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विकेश कुमार बड़ोला का लेख: बाद का विषय है अर्थव्यवस्था

सभी देश खुद को इस संकट से निकालने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए सामान्य राजनीति और अन्य सामाजिक मतभेद एक किनारे रख दिए गए हैं। देशों के मध्य परस्पर विवाद भी भूले-बिसरे हो चुके हैं। सामान्य जन-जीवन बुरी तरह प्रभावित है।

विकेश कुमार बड़ोला का लेख: बाद का विषय है अर्थव्यवस्था

अधिसंख्य देश कोरोना महामारी की चपेट में हैं। सभी देश खुद को इस संकट से निकालने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए सामान्य राजनीति और अन्य सामाजिक मतभेद एक किनारे रख दिए गए हैं। देशों के मध्य परस्पर विवाद भी भूले-बिसरे हो चुके हैं। सामान्य जन-जीवन बुरी तरह प्रभावित है। राष्ट्रों की महाशक्ति का प्रमुख आधार अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है। अपने-अपने देशों की सरकारों के विरोध में खड़ी लेफ्टिस्ट मीडिया जमात को घूम-फिर कर सबसे बड़ी चिंता अर्थव्यवस्था की है। इन मूर्खों को कौन, कैसे समझाए कि प्राणों के संकट के सामने केवल और केवल जीवित रहने का मंत्र साधना चाहिए।

अर्थव्यवस्था तो बाद की बात है। लेफ्टिस्ट मीडिया की पतित पत्रकारिता यहीं तक सीमित नहीं। भारत ही नहीं विश्व के वामपंथी, धर्मनिरपेक्षी और प्रगतिवादी महामारी काल में लोगों के कल्याण के लिए धन-संसाधन देकर सहायता नहीं कर रहे। इन्हें दान-पुण्य में कभी विश्वास नहीं रहा। यहां तक कि अपने विचारों, लेखों और भाषणों से वे कुतर्क परोस रहे हैं। भारत से लेकर अमेरिका तक लेफ्टिस्ट मीडिया का चरित्र अनुत्तरदायी और लोकविरोधी बना हुआ है। कुछ राइट विंग समाचारपत्रों और चैनलों को छोड़ शेष सभी समाचारपत्र और चैनल वाले एजेंडे के तहत परोसे गए समाचारों को ही प्रसारित कर रहे हैं। हाल में लेफ्टिस्ट का मानवता विरोधी चरित्र तब देखने को मिला जब अमेरिकी राष्ट्रपति का भारत से हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा मांगने के संबंध में एक प्रेस वक्तव्य सामने आया।

अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा मीडिया को दिया गया ऐसा वक्तव्य जिस भी मूल स्रोत से आया है, भारतीय मीडिया के लिए समाचार वितरक की भूमिका निभाने वालों ने उस स्रोत के मूल वीडियाे में हुई छेड़छाड़ पर ध्यान नहीं दिया। वास्तव में राष्ट्रपति का जो वक्तव्य था वह मूलतः यही स्पष्ट करता था कि उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री से अमेरिका के हालात को ध्यान में रख हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की दवा भेजने का अनुरोध किया है और उन्हें आशा है कि मोदी उनकी बात मानेंगे। इस वक्तव्य के बदले ट्रंप के सम्मुख प्रेस ब्रीफ के लिए खड़े मीडिया कर्मियों में से किसी ने एक अव्यवहारिक और अनावश्यक प्रश्न उछाल दिया कि यदि मोदी दवा नहीं भेजेंगे तो आप क्या करेंगे। इस प्रश्न के उत्तर में ट्रंप ने जो कुछ बोला, उस मूल बात को जानने-समझने का किसी ने कष्ट तक नहीं किया। महामारी से आक्रांत विश्व में भारत-अमेरिका को भिड़ाने के लिए भारत के समाचारपत्रों, चैनलों में बढ़ा-चढ़ाकर ये फैला दिया गया कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा न भेजे जाने पर ट्रंप ने भारत को बदले की कार्रवाई की धमकी दी है।

