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महामानव थे डॉ. भीमराव अंबेडकर

बाबा साहेब ने हमेशा निरंतर आगे बढ़ने तथा देश और समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा दी।

महामानव थे डॉ. भीमराव अंबेडकर

देश के सर्वोच्‍च सम्‍मान ‘भारत रत्‍न' से सम्‍मानित, प्रसिद्ध भारतीय विधिवेत्‍ता, सामाजिक न्‍याय के प्रबल पक्षधर, ओजस्‍वी लेखक, यशस्‍वी वक्‍ता, बीसवीं शताब्‍दी के श्रेष्‍ठ चिंतक और देश के प्रथम विधि एवं न्‍याय मंत्री डॉक्‍टर भीमराव अम्‍बेडकर का जन्‍म 14 अप्रैल, 1891 को मध्‍य प्रदेश के मऊ में हुआ था।

रामजी और भीमाबाई की 14वीं संतान भीमराव ने अपने व्‍यक्‍तित्‍व और कृतित्‍व से परिवार और समाज को तो गौरवान्‍वित किया ही, विश्‍व क्षितिज पर संपूर्ण राष्‍ट्र को नई गरिमा प्रदान की। बाल्‍यकाल में असमानता का दंश झेलने वाले बाबा साहेब ने एक ऐसे समाज की परिकल्‍पना की थी, जहां सब समान हों, ऊंच-नीच का भेद न हो और सभी गरिमापूर्ण जीवन बिता सकें।

इस अहसास ने उन्‍हें निरंतर आगे बढ़ने तथा देश और समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा दी। सूरज के समान तेज, चंद्रमा के समान शीतलता एवं सम्‍मोहक व्‍यवहार, ऋषियों-तपस्‍वियों के समान गहन ज्ञान और विद्वत्‍ता, उनके विशाल व्‍यक्‍तित्‍व की प्रमुख विशेषताएं थी। अम्‍बेडकर जी ने अपना सारा जीवन समाज के दलित,उपेक्षित और शोषित वर्गों की खुशहाली और उनके स्‍वाभिमान की रक्षा में लगा दिया।

उनका संदेश था –‘'शिक्षित बनो,संगठित रहो और संघर्ष करो''। बाबा साहेब का मानना था कि अगर ये तीन गुण किसी मनुष्‍य में हैं, तो कोई भी बाधा उसकी राह का रोड़ा नहीं बन सकती। अगर इसे आज के संदर्भ में देखा जाए, तो .यह प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी जी की परिकल्‍पना और संकल्‍प –‘'सबका साथ सबका विकास' के रूप में हमारे सामने है।

अम्‍बेडकर जी ने वंचित वर्ग को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकार दिलाने की जो कालजयी भूमिका निभाई, उसकी अन्‍यत्र मिसाल नहीं मिलती। उन्‍होंने देश के सामाजिक ढांचे को बदलने के लिए संकल्‍पबद्ध प्रयास किए। परिणामस्‍वरूप आत्‍मविश्‍वास और स्‍वाभिमान की जो झलक आज दलित और शोषित समाज में दिखाई दे रही है,

उसकी कल्‍पना और मूर्त रूप देने का एकमात्र श्रेयइसी युग पुरूष को जाता है। अम्‍बेडकर जी राजनीतिक स्‍वतंत्रता के साथ सामाजिक स्‍वतंत्रता के भी प्रबल पक्षघर थे। उनका कहना था –‘'जबतक आप सामाजिक स्‍वतंत्रता हासिल नहीं कर लेते, तबतक कानून चाहे जो भी स्‍वतंत्रता देता हो, वह आपके किसी काम की नहीं है।

भारत के समतामूलक संविधान के निर्माता डॉक्‍टर भीमराव अम्‍बेडकर सच्‍चे अर्थों में महामानवथे। जीवन मेंभेदभाव,अन्‍याय और कष्‍ट सहने के बावजूद उनके मन में कभी किसी के प्रति द्वेष या प्रतिशोध की भावना नहीं रही। वे दलित और पीड़ित वर्ग को समाज और विकास की मुख्‍यधारा से जोड़ने के लिए निरंतर संघर्ष करते रहे, लेकिन समाज के अन्‍य वर्गों के प्रति भी उनका भाव हमेशा सकारात्‍मक रहा।

वास्‍तव में बाबा साहेब का चिंतन व्‍यापक था, जिसमें पूरे देश का हित समाहित था। भारत के सामाजिक, आर्थिक,राजनीतिक,कृषि और औद्योगिक विकास के क्षेत्र में उनकाचिंतन बहुत विस्‍तृत था। बाबा साहेब ने हिन्‍दुओं और मुसलमानों के बीच साम्‍प्रदायिक सद्भाव पर बल देते हुए कहा था कि ‘'साम्‍प्रदायिक मुद्दे कनाडा जैसे देशों में भी हमेशा रहे हैं, पर आज भी अंग्रेज और फ्रांसीसी प्रेमभाव से एक साथ रहते हैं, तो हिन्‍दूऔर मुसलमान एक साथ सौहार्दपूर्वक क्‍यों नहीं रह सकते?'

