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आलोक पुराणिक का लेख : मजदूरों पर घिनौनी राजनीति

महाराष्ट्र के नेताओं खासकर ठाकरे परिवार को उत्तर भारतीय मजदूरों से अपनी राजनीति पर प्रभाव पड़ता हुआ दिखता है। उत्तर भारतीय वोटर अगर वहां होंगे तो उत्तर भारतीय नेताओं का दखल भी बढ़ेगा, इस आशंका में महाराष्ट्र की राजनीति का एक सिरा यूपी और बिहार विरोधी हो जाता है। ठाकरे बंधुओं-उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे में प्रतिस्पर्धा है, इस बात पर कि कौन कितना यूपी-बिहार विरोधी हो सकता है। कुल मिलाकर मजदूरों को मुंबई से विदा करने में उद्धव ठाकरे के राजनीतिक हित बहुत मजबूती से सधते हैं।

आलोक पुराणिक का लेख : मजदूरों पर घिनौनी राजनीति
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आलोक पुराणिक

दु :खी करने वाली तस्वीरें सामने हैं, मजदूर पश्चिमी भारत के औद्योगिक शहरों से पैदल ही मार्च कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने प्रवासी मजदूरों पर सुनवाई के दौरान कहा, पैदल चल रहे मजदूरों को जल्द आश्रय स्थल पर ले जाएं और उन्हें सारी सुविधाएं दें। साथ ही कोर्ट ने कहा कि प्रवासी मजदूरों को घर भेजने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। ये मजदूर महाराष्ट्र से, गुजरात से आ रहे हैं, मुंबई देश का सबसे बड़ा वित्तीय केंद्र है। बड़ी तादाद में मजदूर महाराष्ट्र से चले। बिहार और उत्तर प्रदेश से बड़ी तादाद में मजदूर महाराष्ट्र और गुजरात की तरफ जाते हैं। यह बात महाराष्ट्र के नेताओं को बहुत अखरती है। महाराष्ट्र के उद्योग धंधों में उत्तर भारतीय प्रवासी मजदूरों की महत्वपूर्ण भूमिका है। पर महाराष्ट्र के नेताओं को खासकर ठाकरे परिवार के नेताओं को उत्तर भारतीय मजदूरों से अपनी राजनीति पर प्रभाव पड़ता हुआ दिखता है। उत्तर भारतीय वोटर अगर वहां होंगे तो उत्तर भारतीय नेताओं का दखल भी बढ़ेगा, इस आशंका में महाराष्ट्र की राजनीति का एक सिरा यूपी और बिहार विरोधी हो जाता है। ठाकरे बंधुओं-उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे में प्रतिस्पर्धा है, इस बात पर कौन कितना यूपी-बिहार विरोधी हो सकता है। उनकी अपनी राजनीतिक पूंजी पर चोट पहुंचती है, अगर उत्तर भारत के वोटर वहां मजबूत स्थिति में हों, तो। कुल मिलाकर उत्तर भारत के मजदूरों को मुंबई से विदा करने में उद्धव ठाकरे के राजनीतिक हित बहुत मजबूती से सधते हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार देश में करीब 6 करोड़ 49 लाख प्रवासी श्रमिक थे। इनमें करीब 3 करोड़ 76 लाख श्रमिक शहरी क्षेत्रों में थे और करीब 2 करोड़ 70 लाख श्रमिक ग्रामीण क्षेत्र में थे। यानी कुल मिलाकर शहरी क्षेत्र ही प्रवासियों के आकर्षण के केंद्र बनते हैं। अभी इस आशय की खबरें भी आने लगी हैं कि जो मजदूर मुंबई, नोएडा से वापस अपने गांव गए थे, उनकी इकाइयों ने उन्हे फिर वापस बुलाना शुरू किया है उनमें से कई वापस भी आ रहे हैं। इसकी कुछ ठोस वजहें हैं। शहरी इलाके और बड़े शहरी इलाके प्रवासियों के आकर्षण का केंद्र इसलिए होते हैं कि यहां कमाई के अवसर काफी होते हैं। दिल्ली में कोई एक व्यक्ति छोले भटूरे का ठेला लगाकर इतना कमा सकता है, जितना उसका पूरा परिवार बिहार या यूपी में मनरेगा से नहीं कमा पाता। संपन्न इलाकों में काम करके अपेक्षाकृत ज्यादा कमाई हो जाती है। इसलिए मुंबई, नोएडा, पुणे और दिल्ली का रुख करते पाए जाते हैं प्रवासी मजदूर। कोरोना महामारी ने स्थितियों को एक झटके में बदल दिया और आर्थिक गतिविधियां ठप होने के कारण श्रमिकों को हताशा और सदमे में वापस जाना पड़ा। पर सदमे हमेशा नहीं बने रहते। कुछ प्रवासी मजदूर जो वापस लौटे हैं, अपने घर गांव, शायद कभी वापस न जाएं, मनरेगा या दूसरी किसी आर्थिक गतिविधि में संलग्न हो जाएं। कुछ प्रवासी मजदूरों को फिर मुंबई, दिल्ली की याद आने लगे। पर प्रवासी मजदूरों की स्थिति ने एक संदेश तो दे ही दिया है कि जहां वो बरसों बरस काम करते हैं, वो इलाके उनके लिए आपदा में असंवेनदशील हो सकते हैं। वहां के कारोबारी उनके हितों के प्रति उदासीन हो सकते हैं और वहां के नेता उन्हे भगाकर राजनीतिक लाभ अर्जित करके के ख्वाब देख सकते हैं। कुल मिलाकर दुखद तरीके से साफ हुआ कि देश एक नहीं है, वह बंटा हुआ है, आर्थिक और राजनीतिक बंटवारों के बीच। यूपी के मजदूर की चिंता उद्धव ठाकरे को करने की जरुरत नहीं है, क्योंकि वह उनका वोट नहीं है।

