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अर्थशास्त्र विश्लेषण / अर्थव्यवस्था पर बढ़ते राजकोषीय घाटे की चुनौती

हाल ही में 25 अक्टूबर को भारत सरकार के लेखा महानियंत्रक के द्वारा प्रकाशित किए गए आंकड़ों के अनुसार केन्द्र सरकार का राजकोषीय घाटा वित्तीय वर्ष 2018-19 के तहत अप्रैल से सितम्बर 2018 में ही पूरे वर्ष के लिए निर्धारित 6.24 लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य के 95.3 फीसदी पर पहुंच गया है।

अर्थशास्त्र विश्लेषण / अर्थव्यवस्था पर बढ़ते राजकोषीय घाटे की चुनौती
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हाल ही में 25 अक्टूबर को भारत सरकार के लेखा महानियंत्रक के द्वारा प्रकाशित किए गए आंकड़ों के अनुसार केन्द्र सरकार का राजकोषीय घाटा वित्तीय वर्ष 2018-19 के तहत अप्रैल से सितम्बर 2018 में ही पूरे वर्ष के लिए निर्धारित 6.24 लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य के 95.3 फीसदी पर पहुंच गया है। पिछले वित्त वर्ष की पहली छमाही में राजकोषीय घाटा लक्ष्य का 91.3 फीसदी था।

यकीनन बढ़ते हुए राजकोषीय घाटे से आम आदमी से लेकर अर्थव्यवस्था तक की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। चालू वित्त वर्ष 2018-19 में जहां एक ओर सरकारी आमदनी लक्ष्य के अनुरूप नहीं है। वहीं दूसरी ओर सरकारी खर्च लक्ष्य से अधिक बढ़ते गए हैं। परिणामस्वरूप सरकार के समक्ष राजकोषीय घाटे (फिस्कल डेफिसिट) का लक्ष्य पूरा करना एक कठिन चुनौती है।

सरकार का लक्ष्य है कि 2018-19 के दौरान राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 3.3 फीसदी से ज्यादा न हो, लेकिन चालू वित्तीय वर्ष में अप्रत्यक्ष कर संग्रह लक्ष्य से बहुत नीचे है। विनिवेश लक्ष्य प्राप्ति से दूर है। तेल सब्सिडी व अनाज सब्सिडी का अतिरिक्त बोझ स्पष्ट दिखाई दे रहा है। परिणामस्वरूप राजकोषीय घाटा निर्धारित लक्ष्य से कुछ अधिक जीडीपी के 3.5 प्रतिशत पर पहुंच सकता है।

निश्चित रूप से सुस्त जीएसटी संग्रह और अतिरिक्त व्यय प्रतिबद्धताओं की वजह से सरकार नाजुक संतुलन स्थापित करने का काम कर रही है। प्रत्यक्ष कर संग्रह उत्साहजनक है, लेकिन जीएसटी और विनिवेश से आमदनी का निर्धारित लक्ष्य पाना मुश्किल है। उपलब्ध आंकड़ोंं को देखें तो वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के माध्यम से उम्मीद से 1 लाख करोड़ रुपये कम कर आने की संभावना है।

इसके साथ ही अतिरिक्त अनुमानित व्यय 28,000 करोड़ रुपये है। विगत 5 अक्टूबर को पेट्रोल-डीजल के उत्पाद शुल्क में कटौती से 10,500 करोड़ रुपये का कुल राजस्व नुकसान हो सकता है। इसमें से केंद्र सरकार 6,100 करोड़ रुपये का बोझ उठाएगी। केंद्र सरकार के आंतरिक व्यय अनुमान से पता चलता है कि सितम्बर 2018 में मोटे अनाज और दलहन के लिए घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य बाध्यताओं को पूरा करने के लिए 20,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त आवंटन की जरूरत होगी।

यह बजट में अनुमानित 1.69 लाख करोड़ रुपये खाद्य सब्सिडी के ऊपर होगा। इस साल के लिए ईंधन सब्सिडी 25,000 करोड़ रुपये रखी गई है। बहरहाल कच्चे तेल की कीमत बहुत ज्यादा बढ़ जाने के कारण सरकार को अब इस मद में भी 12,500 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करने होंगे। सरकार ने घोषणा की थी कि वह सरकारी विमान कंपनी एयर इंडिया को बजट में घोषित 16,300 करोड़ रुपये धन के अतिरिक्त 2,000 करोड़ रुपये मुहैया कराएगी। वहीं आयुष्मान भारत का बजट 3,500 करोड़ रुपये बढ़ सकता है।

इतना ही नहीं 4 नवंबर 2018 के बाद कच्चे तेल की कीमतों के नए आसमान छूने की आशंकाएं भी बढ़ जाने से राजकोषीय घाटे की चिंताएं और बढ़ गई हैं। गौरतलब है कि सऊदी अरब के द्वारा वाशिंगटन पोस्ट के पत्रकार और अमेरिकी नागरिक जमाल खाशोगी की हत्या स्वीकार किए जाने के बाद यदि ट्रंप प्रशासन के द्वारा सऊदी अरब के खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई की जाती है, तो सऊदी अरब ऐसा होने पर कच्चे तेल का उत्पादन घटा देगा। दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक सऊदी अरब प्रतिदिन एक करोड़ बैरल तेल का उत्पादन करता है।