अम्‍बेडकर जी ने भारतीय संविधान को आकारदेने के लिए भले ही पश्‍चिमी मॉंडल अपनाया हो,लेकिन उसकी मूलभावना विशुद्ध रूप से भारतीय भूमि से जुड़ी रही। डाॅ. अम्‍बेडकर का जन्‍म देहात में हुआ था और वे गांव –देहात के जनजीवन की सोंच और जीवन शैली से भलीभांति परिचित थे। विदेशों में शिक्षा प्राप्‍त करने और बड़ौदा के राजा के यहां उच्‍च पद पर आसीन होने के बावजूद वे गांव की मिट्टी की सोंधी महक भूल नहीं पाए।

गांवों में छुआछूत,भेदभाव औरआर्थिक पिछड़ेपन की स्‍थिति उन्‍हें हमेशा खलती रही। उनका मानना था कि गांव ही भारतीय जीवन की धुरी हैं,अत: सुधार की शुरूआत गांवों से ही होनी चाहिए। प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी जी के नेतृत्‍व में राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने बाबा साहेबके इस कथन को साकार करने के लिए पिछले वर्ष उनकी 125वीं जयंती के उपलक्ष्‍य में 14 अप्रैल से 24 अप्रैल तक राष्‍ट्रीय स्‍तर पर ‘'ग्रामोदय से भारत उदय'' अभियान के माध्‍यम से सार्थक पहल की।

केन्‍द्र सरकार ने 26 नवम्‍बर को संविधान दिवस घोषित कर 2015 से इसे राष्‍ट्रीय स्‍तर पर समारोहपूर्वक मनाने का निर्णय लिया। 1949में 26 नवम्‍बर को ही भारतीय संविधान अंगीकृत किया गया था। डॉंक्‍टर अम्‍बेडकर की 125वीं जयंती और संविधान दिवस के उपलक्ष्‍य में वर्ष भर राष्‍ट्रव्‍यापी समारोहों और विभिन्‍न कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।

केन्‍द्र सरकार ने डॉंक्‍टर अम्‍बेडकर के प्रति राष्‍ट्र की कृतज्ञता व्‍यक्‍त करने के लिए संसद का विशेष सत्र आहूत किया, जिसमें सांसदों ने संविधान के प्रमुख शिल्‍पी बाबा साहेब को श्रद्धांजलि दी। 26 नवम्‍बर को संविधान दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी जी ने अक्‍तूबर,2015 में मुम्‍बई में डॉंक्‍टर बी.आर. अम्‍बेडकर स्‍मारक की आधारशिला रखते हुए की थी।

प्रधानमंत्री जी ने संविधान दिवस के विषय में कहा था-हम 26 जनवरी का दिन अत्‍यंत उत्‍साहपूर्वक मनाते हैं, लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि अगर 26 नवम्‍बर नहीं होता, तो हम 26 जनवरी नहीं मना पाते। संविधान दिवस समारोह में अपने भाषण में प्रधानमंत्री जी ने यह भी कहा था कि – जब हम संविधान को याद करते हैं, हम बाबा साहेब अम्‍बेडकर को भी स्‍मृत करते हैं। हमें संविधान की मूल भावना से जुड़कर अधिकारों और कर्तव्‍यों के बीच संतुलन का प्रयास करना चाहिए।

भारत सरकार के अन्‍य मंत्रालयों और विभागों के साथ आज देश के ग्रामीण विकास मंत्रालय,पंचायती राज मंत्रालय और पेयजल एवं स्‍वच्‍छता मंत्रालय, दलितों के नायक बाबा साहेब अम्‍बेडकर के संकल्‍पों को पूरा करने के लिए जनकल्‍याणकारी और ग्रामीण विकास से जुड़ी योजनाओं को गांव-गांव और जन-जन तक पहुंचाने में लगे हुए हैं। डॉ. भीमराव अम्‍बेडकर दलितों के मसीहा, विधिवेत्‍ता, राजनेता, दार्शनिक और मानवतावादी चिंतक तो थे ही, वे प्रखर अर्थशास्‍त्री भी थे।

उन्‍होंने न केवल मौद्रिक प्रबंधन पर,बल्‍कि कर संरचना से लेकर स्‍वदेशी अवधारणा और कृषि व उद्योग जैसे अनेक मुद्दों पर विस्‍तृत लेख लिखे। लंदन स्‍कूल ऑफ इकोनॉंमिक्‍स में अध्‍ययन के दौरान उनके द्वारा लिखित और 1923 में पुस्‍तक के रूप में प्रकाशित शोध-प्रबंध ‘'The Problem of Rupee” आज भी प्रासंगिक है। यह बाबा साहब की आर्थिक विषयों पर अच्‍छी पकड़ और आर्थिक जगत की दूरदृष्‍टि के साथ मौलिक चिंतन को प्रतिबिम्‍बित करती है।

केन्‍द्र में प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी जी के नेतृत्‍व में राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार, विमुद्रीकरण और वस्‍तु एवं सेवा कर कानून जैसे आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाकर अम्‍बेडकर जी के सुझाए मार्ग पर चल रही है। डॉं. अम्‍बेडकर को भारतीय संविधान का जनक माना जाता है। उन्‍होंने हिन्‍दी कोड बिल बनाने में बहुत परिश्रम किया, लेकिन उसे काट-छाँट कर पारित किया गया। इससे आहत होकर उन्‍होंने विरोध स्‍वरूप विधि मंत्री के पद से इस्‍तीफा दे दिया।

वे जम्‍मू कश्‍मीर को विशेष दर्जा देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्‍छेद 370 के खिलाफ थे। देश की सरकार और जनता के दिल में आज भी परम पूज्‍य बाबा साहेब के प्रति अपरिमित सम्‍मान की भावना मौजूद है, जो निरंतर बढ़ती रहेगी। वास्‍तव में भारतीय संविधान की रचना और लोकतंत्र की बुनियाद रखने में डॉं. अम्‍बेडकर के अनूठे योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। सामाजिक न्‍याय का बिगुल बजाने वाले,शोषित, दलित तथा वंचित वर्ग के मसीहा और युग पुरूष डॉं. अम्‍बेडकर को उनकी जयंती पर मेरा शत-शत नमन।

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