वैसे तो मुख्य मीडिया में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभुत्व के भय से सोशल मीडिया मंच को अफवाहों, फेक और कॉपी-पेस्ट न्यूज का मंच कहा जाता है, परंतु यदि ट्रंप के वक्तव्य के संबंध में मुख्य मीडिया के वामपंथी धड़े द्वारा फैलाए जा रहे झूठ का अवलोकन किया जाए तो यही सिद्ध होता है कि मुख्य मीडिया पर लेफ्टिस्ट का वही सेट एजेंडा चलता है, जो वे भारत की मोदी व अमेरिका की ट्रंप सरकार के विरोध में हरसंभव तरीके से चलाना चाहते हैं। वामपंथी मीडिया इतना अनुदार, अनुत्तरदायी और लोकविरोधी है कि उसने अभी तक महामारी के जनक चीन पर अपने द्वारा परिचालित मीडिया के माध्यम से कोई आरोप नहीं लगाया। उसने अभी तक चीन को उसके किए के लिए प्रश्नाकुल दृष्टि से नहीं देखा। इतना ही नहीं, वामपंथी मीडिया ने विश्व के लिए संकट बने चीन, उत्तर कोरिया, सीरिया, इराक, पाकिस्तान, अफगानिस्तान इत्यादि देशों को उनकी अनेक करतूतों के लिए कभी भी जवाबदेह नहीं ठहराया।

वामपंथी मीडिया का सबसे घिनौना प्रयोग भारत देश में चल रहा है। जिस कांग्रेस पार्टी ने देश को रसातल में डाला, घोटालों-घपलों के अंबार लगाए, नागरिकों को विसंगत जीवन जीने के लिए विवश किया और हिन्दू बाहुल्य होकर भी भारत को तुष्टीकरण-मौलवीकरण में लपेटकर बुरी तरह आक्रांत कर दिया, उसी पार्टी के नेताओं के गलत वक्तव्यों को वामपंथी मीडिया कभी नहीं दिखाता या प्रसारित करता। मीडिया संस्थानों में बैठे लेफ्टिस्ट मीडियाकर्मी इस भ्रम में जी रहे हैं कि उनके व्यर्थ-निरर्थ विमर्श को जनस्वीकृति मिलेगी। वे सोशल मीडिया में अपने मीडिया कारनामों के परखच्चे उड़ते देखकर भी इस मतिभ्रम से ग्रस्त हैं कि पत्रकारिता क्षेत्र उनके कारण खड़ा है अथवा खड़ा रहेगा। वस्तुतः लेफ्टिस्ट मीडिया के ऐसे दोष पूरी पत्रकारिता के परिदृश्य को विकृत कर रहे हैं।

जिन अधिसंख्य लोगों के पास किसी भी बात का गहन मूल्यांकन करने की अंतदृष्टि नहीं है, वे लेफ्टिस्ट मीडिया द्वारा पत्रकारिता की आड़ में प्रसारित की जा रही विकृतियों और सज्जन मीडियाकर्मियों द्वारा संपन्न की जा रही लोकहितैषी पत्रकारिता में अंतर नहीं देख पा रहे। ऐसा भी हो रहा है कि सरकार और समाज लोकहितैषी पत्रकारिता की चर्चा कम कर रहे हैं और विकृत पत्रकारिता की निंदा अधिक कर रहे हैं। इस कुचक्र को तोड़ने के लिए राइटविंग मीडिया के सम्मुख उत्तरदायित्व और चुनौतियां दोनों खड़े हैं। महामारी के इस समय में राइटविंग मीडिया को सरकार की सही नीतियों का समर्थन-प्रसारण तो करना ही है, साथ ही उसे सरकार की उन नीतियों की समालोचना भी अवश्य करनी है, जो लेफ्टिस्ट मीडिया और उसके देशी-विदेशी मूल स्रोत को उनके किए का उचित दंड देने के बदले उन्हें उनके मानवविरोधी दुष्प्रचार के लिए खुला घूमने देने की पक्षधर हैं।

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