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डा. प्रदीप कुमार सिंह का लेख : जनसंख्या नियंत्रण पर हो चर्चा

जनसंख्या नियंत्रण हेतु हतोत्साहक नीति के तहत तीसरे बच्चे के जन्मदाता माता-पिता के मताधिकार समाप्त करने पर भी विचार किया जा सकता है। जन्मदर कम रखने के लिए दूसरे बच्चे के लिए आवश्यक सरकारी अनुमति का प्रावधान भी उपयोगी हो सकता है। यह समझना आवश्यक है कि जन्मदर घटने से युवाओं-बुजुर्गों का अनुपात अवश्य घटेगा, पर इससे विचलित हुए बिना लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर आगे बढ़ना होगा। दीर्घकालिक उज्ज्वल भविष्य के लिए वर्तमान में त्याग करना ही पड़ेगा। जनसंख्या वृद्धि का रोग कई अवस्थाएं पार कर चुका है, प्रभावकारी इलाज से ही राहत मिल सकती है।

डा. प्रदीप कुमार सिंह का लेख : जनसंख्या नियंत्रण पर हो चर्चा
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डा. प्रदीप कुमार सिंह

डा. प्रदीप कुमार सिंह

मानव द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, संसाधनों के लिए बढ़ता संघर्ष व अन्य प्राणियों के लिए बढ़ती संवेदनहीनता, आदि पर्यावरण के लिए खतरा बन चुके हैं। जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक होने से भारत की स्थिति दिन-प्रति-दिन दयनीय होती जा रही है। हम सभी भारत मां की जय के नारे लगाते हैं, परंतु भारत मां जनसंख्या नियंत्रण हेतु संवैधानिक संस्थाओं की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रही है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश की जनसंख्या लगभग 34-करोड़ थी, वर्ष-2011 में लगभग 121-करोड़ हो गई और इस समय लगभग 139 करोड़ दर्शायी जा रही है। जनसंख्या नियंत्रण हेतु राजनीतिक दलों ने कभी गम्भीरतापूर्वक विचार नहीं किया। उल्टे बढ़ती जनसंख्या पर भी अपनी पीठ थपथपाते रहे और चीन के प्रयासों का मजाक उड़ाते रहे कि हमारी 65% आबादी युवा है और ड्रैगन बूढ़ा हो गया है। यद्यपि जनसंख्या नियंत्रण हेतु विभिन्न दलों के जागरूक सांसदों द्वारा अब तक संसद में 37-विधेयक लाए गए, पर सफल नहीं हुए। श्रीमद्भगवतगीता के अनुसार 'कर्मणि एव अधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन'। समाज इन सभी सांसदों के प्रयासों का सम्मान करता है। बार-बार विधेयकों का असफल होना लोकतांत्रिक व्यवस्था व राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। असम सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण की पहल की है और उत्तर प्रदेश सरकार इस दिशा में काम कर रही है। इन प्रयासों को प्रभावी बनाने में सहयोग देने के बजाय कई राजनेता तर्कहीन सवाल उठाकर विरोध कर रहे हैं। कुछ साम्प्रदायिक दृष्टकोण से देखते हुए इसे मुस्लिम समाज के विरुद्ध ठहरा रहे हैं, कुछ चुनावी लाभ हेतु सियासी मंशा बता रहे हैं। कुछ इसे अनावश्यक बता रहे हैं, कुछ बच्चों के जन्म को अल्लाह की मर्जी बता रहे हैं। जब भी जनसंख्या नियंत्रण की पहल होती हैं, नकारात्मक शक्तियां सक्रिय हो जाती हैं।

देखा गया हैं कि वैरिएबल्स की संख्या बढ़ने पर मैथमेटिकल मॉडल को हल करने में कठिनाई बहुत तेजी से बढ़ने लगती है। यही स्थिति जनसंख्या के विषय में है। जनसंख्या बढ़ने से मानव जीवन (पोषण, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, पारिवारिक व सामाजिक संबंध, आदि) की गुणवत्ता प्रभावित हो चुकी है। निरंतर घटते प्रति-व्यक्ति संसाधनों के कारण मानवीय संवेदनाएं कमजाेर पड़ रही हैं, व मानव एक-दूसरे का शोषण करने लगा है। प्रकृति व पर्यावरण के साथ मानव के व्यवहार की कल्पना करना भी कठिन है। कुछ राजनीतिक दल मानते हैं कि परिवार में बच्चों की संख्या पति-पत्नी पर निर्भर करती है,परन्तु विचारणीय है कि वाहन-चालकों को हेल्मेट पहनना व सीट-बेल्ट लगाना अनिवार्य बनाया गया है, विवाह करने व मदिरापान करने के लिए न्यूनतम उम्र निर्धारित की गई है, कोरोनाकाल में मास्क लगाना अनिवार्य किया गया है। महत्वपूर्ण निर्णय जनता की मर्जी पर नहीं छोड़े जा सकते। जनसंख्या वृद्धि देश की सबसे बड़ी समस्या है, इससे प्रति-व्यक्ति प्राकृतिक संसाधन निरंतर कम हो रहे हैं। इस पर तटस्थ रहना लापरवाही माना जाएगा। विगत दशकों में जनसंख्या नियंत्रण हेतु सरकारी प्रयास भी हुए, परन्तु वर्ष-1976 में आपातकाल के समय केंद्र सरकार के निर्देश पर परिवार नियोजन कार्यक्रम में सरकारी तंत्र के दुर्व्यवहार से समाज त्रस्त हो गया। परिणाम स्वरूप वर्ष 1977 के लोकसभा चुनाव में कुछ राज्यों में प्रतिकूल प्रभाव पड़ने से सरकार बदल गई। तब से किसी भी राजनीतिक दल ने इस पर कोई ठोस पहल नहीं की। यहां समझना आवश्यक है, कि वर्ष 1976 का परिवार नियोजन कार्यक्रम आपातकालीन जबर्दस्ती नसबन्दी अभियान था। विरोध करने वालों पर अत्याचार हुए। अभियान में व्यापक लापरवाही हुई। नसबन्दी कराने वालों के स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखा गया, जिससे संक्रमण होने पर मौतें भी हुईं, इसलिए जनता का आक्रोश उचित था।