1973-74 में इजरायल और अरब देशों के बीच लड़ाई के दौरान सऊदी अरब ने कच्चे तेल का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में करके पूरी दुनिया की मुश्किलें बढ़ा दी थी। कच्चे-तेल के बढ़ते हुए बिल से देश के सामने राजकोषीय घाटे की भारी आशंका दिखाई दे रही है। निश्चित रूप से सरकार ने वैश्विक आर्थिक घटनाक्रम के कारण देश के राजकोषीय घाटे की बढ़ती चिंताएं लगातार अनुभव की हंै। यही कारण है कि कमजोर होते रुपये और बढ़ते कच्चे तेल के दाम की वजह से सरकार लगातार अपने जमा और खर्च के अकाउंट की समीक्षा कर रही है।

इस दौरान कई कम जरूरी चीजों पर इम्पोर्ट ड्यूटी भी बढ़ाई गई है। पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने 13 अक्टूबर को विदेशी मुद्रा बचाने के मकसद से आयात घटाने की रणनीति के तहत स्मार्टवॉच, मोबाइल फोन के पार्ट्स और टेलीकॉम इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है। स्मार्टवाच समेत कुछ वस्तुओं पर आयात शुल्क 10 फीसदी से बढ़ाकर 20 फीसदी किया गया है। मोबाइल फोन में इस्तेमाल होने वाले प्रिंटेड सर्किट बोर्ड समेत कुछ वस्तुओं पर ड्यूटी बढ़ाकर 10 फीसदी तक की गई है।

सरकार ने विगत 26 सितंबर को 19 वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाया था। इनमें एसी, फ्रिज और 10 किलो तक क्षमता वाली वॉशिंग मशीन भी शामिल थीं। नि:संदेह आयात में कमी लाने के ऐसे प्रयासों से चालू खाते के बढ़ते हुए घाटे को कम किया जा सकेगा। अब कुछ और आयतित वस्तुओं को आयात शुल्क दायर में लिया जाना चाहिए। लेकिन ऐसे आयातों को नियंत्रण से मुक्त रखा जाना होगा जिनका दवाई निर्माण से संबंध है और जिनका निर्यात उद्योग से भी संबंध है।

चीन और अमेरिका के बीच चल रहे व्यापार युद्ध से भारत के हितों के संरक्षण साथ-साथ चालू खाते के घाटे को पाटने के लिए तथा चीन से डंपिंग बढ़ने की आशंका के मद्देनजर कुछ सामानों के आयात पर अंकुश जरूरी दिखाई दे रहा है। अमेरिका में क्रिसमस और छुट्टियों के लिए चीन में जो सामान बनाया जा रहा है, अगर उसे अमेरिका के बाजारों में कम मात्रा में भेजा गया तो उसके भारतीय बाजारों में आने की आशंका बढ़ जाएगी। निश्चित रूप से गैर जरूरी आयातित वस्तुओं पर आयात शुल्क का दायरा बढ़ने से भी राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखा जा सकेगा।

इसमें कोई दो मत नहीं है कि लगातार बढ़ते चालू खाता घाटा पर लगाम के लिए सरकार तमाम नए प्रयास कर रही है। अब सरकार वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान बचे महीनों में होने वाले गैर जरूरी खर्चों पर लगाम लगाने की रणनीति बना रही है। मौजूदा वित्त वर्ष में सरकार अपना उधारी कार्यक्रम पहले ही 70 हजार करोड़ रुपये घटाकर 6.05 लाख करोड़ रुपये कर चुकी है। यदि सरकार राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के विभिन्न प्रयासों से राजकोषीय घाटे को लक्ष्य के अनुरूप जीडीपी के 3.3 फीसदी के स्तर पर बनाए रखने पर सफल होगी, तो यह सरकार की बड़ी उपलब्धि होगी।

ऐसे स्तर पर आम आदमी से लेकर अर्थव्यवस्था को मुश्किलों से बचाया जा सकेगा। बढ़ते हुए राजकोषीय घाटे से आम आदमी से लेकर अर्थव्यवस्था तक की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। चालू वित्त वर्ष 2018-19 में जहां एक ओर सरकारी आमदनी लक्ष्य के अनुरूप नहीं है। वहीं दूसरी ओर सरकारी खर्च लक्ष्य से अधिक बढ़ते गए हैं। सरकार के समक्ष राजकोषीय घाटे का लक्ष्य पूरा करना एक कठिन चुनौती है। यदि सरकार राजकोषीय घाटे को लक्ष्य के अनुरूप जीडीपी के 3.3 फीसदी के स्तर पर बनाए रखने पर सफल होगी, तो यह बड़ी उपलब्धि होगी।

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