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आलोक पुराणिक का लेख : खरीद पर अर्थव्यवस्था कायम

केंद्र सरकार कर्मियों को 10000 रुपये का एडवांस देगी। इस कदम से अर्थव्यवस्था में 8000 करोड़ रुपये का प्रवाह आने की उम्मीद है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने उम्मीद जताई है कि केंद्रीय कर्मियों जैसी स्कीम की तर्ज पर स्कीम निजी कंपनियां भी लाएं, ताकि बाजार में मांग का नया प्रवाह खड़ा हो। मांग का सुचक्र घूमे। केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और निजी क्षेत्र की कंपनियां मिल-जुलकर अर्थव्यवस्था को तेजी की दिशा दें, यही उम्मीद फिलहाल की जा सकती है।

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प्रतीकात्मक

आलोक पुराणिक

केंद्र सरकार अर्थव्यवस्था में जान फूंकने की कोशिशें कर रही है। कोरोना जनित मंदी ने अर्थव्यवस्था की सूरत बिगाड़ दी है। इस वजह से लोगों के मन में डर भी बैठ गया है कि जाने भविष्य में क्या हो, इसलिए अर्थव्यवस्था में वो लोग भी खरीद स्थगित कर रहे हैं, जिनकी आय वगैरह को कोरोना के चलते खास नुकसान नहीं हुआ है। उदाहरण के लिए सरकारी कर्मचारियों को तो उनका वेतन वगैरह नियमित मिला है। फिर भी अर्थव्यवस्था में तमाम आइटमों की खरीद उस गति से नहीं हो रही है, जिस गति से हो सकती थी, इसलिए केंद्र सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों को लक्षित करके जो घोषणाएं की हैं, उनसे बाजार में कुछ मांग पैदा होने की उम्मीद की जा सकती है।

केंद्र सरकार कर्मियों को 10000 रुपये का एडवांस देगी, जिसे दस आसान किश्तों में चुकाया जा सकेगा। इस कदम से अर्थव्यवस्था में 8000 करोड़ रुपये का प्रवाह आने की उम्मीद है। केंद्र सरकार ने एलटीसी यानी पर्यटन सुविधा के बदले कर्मियों को नकद वाउचर देने के प्रस्ताव किया है, इस प्रस्ताव से करीब 28000 करोड़ रुपये का प्रवाह अर्थव्यवस्था में आ सकता है। राज्यों को भी केंद्र सरकार ने 12000 करोड़ रुपये का प्रोत्साहन दिया है। केंद्र सरकार ने अपने खर्च में 25000 करोड़ रुपये बढ़ाने का प्रस्ताव किया है। इस तरह से करीब 73000 करोड़ रुपये का प्रवाह अर्थव्यवस्था में आ सकता है। 73000 करोड़ रुपये का प्रवाह बाजार में अतिरिक्त आ जाए, तो कोई वस्तुओं और सेवाओं के कारोबार में नई जान आ सकती है। हालांकि कई उद्योग तो कोरोना के झटके से तेजी से उबर रहे हैं, आटोमोबाइल उद्योग ऐसा ही उद्योग है, जो तेजी से पुरानी गति की ओर लौट रहा है। केंद्र सरकार ने जिस तरह से मांग के प्रवाह को पैदा करने की कोशिश की है, उसी कोशिश के माॅडल को अगर राज्य सरकारें अपनाती हैं और निजी क्षेत्र एक हद तक इस माॅडल को अपनाता है, तो कुल मिलाकर करीब 1 लाख करोड़ रुपये बाजार में आ सकते हैं। हालांकि पर्यटन सुविधा के बदले नकद देने का प्रस्ताव कुछ शर्तों के साथ बद्ध है, पर मोटे तौर पर यह माना जाना चाहिए कि इन सारे प्रस्तावों से बाजार में मांग का एक नया प्रवाह आ सकता है। बाजार को मांग की सख्त जरूरत है।

