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भ्रष्टाचार की चर्चा करने पर संसद में एतराज क्यों

विपक्ष नहीं चाहता कि उनके दौर में हुए भ्रष्टाचार पर कोई बात करे

भ्रष्टाचार की चर्चा करने पर संसद में एतराज क्यों
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संसद सत्र के दौरान यदि राज्यों में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया जारी हो तो क्या ऐसे में प्रधानमंत्री और दूसरे नेताओं को जनसभाओं में सिर्फ भजन-कीर्तन करने चाहिए। जिस तरह कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, अन्नाद्रमुक और वाम मोर्चा के नेता केन्द्र की नीतियों को लेकर नुक्ताचीनी कर रहे हैं, क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को उनका जवाब तीखे हमलों से नहीं देना चाहिए। क्या सत्तारूढ़ दल पर आक्रमण करने के अधिकार विरोधी दलों को ही मिले हुए हैं। दूसरे दलों के नेताओं पर अगर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं तो प्रधानमंत्री और उनकी मंत्री परिषद के मंत्रियों को जनसभाओं में उसका उल्लेख करने से कैसे रोका जा सकता है। वह भी इस तर्क के आधार पर कि संसद का सत्र चल रहा है, इसलिए वे बाहर ऐसा कुछ नहीं बोल सकते। फिर यही बात खुद उनके नेताओं पर लागू क्यों नहीं होनी चाहिए?
मसला दरअसल, यह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने दो दिन पहले तमिलनाडु की एक सभा में बिना नाम लिये कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर यह कहते हुए निशाना साधा था कि हमने तो उन्हें दोषी नहीं ठहराया। इटली की एक अदालत ने नाम लिया है। हम तो न उनसे मिले हैं। न इटली गए हैं। अब इसमें हम क्या कर सकते हैं। चुनाव का समय है। पांच राज्यों में प्रक्रिया जारी है। असम और पश्चिम बंगाल में मतदान हो चुके हैं। तमिलनाडु, केरल आदि में अभी वोट पड़ने हैं। जिस तरह बाकी दलों के नेता प्रेस कांफ्रेंस, जनसंपर्क और सभाओं में दूसरे दलों और उनके नेताओं पर निशाने साध रहे हैं, उसी प्रकार केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं को भी हक है कि वे अपने विरोधियों की कमियों-खामियों को उजागर कर वोट मांगें। इसमें कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन कांग्रेस के नेताओं और सांसदों को लगता है कि प्रधानमंत्री ने सोनिया गांधी पर परोक्ष रूप से हमला करके संसद का अपमान किया है।
उनकी मानें तो जब संसद चल रही हो, तब प्रधानमंत्री को किसी भी मुद्दे पर संसद के बाहर नहीं बोलना चाहिए। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद के भीतर ही इसका जवाब देते हुए कहा कि ऐसे तर्क देकर विरोधी दलों के सांसद प्रधानमंत्री मोदी द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाई जा रही मुहिम को नहीं रोक सकते। सवाल यहां यह भी उठता है कि क्या विपक्ष नहीं चाहता कि उनके दौर में हुए भ्रष्टाचार पर कोई बात करे? यह क्या तर्क हुआ। अभी पिछले सप्ताह ही हेलीकॉप्टर घोटाले पर राज्यसभा में साढ़े चार घंटे से अधिक की चर्चा हुई है, जिसमें इटली की अदालत के फैसले के विभिन्न पहलुओं पर खुलकर विचार व्यक्त किए गए हैं। कोई दिन ऐसा नहीं जा रहा है, जब पक्ष-विपक्ष के नेता हेलीकॉप्टर सौदे में ली गई दलाली के मुद्दे पर टीवी चैनलों पर हो रही बहसों में भाग नहीं ले रहे हों।
इनमें कांग्रेस के प्रवक्ता और दूसरे नेता भी शामिल हैं। ऐसे में केवल प्रधानमंत्री के बोलने पर ऐतराज करना और सोची-समझी रणनीति के तहत दोनों सदनों में उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन के नोटिस देना क्या किसी भी दृष्टि से तर्कसंगत प्रतीत होते हैं। मंगलवार को तो खुद सोनिया गांधी की मौजूदगी में लोकसभा में कांग्रेस सदस्यों ने स्पीकर के आसन के सामने पहुंचकर प्रधानमंत्री के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और सदन की कार्यवाही को बाधित करने के हर संभव प्रयास किए। सूचनाएं यह भी मिल रही हैं कि अरविंद केजरीवाल की तर्ज पर कांग्रेस की तरफ से भी अब प्रधानमंत्री पर निजी हमले करने की रणनीति तैयार की जा रही है। स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस तरह की राजनीति संसद को कहां ले जा रही है, लगता है कांग्रेस नेताओं को इसकी परवाह नहीं है। होती तो बार-बार अलग-अलग मसलों को लेकर इस तरह संसद को बाधित करने की कोशिश नहीं करते।
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