फरवरी 2020 में मध्य प्रदेश सरकार ने भी जनसंख्या नियंत्रण की पहल की, परंतु परिवार नियोजन हेतु समाज को जागरूक करने की जिम्मेदारी स्वास्थ्य कर्मियों पर डाल दी। विचारणीय है कि अनुयायी तो राजनेताओं व राजनीतिक दलों के होते हैं, और उन्हीं के इशारे पर हाईवे जाम, रेलवे ट्रैक जाम, चक्का जाम, भारत बंद, सरकारी सम्पत्तियों की बर्बादी व राजनीतिक हिंसा जैसी अलोकतांत्रिक घटनाओं को अंजाम देते है, परंतु परिवार नियोजन हेतु समाज को समझाने का काम स्वास्थ्य कर्मियों को सौंप दिया जाता है। जनसंख्या नियंत्रण अत्यंत महत्वपूर्ण है। परिवार नियोजन के साधन अपनाने हेतु जागरूकता फैलाने में जनप्रतिनिधियों को स्वयं भी भूमिका निभानी चाहिए। जनसंख्या वृद्धि राष्ट्रीय समस्या है। आवश्यकता है दलगत सियासत से ऊपर उठकर संसद द्वारा जनसंख्या नियंत्रण हेतु सार्थक चर्चा कर एक-समान प्रभावी कानून बनाया जाय।प्रायः दो प्रकार की नीतियां अपनाई जाती हैं-प्रोत्साहक, अर्थात परिवार नियोजन अपनाने वालों को विशेष लाभ देकर, व हतोत्साहक, अर्थात परिवार नियोजन न अपनाने वालों को सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित कर। यह नीतियां गरीब-अमीर की खाई बढ़ा सकती हैं, और देर-सवेर मीडिया के दबाव, राजनीतिक या संवैधाननिक कारणों से परिवार नियोजन न अपनाने वालों की सहायता सरकार को विवश होना पड़ सकता है, इसलिए इन नीतियों से अपेक्षित सफलता मिलने में सन्देह है।

प्रस्तावित जनसंख्या नियंत्रण नीतियां दो से अधिक बच्चों के माता-पिताओं को सरकारी पदों व चुनाव के लिए अयोग्य बनाती हैं। अच्छा होगा यदि संसद द्वारा सांसदों, विधानमंडल सदस्योंसहित सभी संवैधानिक पदों की योग्यता भी इसी आधार पर निर्धारित की जाए। संख्याबल का राजनीति में विशेष महत्व है, इसलिए जनसंख्या-वृद्धि का राजनीतिक कारण भी हो सकता है। इसलिए जनसंख्या नियंत्रण हेतु हतोत्साहक नीति के तहत तीसरे बच्चे के जन्मदाता माता-पिता के मताधिकार समाप्त करने पर भी विचार किया जा सकता है। जन्मदर कम रखने के लिए दूसरे बच्चे के लिए आवश्यक सरकारी अनुमति का प्रावधान भी उपयोगी हो सकता है।

यह समझना आवश्यक है कि जन्मदर घटने से युवाओं-बुजुर्गों का अनुपात अवश्य घटेगा, पर इससे विचलित हुए बिना लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर आगे बढ़ना होगा। वैज्ञानिक तथ्य है कि गाड़ी स्टार्ट करने पर हेड-लाइट हल्की पड़ जाती है, और बीमारी का इलाज करने पर दवाइयों के दुष्प्भाव अवश्य होते हैं। दीर्घकालिक उज्ज्वल भविष्य के लिए वर्तमान में त्याग करना ही पड़ेगा। जनसंख्या वृद्धि का रोग कई अवस्थाएं पार कर चुका है, प्रभावकारी इलाज से ही राहत मिल सकती है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)


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