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अर्थशास्त्र विश्लेषण / क्या कहते हैं भारत के आर्थिक संकेत...?

निश्चित रूप से ऐसे समय में जब देश आर्थिक चुनौतियों और मुश्किलों का सामना कर रहा है तब देश के आर्थिक परिदृश्य पर दो अच्छे आर्थिक संकेत दिखाई दिए हैं।

अर्थशास्त्र विश्लेषण / क्या कहते हैं भारत के आर्थिक संकेत...?

निश्चित रूप से ऐसे समय में जब देश आर्थिक चुनौतियों और मुश्किलों का सामना कर रहा है तब देश के आर्थिक परिदृश्य पर दो अच्छे आर्थिक संकेत दिखाई दिए हैं। एक, 22 अक्टूबर को केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने करदाताओं की संख्या बढ़ने और प्रत्यक्ष कर संग्रह बढ़ने के आंकड़े प्रकाशित किए हैं। दो, 17 अक्टूबर को विश्व आर्थिक मंच ने प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था के रूप में भारत की रैंकिंग में सुधार किया है।

केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड की रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले चार वर्षों में देश में आयकरदाताओं की संख्या में 80 फीसदी की वृद्धि हुई है तथा देश में करोड़पतियों की संख्या 60 फीसदी बढ़ी है। देश में वर्ष 2013-14 में 3.79 करोड़ लोगों ने आयकर रिटर्न दाखिल किया था जबकि वर्ष 2017-18 में यह आंकड़ा 6.85 करोड़ पहुंच गया है।

इतना ही नहीं देश में एक करोड़ रुपये सालाना से ज्यादा की कमाई करने वाले करदाता लोगों की संख्या 1.40 लाख हो गई है। सरकार ने पिछले चार वर्षों में कड़े कानून बनाकर कालेधन पर जो लगाम लगाई है, बेनाम संपत्तियों के खिलाफ कानून बनाया है, बाजार में मौजूद बड़ी मात्रा में नकदी को बैंक सिस्टम में लाया गया है और जीएसटी लागू होने के कारण आर्थिक सुधारों को दिशा तथा अर्थव्यवस्था को मजबूती भी मिली है।

विगत 17 अक्टूबर को विश्व आर्थिक मंच द्वारा दुनिया के 140 देशों की अर्थव्यवस्थाओं की प्रतिस्पर्धा क्षमता के आधार पर तैयार की गई सूची में भारत को 62 अंक के साथ 58वीं पायदान पर रखा गया है। पिछले साल भारत इस सूची में 62वें स्थान पर था। इस सूची में अमेरिका पहले, सिंगापुर दूसरे और जर्मनी तीसरे नंबर पर हैं। खास बात यह है कि जी-20 देशों में सबसे अधिक सुधार भारत की रैंकिंग में हुआ है।

वैश्विक प्रतिस्पर्धी सूचकांक किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की उत्पादकता और अन्य विकास के स्तर को तय करने के लिए 12 मानदंडों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है। इनमें आधारभूत ढांचा, तकनीकी विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल, उत्पाद, श्रम बाजार, वित्तीय प्रणाली, नवाचार आदि शामिल हैं।

निश्चित रूप से अर्थव्यवस्था के तहत प्रतिस्पर्धा के मापदंडों पर आगे बढ़ने के कारण ही कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और डॉलर की तुलना में रुपये में भारी गिरावट के बाद भी भारत विकास दर के मामले में दुनिया में सबसे आगे है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने अपनी नई रिपोर्ट में कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेज रफ्तार से आगे बढ़ रही है। वर्ष 2018-19 में भारत की विकास दर 7.3 फीसदी रहेगी।

आईएमएफ ने रिपोर्ट में कहा है कि हाल ही के वर्षों में भारत ने अच्छे आर्थिक सुधार किए हैं। कुछ आर्थिक सुधारों का भारत को विशेष रूप से फायदा हुआ है। जीएसटी के कारण दीर्घावधि में लाभ पहुंचेगा। वहीं रिजर्व बैंक के तहत 2016 से शुरू किए गए सक्रिय मुद्रास्फीति अनुमान नेटवर्क की भी प्रशंसा की है। आईएमएफ ने व्यापार में सुधार और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को और अधिक उदार बनाने के लिए भी भारत की प्रशंसा की है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगले कुछ दशकों तक वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था वृद्धि का प्रमुख स्रोत बनी रहेगी। दुनिया के लिए भारत का वही योगदान होगा, जो कि अब तक चीन का रहा है। चूंकि भारतीय कार्यबल जनसंख्या में गिरावट आने में अभी कोई तीन दशक का समय है, ऐसे में भारत की नई पीढ़ी को कौशल विकास से प्रशिक्षित करके दुनिया की नई आर्थिक ताकत बनाया जा सकता है।

