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भगवान राम से ही नहीं, रावण से भी सीखें जीवन के ये चार सूत्र

योग्यता जब भोग विलास में डूबती है, तो शिखर में पहुंचा आदमी भी किस तरह शून्य में आ जाता है।

भगवान राम से ही नहीं, रावण से भी सीखें जीवन के ये चार सूत्र

देश में ऐसी कई जगह हैं जहां रावण की पूजा की जाती है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, लेकिन आम आदमी की जिंदगी में भी रावण का होना बहुत महत्वपूर्ण होता है, जानिए रावण के उन चार सूत्रों के बाते में जिससे हमें बहुत कुछ सीखना चाहिए...

1. गुणों का दुरुपयोग

भगवान राम से हमने बहुत कुछ सीखा और उसे जीवन में उतारा, लेकिन दशहरा के अवसर पर आध्यात्मिक गुरु पं. विजयशंकर मेहता बताने जा रहे हैं कि व्यक्ति रावण से क्या सीख सकता है। हरिभूमि से खास बातचीत में पं. मेहता ने कहा, रावण शिक्षा और योग्यता यानी एजूकेशन और टैलेंट से परिपूर्ण था, लेकिन इन्हीं दो गुणों के दुरुपयोग ने उसे बुराई की पाठशाला बना दिया आज भी लोग शिक्षा और योग्यता के पीछे भाग रहे हैं। रावण से यही सीखना है कि इन गुणों का सही उपयोग किस तरह करें।

2. भोग-विलास

योग्यता जब भोग विलास में डूबती है, तो शिखर में पहुंचा आदमी भी किस तरह शून्य में आ जाता है, रावण इसका जीवंत उदाहरण है। जो गलतियां रावण ने की, अगर वे गलतियां हम भी करेंगे, तो हमें भी एक दिन शिखर से शून्य में आना होगा। रावण विश्व विजेता थे। उनके बाद विश्व विजेता न हुए हैं, न होंगे। उनके सामने तपस्वी वेश में सीमित साधन में प्रभु श्रीराम खड़े थे। राम ने असीमित सत्ता के स्वामी रावण को परास्त कर दिया। रावण भोग की वजह से मारा गया और प्रभु श्रीराम आत्मबल से विजयी हुए।

3. अहंकार का भाव

रावण ने संसार को अपहरण और आतंक दिया। आज सारी पृथ्वी भोग, विलास, अपहरण और आतंक से जूझ रही है। मदांध हैं, लोग अहंकार में डूबे हैं। मंथन करना चाहिए कि क्या हमारी शिक्षा इस काम आएगी? लोग अधूरी जानकारी से कहते हैं, रावण ने माता सीता का स्पर्श तक नहीं किया। वास्तविकता यह है, रावण को पुत्रवधु से बलात्कार की वजह से कुबेर के बेटे ने श्राप दिया था कि वह किसी परस्त्री की सहमति के बगैर उसका स्पर्श करेगा, तो मष्तिष्क के सौ टुकड़े हो जाएंगे। इस डर से उसने माता सीता का स्पर्श नहीं किया।

4. अपराजेय होने का भाव

रावण जैसा महाशक्तिशाली एक सन्यासी से हार गया। हमें समझना चाहिए कि प्रकृति ने अपराजेय किसी को नहीं बनाया है। कम से कम शक्ति या अहंकार के भाव के साथ सदैव अपराजेय होना असंभव है। विनम्रता, सदगुण और सत्य के साथ रहकर हार-जीत के भय से मुक्त रहा जा सकता है। लेकिन अगर किसी के मन में यह भाव आ गया कि अब कोई उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता, उसी पल से उसके पतन का प्रारंभ हो जाता है। जब रावण की पराजय हो गई तो हम और आप हैं क्या।

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