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संपादकीय लेख : अर्थव्यवस्था का तेजी से रिकवर करना आवश्यक

टीकाकरण की गति पर ही इकोनॉमी की रिकवरी और उसकी गति निर्भर करेगी। लगभग तमाम अर्थशास्त्रियों और आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक और आरबीआई जैसी संस्थाओं का भी यही मानना है। मई के मध्य में आई अपनी रिपोर्ट में आरबीआई ने यह कहा था कि कई मोर्चे पर चुनौतियां हैं, लेकिन कोरोना की दूसरी लहर का इकोनॉमी पर उतना ज्यादा असर नहीं देखने को मिलेगा, जितना कि 1 साल पहले देखने को मिला था।

संपादकीय लेख : अर्थव्यवस्था का तेजी से रिकवर करना आवश्यक
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : एक तरफ खाने-पीने की और पेट्रोल-डीजल की महंगाई बढ़ रही है, दूसरी तरफ घरेलू और ग्लोबल वित्तीय संस्थाएं चालू वित्त वर्ष के दौरान भारत के ग्रोथ अनुमान को घटा रहे हैं। ऐसे में वित्त सचिव टीवी सोमनाथन का कहना कि कोरोना की दूसरी लहर का आर्थिक प्रभाव पहली लहर से कम रहेगा, इससे वे अर्थव्यवस्था के रिकवर होने के संकेत दे रहे हैं, लेकिन आंकड़े और दावों में बहुत गैप दिखाई दे रहा है। दरअसल, सरकार का यह मानना है कि कोरोना की दूसरी लहर का आर्थिक प्रभाव उतना ज्यादा गंभीर नहीं होगा, जितना कि पहली लहर का असर देखने को मिला था।

टीकाकरण की गति पर ही इकोनॉमी की रिकवरी और उसकी गति निर्भर करेगी। लगभग तमाम अर्थशास्त्रियों और आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक और आरबीआई जैसी संस्थाओं का भी यही मानना है। मई के मध्य में आई अपनी रिपोर्ट में आरबीआई ने यह कहा था कि कई मोर्चे पर चुनौतियां हैं, लेकिन कोरोना की दूसरी लहर का इकोनॉमी पर उतना ज्यादा असर नहीं देखने को मिलेगा, जितना कि 1 साल पहले देखने को मिला था। इस समय देश में कोरोना की पहली लहर की तुलना में स्थितियां काफी बेहतर हैं। जब पहली लहर के दौरान भारत में लॉकडाउन का ऐलान किया गया था तो देश की जीडीपी में 7.3 फीसदी का संकुचन आया था। कोरोना के दूसरी लहर के दौरान नेशनल लॉकडाउन ना घोषित किए जाने की वजह से देश में इकोनॉमिक गतिविधियां चालू रहीं। उनकी गति भले ही धीमी रही हो।

इस वर्ष लॉकडाउन में नरमी के साथ ही आर्थिक गतिविधियों में रिकवरी देखने को मिल रही है। बिजली की खपत बढ़ रही है। वाहनों का रजिस्ट्रेशन बढ़ता दिख रहा है। निर्यात और रेलवे के जरिये माल के यातायात में भी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। मई महीने मे जीएसटी कलेक्शन 1 लाख करोड़ रुपये के पार रहा है जिससे सेंटिमेंट में सुधार आता नजर आ रहा है। वित्त मंत्रालय ने अपनी मासिक आर्थिक रिपोर्ट में कहा है कि आर्थिक रिकवरी में तेजी लाने के लिए देश में जल्द से जल्द हर्ड इम्यूनिटी (75-80 फीसदी आबादी) लानी होगी। सबसे चिंता की बात है कि कोविड की दूसरी लहर के दौरान राज्यों में लॉकडाउन व पाबंदियां आदि बढ़ने से महंगाई बहुत बढ़ी है। पेट्रोल का दाम ही कुछ जगहों पर सौ रुपये प्रति लीटर के करीब तक पहुंच गया है। एक समाचार एजेंसी के सर्वे के मुताबिक मई में खुदरा महंगाई 5.30 फीसदी का स्तर छू सकती है। अप्रैल में 4.29 फीसदी महंगाई दर थी। पिछले छह माह से रिटेल महंगाई दर रिजर्व बैंक की ओर से तय रेंज के भीतर ही है, इसके बावजूद कि खाने-पीने के सामान के दाम कोरोना काल में कई गुणा तक बढ़ गए हैं। अनुमान महंगाई के बढ़ने के संकेत दे रहे हैं।

महंगाई बेकाबू होगी तो लोगों के खर्च करने के पैटर्न बदलेंगे, उपभोक्ता खपत में बदलाव होगा, जिससे जीडीपी प्रभावित होगी। रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2022 में भारत की जीडीपी ग्रोथ 10.5 से घटा कर 9.5 फीसदी कर दिया है। विश्व बैंक ने कहा कि भारत की जीडीपी दर वित्त वर्ष 2021-22 में 8.3 प्रतिशत रह सकती है। आगे 2022 में भी इसकी दर 7.5% रहने का अनुमान है। इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा खर्च, रूरल डेवलपमेंट, हेल्थ और उम्मीद से बेहतर सर्विस और मैन्युफैक्चरिंग में रिकवरी और पॉलिसी सपोर्ट से अर्थव्यवस्था को फायदा मिलेगा। रेटिंग एजेंसी इक्रा ने भी कहा है कि वित्त वर्ष 2021-22 में देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 8.5 प्रतिशत रह सकती है। अभी जरूरी है कि देश में अर्थव्यवस्था को बूस्ट करने के लिए नीतिगत सपोर्ट के साथ सेंटिमेंट को भी बनाए रखा जाए।

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