भारत की अर्थव्यवस्था वित्तीय प्रणाली और उत्पादों की ताकत और बढ़ती हुई क्रय शक्ति के आधार पर पहले से अब मजबूत बनती जा रही है। परिणामस्वरूप भारत का सकल घरेलू उत्पाद लगातार बढ़ता जा रहा है। विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2017 के अंत में भारत का सकल घरेलू उत्पाद 178.59 खरब का हो गया।

ऐसे में जीडीपी के आंकड़ों के आधार पर भारत फ्रांस को पछाड़कर दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। यदि भारत आर्थिक और कारोबार सुधारों की प्रक्रिया को वर्तमान की तरह निरंतर जारी रखता है तो वह वर्ष 2018 में ब्रिटेन को पीछे करते हुए दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है।

भारत के वित्त मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 तक भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार 5,000 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा, जो कि अभी 2500 अरब डॉलर के करीब है। लेकिन अभी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं में भारत के लिए प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था की चमकीली पहचान बनाने के लिए कई बाधाओं को पार करना होगा।

निश्चित रूप से देश के आर्थिक विकास और दुनिया में आर्थिक अहमियत बढ़ाने के लिए डब्ल्यूईएफ द्वारा दुनिया के विभिन्न देशों की प्रतिस्पर्धा रैंकिंग के तहत निर्धारित अर्थव्यवस्था के विकास, सरकारी क्षमता, कारोबारी क्षमता और बुनियादी ढांचा के पैमाने पर भारत को आगे बढ़ने के लिए प्रयास करने होंगे। निश्चित रूप से अब मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की अहम भूमिका बनाई जानी होगी।

मेक इन इंडिया योजना को गतिशील करना होगा। उन ढांचागत सुधारों पर भी जोर दिया जाना होगा, जिसमें निर्यातोन्मुखी विनिर्माण क्षेत्र को गति मिल सके। ऐसा किए जाने से भारत में आर्थिक एवं औद्योगिक विकास की नई संभावनाएं आकार ले सकती हैं। न केवल मेक इन इंडिया की सफलता के लिए कौशल प्रशिक्षित युवाओं की कमी को पूरा करना होगा,

वरन दुनिया के बाजार में भारत के कौशल प्रशिक्षित युवाओं की मांग को पूरा करने के लिए भी कौशल प्रशिक्षण के प्रयास जरूरी होंगे। देश के उद्योग-व्यवसाय में कौशल प्रशिक्षित लोगों की मांग और आपूर्ति में लगातार बढ़ता अंतर दूर करना होगा। यह जरूरी होगा कि देश को प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था में ऊंचाई देनेे के लिए सरकार द्वारा कौशल प्रशिक्षण को दी जा रही प्राथमिकता के नतीजे धरातल पर दिखाई दें।

इस परिप्रेक्ष्य में पिछले दिनों इलेक्ट्रॉनिक एवं सूचना प्रौद्योगिक मंत्रालय ने तकनीकी क्षेत्र की कंपनियों के संगठन नैस्काम के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वर्चुअल रियल्टी, रोबोटिक प्रोसेस ऑटोमेशन, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, बिग डाटा एनालिसिस, क्लाउड कम्प्यूटिंग, सोशल मीडिया-मोबाइल जैसे आठ नए तकनीकी क्षेत्रों में 55 नई भूमिकाओं में युवाओं को अगले तीन साल में प्रशिक्षित करने का जो अनुबंध किया है,

उसे कारगर तरीके से कार्यान्वित किया जाए। निसंदेह प्रतिस्पर्धा के पैमाने पर आगे बढ़ने के लिए सरकारी क्षमताओं का अधिक उपयोग किया जाना होगा। उद्योग-कारोबार के सामने आ रही उलझनों को दूर करने के साथ-साथ अन्य प्रोत्साहन से उद्योग-कारोबार को गतिशील करके भी उत्पादकता बढ़ाई जानी होगी।

हम आशा करें कि सरकार अर्थव्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए वित्तीय और औद्योगिक संस्थाओं को मजबूती देगी। वित्तीय प्रणाली को सरल बनाएगी। हमें उद्योग-व्यापार में नवाचार को प्रोत्साहन देना होगा। अर्थव्यवस्था में नौकरशाही का हस्तक्षेप कम करना होगा। ऐसा किए जाने पर ही इस समय वैश्विक आर्थिक कारणों से जो मुश्किलें उत्पन्न हो रही हैं उनका मुकाबला भी किया जा सकेगा तथा प्रतिस्पर्धा के पैमाने पर देश की अर्थव्यवस्था की चमकीली संभावनाओं को साकार किया जा सकेगा।

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