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आरपी शर्मा का लेख : अविश्वास का विरोध

किसान संगठनों और विपक्षी राजनीतिक दलों को आशंकाएं हैं कि नए कानूनों से फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था समाप्त हो जाएगी, सरकारी मंडी समितियां बंद हो जाएंगी, संविदा पर खेती शुरू होने से किसानों की खेती पर कारपोरेट का कब्जा हो जाएगा। दरअसल, नए कानूनों में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है। दरअसल, जिन क्षेत्रों मे संविदा पर खेती हो रही है वहां किसानों की आय बढ़ी है। इस तरह के अधिकांश मामलों में किसानों की उपज का भाव और खरीद पहले ही सुनिश्चित हो जाती है। इससे किसानों को कई तरह की चिंताएं दूर हो जाती हैं।

आरपी शर्मा का लेख :  अविश्वास का विरोध
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किसान आंदोलन, फोटो फाइल

आरपी शर्मा

नए कृषि कानूनों के पक्ष में सरकार बार-बार दावा कर रही है इससे कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आएंगे। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि ये सुधार वाकई में इतने लाभकारी हैं तो आखिर इनका देशभर में आखिर विरोध क्यों हो रहा है? जाहिर है किसानों के बीच कहीं न कहीं अविश्वास और कुछ शंकाएं जरूर हैं जिन्हें दूर करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। इन मुद्दों पर कई दौर की वार्ताओं के बावजूद गतिरोध दूर नहीं हो पा रहा है। तमाम किसान संगठन नए कानूनों को रद करने की मांग पर पड़े। कोरोना संकट के बीच किसी भी पक्ष की ओर इस अड़ियल रुख अख्तियार करना राष्ट्रहित में नहीं है।

शंकाएं और हकीकत

किसान संगठनों और विपक्षी राजनीतिक दलों को आशंकाएं हैं कि नए कानूनों से फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था समाप्त हो जाएगी, सरकारी मंडी समितियां बंद हो जाएंगी, संविदा पर खेती शुरू होने से किसानों की खेती पर कारपोरेट का कब्जा हो जाएगा। दरअसल, नए कानूनों में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है। दरअसल, जिन क्षेत्रों मे संविदा पर खेती हो रही है वहां किसानों की आय बढ़ी है। इस तरह के अधिकांश मामलों में किसानों की उपज का भाव और खरीद पहले ही सुनिश्चित हो जाती है। इससे किसानों को कई तरह की चिंताएं दूर हो जाती हैं। ऐसे में किसान आंदोलन में सियासत का तड़का लगा हुआ है और किसानों को भरमाया जा रहा है, इन आशंकाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता। किसान एमएसपी प्रणाली को कानूनी दर्जा देने की मांग कर रहे हैं जो काफी हद तक वाजिब है। जब सरकार कैबिनेट की बैठक आहूत कर फसलों का एमएसपी निर्धारित करती है तो किसानों की पूरी फसल एमएसपी या इससे ऊंचे दामों पर ही खरीदी जानी चाहिए,लेकिन यह अन्नदाता का दुर्भाग्य ही है कि वह अपनी उपज तय मूल्य से आधे दाम पर भी बेचने को मजबूर है। ऐसे में एमएसपी को संवैधानिक दर्जा दिए जाने की सख्त जरूरत है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि एमएसपी की व्यवस्था पांच दशक से ज्यादा पुरानी है तो फिर यह काम पहले क्यों नहीं किया गया?

बड़े सुधारों का विरोध

देश में सुधारों का विरोध कोई नई बात नहीं है। लोकतंत्र में यह किसानों का अधिकार है कि उन्हें कुछ गलत लग रहा है तो उसके खिलाफ मजबूती से अपनी आवाज उठाएं। चूंकि कृषि सुधारों का मसला किसानों के भविष्य से जुड़ा है उनकी चिंताओं को खारिज भी नहीं किया जा सकता। लेकिन कल क्या होगा यह आज ही तय कर लेना गलत भी साबित हो सकता है। अतीत में देखें तो जब देश में केंद्र राजीव गांधी सरकार ने देश में कंप्यूटरीकरण पर जोर दिया था तो देशभर में इसका भारी विरोध हुआ था। तब तमाम विशेषज्ञों ने आशंका जाहिर की थी कि इससे बेकारी बढ़ेगी। इसी तरह जब जीएसटी प्रणाली लागू हुई थी तो व्यापारियों के साथ तमाम विपक्षी दल विरोध के लिए मैदान में उतर आए थे। हालांकि इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि शुरुआत में इस कर सुधार से व्यापारियों को कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, लेकिन इन्हें दूर करने के लिए सरकार जीएसटी के ढांचे में कई बार बदलाव कर चुकी है। कंप्यूटरीकरण और जीएसटी आज दोनों ही सुधारों का परिणाम जगजाहिर है। अब कंप्यूटर जीवन का अंग बन गया है। जीएसटी प्रणाली ने भी व्यापारियों की कई समस्याओं का समाधान कर दिया है। अब नए कृषि सुधारों के बारे में भी इसी तरह का रुख अपनाया जा रहा है। पुरानों अनुभवों को देखते हुए सरकार को नए कृषि सुधारों के बारे में किसानों के अविश्वास को दूर करने के कारगर उठाने चाहिए थे। सरकार इस मोर्चे पर विफलता ही किसान आंदोलन की उपज है।

इसमें कोई दोराय नहीं कि लगातार छोटी होती जा रही जोतों की वजह से अधिकांश किसानों के लिए खेती अब लाभकारी नहीं रह गई है। नाबार्ड की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा सालाना 3.36 लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी प्रदान करने के बावजूद देश प्रत्येक किसान पर औसतन एक लाख रुपए से ज्यादा का कर्ज है। आर्थिक संकट की वजह से देश में हर रोज औसतन 28 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। एनसीआरबी की रपट के मुताबिक वर्ष 2019 में 10,281 किसानों ने आत्महत्या की। जाहिर है देश का अन्नदाता आर्थिक संकट में फंसा हुआ है। इस वर्ग की खुशहाली के लिए सरकार को अभी और कदम उठाने होंगे। इस दरम्यान इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि बिहार, झारखंड और पंजाब, हरियाणा के किसानों को एक ही तराजू में नहीं तोला जा सकता। सरकार की किसान सम्मान निधि योजना बिहार-झारखंड के किसानों के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकती है लेकिन पंजाब के किसानों के लिए यह कितनी आकर्षक है, इस बात का आकलन करने जरूरत है।

बहरहाल, किसान आंदोलन का जल्द से जल्द समाधान निकालना जरूरी है। किसानों को भी अडिग रुख छोड़कर मसले के समाधान की ओर बढ़ना चाहिए। इस मुद्दे पर अड़ियल रुख से देश और अन्नदाता दोनों का ही नुकसान है।

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