अब तमाम राज्यों को और केंद्र सरकार को प्रवासी श्रमिकों से जुड़ी नीतियों पर गंभीरता से विचार करने की जरुरत है। एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड नीति के तहत सबको राशन की दुकान से राशन मिल जाएगा, पर यह अभी भविष्य की बात है, कई मामलों में। यह बात हमेशा भविष्य की ही न रहे, यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी केंद्र की भी और राज्य सरकारों की भी।

उत्तर प्रदेश सरकार ने बहुत गति से काम करते हुए कुछ ऐसे कदम उठाएं हैं, जो तमाम उन राज्यों के लिए अनुकरणीय हो सकते हैं, जिनसे मजदूर जाते हैं। यानी बिहार, झारखंड और मध्यप्रदेश से प्रवासी मजदूरों के प्रवास को कैसे रोका जा सकता है, इस विषय में उत्तर प्रदेश सरकार ने कुछ उदाहरण पेश किए हैं।

आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में 28 लाख मजदूर वापस लौटे हैं। 28 लाख मजदूरों की वापसी आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर बड़ी परिघटना है। इसके राजनीतिक-आर्थिक निहितार्थ हैं। 28 लाख मजदूरों का आर्थिक पुनर्वास अगर उत्तर प्रदेश में संभव हो जाता है, इसका एक राजनीतिक निहितार्थ यह है कि 28 लाख मजदूरों से जुड़े परिवारों के वोटों का गणित वह राजनीतिक दल साध सकता है, जिससे जुड़ी सरकार इस पुनर्वास के काम को अंजाम देगी। उत्तर प्रदेश सरकार इन 28 लाख श्रमिकों में से 18 लाख श्रमिकों की स्किल मैपिंग या उनके कौशल का निर्धारण कर चुकी है य़ानी सरकार के पास यह आंकड़ा है कि 18 लाख श्रमिकों के पास कौन सा कौशल है। उत्तर प्रदेश सरकार तमाम उद्योग प्रतिनिधि संगठनों के साथ सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर कर चुकी है कि इनमें से 11 लाख श्रमिकों को रोजगार उनके द्वारा दिया जाएगा। अगर प्रवासी श्रमिकों को उत्तर प्रदेश में इस तरह से समायोजित कर लिया गया, तो उत्तर प्रदेश की राजनीति और अर्थशास्त्र दोनों में महत्वपूर्ण बदलाव आयेगा।

महाराष्ट्र या गुजरात की तरफ उत्तर भारत का मजदूर बहुत शौक से नहीं जाता, वह एक तरह से मजबूरी में ही जाता है। अपने इलाकों में जब आय रोजगार के साधन की व्यवस्था न हो पाए तो कोई भी देश के दूसरे हिस्सों या विदेशों में भी जाता है। विदेश भी जाना चाहिए, प्रवास से आर्थिक विकास होता है, हर क्षेत्र का। पर मजबूरी में किया गया प्रवास कष्टकारी होता है। यूपी और बिहार से प्रवास होने का बड़ा कारण यह है कि यहां औद्योगिक विकास की स्थिति संतोषजनक नहीं है। यूपी और बिहार मूलत: खेतिहर राज्य हैं। खेती में तमाम वजहों से आय के स्तर एक हद के बाद नहीं बढ़ाए जा सकते। बेहतर आय की तलाश में उद्योग क्षेत्र और सेवा क्षेत्र का रुख करते हैं श्रमिक। श्रमिकों को उनकी तलाश फिर गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब और केरल तक लेकर जाती है। अगर उत्तर प्रदेश सरकार श्रमिकों के कौशल का सही आर्थिक प्रतिफल उत्तर प्रदेश में ही देने में समर्थ हो जाती है तो यह अभूतपूर्व बात होगी।

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