जरूरत है कि लोग बाजार में निकलें औऱ बेखौफ होकर खरीदारी करें, ताकि कारों से लेकर मोबाइल तक और कपड़ों से लेकर मकानों तक की खरीद में इजाफा हो। तभी नए निवेश के अवसर बनेंगे। सरकार का आशावाद अपनी जगह है पर आम जनता के मन से भय निकालना इतना आसान नहीं है। एक आम आदमी इस आशंका से डरा हुआ है कि कहीं उसका या उसके किसी परिवारजन का सामना कोरोना से हो गया, तो उसकी निजी अर्थव्यवस्था बहुत आहत हो जाएगी। इस डर से वह तमाम खर्चों को रोके हुए है। अगर स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति आम आदमी आश्वस्त रहे, तो उसकी तरफ से एक बड़ा प्रवाह बाजार की तरफ आ सकता है। हाल के प्रस्ताव मूलत केंद्रीय कर्मियों के लिए हैं, अब केंद्रीय कर्मियों को बाजार में उतरकर मांग बढ़ाकर देश और अर्थव्यवस्था की सेवा करने में अपनी भूमिका निभानी ही चाहिए। केंद्र सरकार के कर्मी संकट से मुक्त रहे हैं, क्योंकि उनके वेतन भत्तों पर किसी किस्म का संकट नहीं आया है, जबकि निजी क्षेत्र के नौकरीपेशा लोग और छोटे कारोबारी तो एकदम ध्वस्त ही हो गए हैं। निजी क्षेत्र के बेरोजगार लोगों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वे बाजार में नई मांग लेकर आएंगे। हालांकि केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने यह उम्मीद जरूर जताई है कि केंद्रीय कर्मियों के लिए जो स्कीम लाई गई है, उसी स्कीम की तर्ज पर कोई स्कीम निजी कंपनियां भी लाएं, ताकि बाजार में मांग का नया प्रवाह खड़ा हो। मांग का सुचक्र घूमे। केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और निजी क्षेत्र की कंपनियां मिल-जुलकर अर्थव्यवस्था को तेजी की दिशा दें, यही उम्मीद फिलहाल की जा सकती है।

केंद्र सरकार की तर्ज पर उत्तर प्रदेश सरकार ने ऐसा ही पैकेज राज्य सरकार के कर्मियों को देने का फैसला किया। इसमें उत्तर प्रदेश सरकार का करीब 2000 करोड़ रुपये का खर्च संभावित है। उम्मीद है कि इस रकम का एक बड़ा हिस्सा बाजारों का रुख करेगा। यह वक्त ऐसा है कि जब किसी भी अतिरिक्त आय को बाजार में ही खर्च करने से अर्थव्यवस्था का रुख सुधरेगा। दरअसल किसी भी वस्तु या सेवा की खरीद से बाजार में मांग का सुचक्र चलता है। जैसे अगर कोई व्यक्ति अपने घर की पेंटिंग का काम कराता है, तो चार दिहाड़ी मजदूरों को रोजगार मिलता है। बाजार में पेंट की मांग बढ़ती है। पेंट के साथ दो चार और चीजों की मांग भी बढ़ जाती है। मजदूर घर में मांग करेंगे, उन्हें चाय आदि देनी है, तो उस घर में कुछ अतिरिक्त खरीद हो जाती है। इस तरह से खरीद से अर्थव्यवस्था का सुचक्र चलता है और मांग लगातार बढ़ती जाती है। केंद्र सरकार को उम्मीद है कि यह चक्र चले, तेजी से घूमे। तभी अर्थव्यवस्था में जान आएगी। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को इस समय मिलकर मांग का सुचक्र तेज करना चाहिए, यही समय की मांग है।

केंद्र सरकारों और राज्य सरकारों को अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए मिल-जुलकर बैठना चाहिए। इस दिशा में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रस्ताव रखा कि माल और सेवाकर के मसले पर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच उपजे गतिरोध को तोड़ने के लिए केंद्र सरकार 1.10 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेगी और इसे राज्य सरकारों को दे देगी। राज्य सरकारों को कर्ज नहीं लेना पड़ेगा। गौरतलब है कि केंद्र सरकार को कर्ज कम ब्याज दरों पर मिल जाता है। राज्य सरकारों के लिए कर्ज लेना महंगा पड़ता है। इस कर्ज की अदायगी भविष्य में उस कोष से होगी, जिसमें माल और सेवाकर से जुड़े उपकरों का संग्रह किया जाता है। यानी राज्य सरकारों पर इस कर्ज को चुकाने का अतिरिक्त दायित्व भी नहीं आएगा। इस तरह से केंद्र सरकार ने जीएसटी विवाद पर पटाक्षेप करने की कोशिश की है। देखना है कि यह विवाद अब क्या रुख लेता है। पर यह वक्त विवाद का नहीं है। मिल-जुलकर सामंजस्य के साथ अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर आगे बढ़ने का है। कोरोना से उपजा संकट अभूतपूर्व है। इससे निपटने के उपाय भी अभूतपूर्व ही होंगे। आम राजनीतिक विवादों से इस समय बचना ही समय की आवश्यकता है।

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