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दीपावली विश्लेषण: हर आंगन हो रोशन

डॉ. मोनिका शर्मा | UPDATED Nov 8 2018 12:26PM IST
दीपावली विश्लेषण: हर आंगन हो रोशन

दीपावली का त्योहार जीवन ही नहीं मन को भी रोशन करने का संदेश देता है। इस पर्व पर न केवल भौतिक सुख समृद्धि बल्कि आमजन की खुशियों की भी प्रार्थना की जाती है। ऐसे में प्रकाश पर्व की तैयारी में जुटे देश में आज भी आर्थिक असमानता की स्थितियां कई प्रश्न उठाती हैं। हाल में ही आई विश्व बैंक की मानव पूंजी सूचकांक की रिपोर्ट इसी सच को सामने रखती है। बच्चों के जीवन की प्रत्याशा, सेहत व शिक्षा के मापदंडों पर आधारित इस इस रिपोर्ट के अनुसार 157 देशों की सूची में भारत का स्थान 115वां है। रिपोर्ट में भारत को नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार और बांग्लादेश जैसे देशों से भी नीचे रखा गया है।

इतना ही नहीं मानव विकास सूचकांक की ताज़ा रिपोर्ट में भी भारत पिछले साल के मुकाबले एक पायदान नीचे चला गया है। निःसंदेह ऐसी रिपोर्ट उस हकीकत पर रोशनी डालती हैं जिसमें विकास के तमाम दावों और वादों के बावजूद विषमता की खाई पाटी नहीं जा सकी है। गांवों से लेकर शहरों तक आज भी आर्थिक असमानता का दंश जस का तस मौजूद है। देश की बड़ी आबादी बुनियादी सुविधाओं के लिए तो जूझ ही रही है, अब सद्भाव और सामाजिक जुड़ाव के मोर्चे पर भी विसंगतिपूर्ण व्यवहार देखने को मिल रहा है।

वसुधैव कुटम्बकम के भाव वाली भारतीय संस्कृति में यह विषमता मन व्यथित करने वाली है। मानसिक, वैचारिक और व्यावहारिक स्तर पर संवेदनाओं को जीना ही बेहतर समाज बना सकता है। ऐसे में उदारीकरण और भूमंडलीकरण के इस दौर में ऐसी रिपोर्ट विकास के सही मायनों को समझने की जरूरत की ओर इशारा करती हैं। उस व्यवस्था की बात करती हैं जिसमें हरेक व्यक्ति को लाभ मिले न कि मुट्ठीभर सुविधासंपन्न लोगों को। ऐसा न होने का ही परिणाम है कि साल-दर-साल अमानवीय परिस्थितियों में जीने वाले लोगों के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं।

देश के अनगिनत परिवारों के लिए खुशहाल जीवन सपना बना हुआ है। जनकल्याण के लिए काम करने वाले लोग और मानवीय मूल्यों के पैरोकार भी इस बढ़ती विषमता को लेकर चिंतित हैं। यह एक कटु सच है कि बीते कुछ बरसों में वैश्विक रणनीतियों को अपनाकर हमारे देश की कारोबारी संरचना तो पूरी तरह बदल गई पर उसी अनुपात में नागरिकों के सामाजिक और आर्थिक स्तर में परिवर्तन नहीं आया है। यही वजह है कि दूर दराज़ के गांव ही नहीं नियोजित ढंग से विस्तार पा रहे शहरों में लोग नारकीय जीवन जीने को विवश हैं।

गांवों में ही नहीं शहरों में भी एक बड़ा वर्ग न केवल रोज़मर्रा की ज़रूरतें जुटाने की जद्दोज़हद में लगा है बल्कि कर्ज में भी डूबा है। सामाजिक-पारिवारिक हालतों पर गौर करें तो देश के हर हिस्से में अमीर और गरीब में वाकई एक बड़ा विभाजन नज़र भी आता है। जीवनशैली ही नहीं शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी जरूरी सुविधाओं को पाने में भी ज़मीन आसमान का फर्क है। यह समृद्धि की चमक के पीछे छुपा वो अंधेरा है जो विकास की रफ्तार के दावों की दुखद हक़ीकत बयान करता है।

हालिया बरसों में शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवनयापन के हालातों को संकेतक के रूप में लेकर किए जाने वाले अधिकतर वैश्विक अध्ययनों में भारत की चिंतनीय स्थिति ही सामने आई है। ऐसे में आर्थिक विकास और समृद्धि के सारे मापदण्ड अर्थहीन लगते हैं। आर्थिक संर्वधन के आंकड़ों में अव्वल आने की रेस में हम शामिल तो हो रहे हैं पर असल में बुनियादी ज़रूरतें ही पूरी नहीं हो पा रही हैं। मानव विकास सूचकांक की रिपोर्ट में प्रति व्यक्ति आय, खपत, रोजगार, कुपोषण, मंहगाई और नागरिकों के सामजिक मनोवैज्ञानिक हालातों को भी मापने की कोशिश की जाती है।

