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सीताराम व्यास का लेख : शिक्षा को चारदीवारी में मत बांधो

वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1948 में डा. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में स्थापित विवि शिक्षा आयोग द्वारा प्रदत्त संस्तुति आधारित है। डा. राधाकृष्णन शिक्षा को सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तन का साधन मानते थे। वे परिभाषित करते थे कि शिक्षा तकनीकि ज्ञान तक सीमित न रहकर अच्छे सुसभ्य सामाजिक जीवन व्यतीत करने की व्यवस्था का संदेश देती है।

सीताराम व्यास का लेख : शिक्षा को चारदीवारी में मत बांधो
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सीताराम व्यास

सर्वपल्ली राधाकृष्णन बीसवी शताब्दी के महान दार्शनिक एवं शिक्षाविद थे। वे हिन्दू संस्कृति एवं दर्शन के व्याख्याकार और बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने अपनी कृतियों में हिन्दुत्व, वेदान्त, गीता, उपनिषद, ब्रह्यसूत्र को विश्व दर्शन के परिप्रेक्ष्य मे नवीन व्याख्या की। उनके समग्र ग्रन्थ ब्रह्यसूत्र के शंकर भाष्य से अनुप्राणित हैं। डा.राधाकृष्णन ने अप्रतिम मेधा से भारतीय दर्शन को पश्चिम के तर्क की कसौटी पर परखकर भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण के यज्ञ में आहूति दी। उनमें शंकर की प्रतिभा और रामानुज की भक्ति का समन्वित रूप दिखाई देता है। डा. राधाकृष्णन ने हिन्दू दर्शन को विश्व-दर्शन के रूप मे प्रस्थापित कर पश्चिम जगत के विचारकों को आश्चर्य चकित कर दिया।

अपने जीवन के चालीस वर्ष एक शिक्षक रूप मे उन्होंने शिक्षा जगत को समर्पित किए। उनको आदर्श शिक्षक के रूप मे याद किया जाता रहा हैं। इसलिए उनकी जन्म तिथि 5 सितम्बर को देश शिक्षक दिवस के रूप मे मनाता है और उनके परिश्रमी, निष्ठावान और सहृदय स्वरूप के प्रति सम्मान प्रगट करता है। इस दिन भारत सरकार अपनी समर्पित सेवाएं देने वाले उत्कृष्ट शिक्षकों को सम्मान से अलंकृत करती है। डा. राधाकृष्णन सारे विश्व को विद्यालय मानते हैं। उनका कहना था कि शिक्षा को चहारदीवारी में मत बांधो अस्तु सकल चराचर हमारा विद्यालय है। मानव जगत सभी प्राणियों से शिक्षा प्राप्त करता है, भगवान् दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाए हैं, जिसमे चींटी, सर्प, जीव भी थे। शिक्षा निरन्तर ज्ञाान प्राप्त करने की प्रकिया है। एक शिशु अपने परिसर मे मां से लेकर पड़ोस, गांव, पशु, पक्षी से ज्ञान की वृद्धि करता है। लौकिक पार लौकिक ज्ञान मानव को उगात्तर स्थिति की ओर ले जाता है जिसे योगी अरविन्द ने सुपरमेन कहा है। साधारण शब्दों मे नर से नारायण बनने की प्रकिया शिक्षा है।

वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1948 में डा. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में स्थापित विवि शिक्षा आयोग द्वारा प्रदत्त संस्तुति आधारित है। डा. राधाकृष्णन शिक्षा को सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तन का साधन मानते थे। वे परिभाषित करते थे कि शिक्षा तकनीकि ज्ञान तक सीमित न रहकर अच्छे सुसभ्य सामाजिक जीवन व्यतीत करने की व्यवस्था का संदेश देती है। शिक्षा अंतिम सत्य की खोज मे सहायक होती है। शिक्षा ज्ञान प्राप्ति के साथ-साथ एक कौशल है। शिक्षा मानवीय समस्याओं का समाधान करने में सक्षम है। उनके विचार से शिक्षा मनुष्य को दूसरा जन्म देती है और अनुभव कराती है कि हम कौन हैं। मनुष्य में ज्ञान छिपा हुआ है केवल शिक्षा उस ज्ञान को बाहरी रूप में प्रगट करके आत्मा और हृदय को पवित्र बना देती है। उनके मतानुसार चरित्र निर्माण करना शिक्षा का महत्वपूर्ण कार्य है। वर्तमान शिक्षा नीति का उद्देश्य भी यही है। उदाहरण राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के पृष्ठ 3-4 मे उल्लेख शिक्षा पूर्ण मानव क्षमता को प्राप्त करने एक न्याय संगत समाज के विकास और विकास को बढ़ावा देने की मूलभूत आवश्यकता है। प्राचीन और सनातन भारतीय ज्ञान और विचार की समृृद्ध परम्परा के आलोक में यह नीति तैयार की गई। ज्ञान, प्रज्ञा और सत्य की खोज की भारतीय विचार परम्परा और दर्शन में सदा सर्वो च मानवीय लक्ष्य माना जाता था। प्राचीन भारत में शिक्षा का लक्ष्य, पूर्ण आत्मज्ञान और मुक्ति के रूप में माना गया था। उपर्युक्त कथन के विचारों का साम्य डा.राधाकृष्णन के शिक्षा-दर्शन से मिलता है। शिक्षा नीति को उत्कर्ष तक एकमेव शिक्षक ही ले जा सकता है। शिक्षा नीति की प्राण प्रतिष्ठा सरकार और संस्था नहीं कर सकती केवल आदर्श, योग्य आध्यापक ही करा सकता है।

