण कैंप लगाकर पाकिस्तानी युवाओं को आतंकवादी बनने की ट्रेनिंग दे रहे हैं। पाक सेना अक्सर सीमा पर सीजफायर का उल्लंघन कर गोलीबारी करती है, ताकि आतंकी भारत में घुसपैठ कर सकें। इन आतंकियों का इस्तेमाल वह कश्मीर और दूसरे राज्यों में हिंसा फैलाने के लिए करता है। वहीं भारत को कश्मीर सहित सीमावर्ती इलाकों में बड़े पैमाने पर सेना की तैनाती करनी पड़ी है तो इसकी वजह भी साफ है। भारत अपनी जमीन और नागरिकों की सुरक्षा चाहता है। कश्मीर में पाकिस्तान पोषित आतंकवाद ने इन दिनों जो हालात पैदा किया है, वैसे में तो वहां सेना की उपस्थिति और भी जरूरी है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भी उसकी दरिंदगी की सच्चाई सामने आ गई है। आज वहां हालात बद से बदतर हो गए हैं। जिससे लाखों लोग इन दिनों भारत के साथ जुड़ने की मांग को लेकर आंदोलित हैं जबकि पाकिस्तान की सेना उनकी आवाज को दबाने के लिए सारे हथकंडे अपना रही है।
यदि पाकिस्तान दुनिया की सहानुभूति चाहता है तो उसे आतंकवाद को अच्छे और बुरे में फर्क करना छोड़ सभी तरह की हिंसा को त्यागना होगा। एक तरफ भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देने और दूसरी तरफ बागी हुए गुटों पर कार्रवाई करने वाली दोहरी नीति नहीं चलने वाली। आज यदि वह भी आतंकवाद के दलदल में फंसा है तो यह उसकी ही नीतियों का परिणाम है। बागी आतंकी भी उसी के पैदा किए हुए हैं। कालांतर में यदि उसने आतंकवाद के बीज नहीं बोए होते तो आज उसे ये दिन नहीं देखने पड़ते। अभी भी समय है कि वह आतंकवाद का रास्ता छोड़ मानवता का मार्ग अपनाए और भारत के साथ शांतिपूर्ण माहौल में वार्ता कर सभी विवादों का मान्य हल खोजे।
भारत हमेशा से चाहता है कि पड़ोसी देश के साथ रिश्ते मधुर हों, लेकिन पाकिस्तान की चुनी हुई सरकारों पर वहां की सेना व कट्टरपंथी गुटों का ऐसा दबाव रहा है कि वे हर बार अपने वादे से मुकर जाती हैं, चाहे वह 1972 का शिमला समझौता हो या फिर आतंकवाद को समाप्त करने के लिए 2004 में हुई संयुक्त घोषणा पत्र। और ऐसा ही हाल गत दिनों उफा में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच बनी सहमति का रहा है। अब पाकिस्तान को तय करना है कि उसे क्या करना है क्योंकि संबंध खराब होने की वजह उसकी नीति ही है। साथ ही भारत पर कोई आरोप लगाने से पहले उसे अपने गिरेबान में झांकना चाहिए।
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