ये सभी मानक किसी देश के नागरिकों की खुशहाली को तय करने वाले अहम्ा कारक हैं। वे मापदंड हैं जो बताते हैं कि वहां बस रहे लोग अपने जीवन से कितने संतुष्ट हैं? यही वजह है कि वैश्विक स्तर पर इस रिपोर्ट की स्वीकार्यता और मान्यता है। यह रिपोर्ट सही मायनों में मानव जीवन से जुड़ी आधारभूत ज़रूरतों और हालातों को पृष्ठभूमि बनाकर प्रस्तुत की गई दीर्घकालिक प्रगति की रिपोर्ट होती है। जिसमें भारत का नीचे खिसकना वाकई विचारणीय है। कहना गलत नहीं होगा कि हमारे यहां शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे मामलों में हालात बेहद चिंतनीय हैं।

ऐसे में आम लोगों के जीवन की कठिनाइयों को समझना मुश्किल नहीं है। प्रकाश पर्व के अवसर पर यह विचारणीय हो जाता है कि हमारे परिवेश में घटित हो रही हर अकुशल घटना के साथ मानवीय संवेदनाओं के खत्म होने का अंधेरा विस्तार पा रहा है। बेटियों का मानमर्दन हो या बुजुर्गों का अपमान, भ्रष्टाचार के बढ़ते आंकड़े हों या पारिवारिक विघटन। मनुष्यता का मान और जीवन से जुड़ा चेतना के भाव का गुम हो जाना अनगिनत सामाजिक, पारिवारिक और प्रशासनिक विकृतियों को जन्म दे रहा है।

मौजूदा समय में आपाधापी और असुरक्षा से भरी जिंदगी दुनिया के हर कोने में हैं। आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर अनगिनत समस्याएं हैं जो लोगों को घेरे हुए हैं। विकास और तरक्की की दौड़ में आगे बढ़ने के साथ ही बहुत कुछ ऐसा भी है जो पीछे छूट रहा है। अकेलेपन, अवसाद और आर्थिक विषमता के अंधेरे की दस्तक जीवन के हर पहलू पर महसूस की जा सकती है। ज़मीनी हक़ीकत तो यह है कि देश में आज भी एक बड़ी आबादी के पास बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए संसाधन नहीं हैं। यह असमानता जन सामान्य के लिए बेहद पीड़ादायी है।

यही वजह है कि सरकार अपने नागरिकों की संतुष्टि एवं प्रसन्नता के स्तर को ध्यान में रखते हुए लोक-नीतियों के निर्माण करे। आमजन के जीवन की गुणवत्ता का स्तर ऊपर उठाने के सार्थक प्रयास किये जाएं। ऐसे में ये अध्ययन एक इशारा भर हैं कि हम तेज गति से चल तो रहे हैं पर आगे कितना और किस दिशा में बढ़े, यह जानना भी ज़रूरी है। एक ओर भारत को विश्व की उन अर्थव्यवस्थाओं की सूची में स्थान दिया जा रहा है जो आने वाले समय में विकसित देशों की श्रेणी में स्थान पा सकती है।

वहीं दूसरी ओर ऐसे कितने ही अकाट्य सच हैं जो हमारी इस तरक्की की पोल खोलते हैं। आज भी देश में आर्थिक विपन्नता के चलते दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पाने वाली आबादी का होना दुखद भी है और विचारणीय भी। यह याद रखना जरूरी है कि श्रापित सा जीवनयापन आज भी देश की बड़ी जनसंख्या के हिस्से है। जो हमें ऐसे सच से रूबरू करवाता है, जो मन को व्यथित करता है।

देश जब तक इन हालातों से बाहर न आए खुशहाली के पैमाने पर खरा नहीं उतर सकता। आज, अर्थहीन कोलाहल और संवेदनाहीन व्यवहार की ओर बढ़ रहे समाज में सचमुच वैचारिक संयम, आर्थिक समानता और आपसी सामंजस्य के आलोक की दरकार है। यह प्रकाश ही मन-जीवन को ज्योतिर्मय करेगा। निःसंदेह समाज और सरकार की साझी भागीदारी से ही यह उजियारा हर आंगन के हिस्से आ सकता है।


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