पं. नेहरू जी ने डा. राधाकृष्णन के बारे में कहा, उन्होंने देश की सेवा अनेक पदों पर सुशोभित रहकर की पर वे महान शिक्षक थे जिनसे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। हमारा सौभाग्य है कि भारत ने हमें महान शिक्षाविद और मनस्वी दार्शनिक राष्ट्रपति दिया।

शिक्षक दिवस पर ऐसे महान व्यक्ति के जीवन का अवलोकन प्रेरणादायी रहेगा। डा. राधाकृष्णन्ा का जन्म 5 सितम्बर 1888 को तमिलनाडू के छोटे से गांव तिरूमनि में ब्राम्हण परिवार में हुआ। इनके पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इस बाल्यकाल सुख सुविधा में व्यतीत नहीं हुआ। 16 साल की उम्र में शादी हो गई। वे 5 बेटियों और एक पुत्र के पिता बने। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा गांव मे हुई इसके पश्चात तिरुपति क्रिश्चियन लूथर्न मिशन स्कूल में पढ़ने गए। 1906 मे मद्रास क्रिश्चियन कालेज से एमए दर्शन शास्त्र में किया। इनको मेधावी छात्र के नाते छात्रवृत्ति भी मिलती रह। 1909 में मद्रास प्रेसीडेन्सी कालेज मे दर्शन शास्त्र के अध्यापक रूप मे इनकी नियुक्ति हुई। 1918 में मैसूर विवि में दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए। धीरे-धीरे डा. राधाकृष्णन की विद्वता की प्रसिद्धि विदेश में पहुंची और एक शिक्षक के रूप में स्थापित अपनी ख्याित के बल पर वे आक्सफोर्ड विवि में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक के रूप मे नियुक्त हुए। 1926 में आक्सफोर्ड में अपटोन लेक्चरस हिन्दू वियु आफ लाइफ संकलित पुस्तक महत्वपूर्ण है। इन व्याख्यानों में हिन्दू दर्शन और संस्कृति का परिचय करवाया गया। उनकी व्याख्यान की शैली विद्वतापूर्ण होने के साथ-साथ गंगा के अविरल प्रवाह के संगीतमय सी थी।

आजादी के पश्चात उनको विशिष्ट राजदूत बनाकर सोवियत रूस भेजा गया। रूस के राष्ट्रपति स्टालिन राजदूतों से कभी भेंट नही करते थे पर भारत के यशस्वी दार्शनिक राजदूत से उत्सुकता मिले। 1947-1949 तक संविधान सभा के सदस्य भी रहे। 1952 से 1962 तक देश के उपराष्ट्रपति रहे तथा 13 मई 1962 को राष्ट्रपति पद पर निर्वाचित हुए। यह काल चुनौतियों सें भरा हुआ था। 1962 के युद्ध में चीन द्वारा भारत की हार, 1965 में पाकिस्तान का भारत पर आक्रमण तथा दो प्रधान मंत्रियों का देहांत इनके कार्यकाल में हुआ। ऐसी चुनौति पूर्ण काल खंड में डा. राधाकृष्णन ने राजर्षि की भूमिका निभाई। अपनी प्रभावी वक्तव्य शैली से राष्ट्र और जनमानस का मनोबल बढ़ाया तथा धैर्य और दूरदर्शिता का परिचय दिया। 1965 के पाकिस्तान आक्रमण के समय उनका आकाशवाणी केन्द्र द्वारा प्रसारित व्याख्यान इतिहास के पन्नो में स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। उनके भाषण का सारांश यह था कि भारत युद्ध पिपासु राष्ट्र कभी नहीं रहा। हमारे ऊपर शत्रु देश ने युद्ध थोपा है। हमें अपनी सीमा की रक्षा तथा स्वतन्त्रता को अक्षुण्ण रखना है। हमारा गणतन्त्र विजय श्री का वरण करेगा। आपने 1967 में सार्वजनिक जीवन से अवकाश प्राप्त कर लिया, इसकी घोषणा राष्ट्रपति पद पर रहते हुए कर दी। विदेह की तरह निस्पृह भाव से सत्तासुख का त्याग किया।

ऐसे महान दार्शनिक शिक्षाविद् को शिक्षक दिवस पर सारा देश श्रद्धासुमन अर्पित करता है। इन दिनों शिक्षा की गुणवत्ता का पतन होता जा रहा है और गुरु-शिष्य संबंधों पर प्रश्नचिह्न लगते जा रहे हैं। हमारा विश्वास है कि उनके पुण्य जन्म दिवस पर उनकी विद्वता, सहृदयता, समर्पण भारतीय संस्कृति के प्रति अगाध निष्ठा, राष्ट्र-गौरव के प्रति श्रद्धा आदि का स्मरण कर हम शिक्षा जगत में नई चेतना का संचार कर पुन: भारत को विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित करेंगे।

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