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भूटान की यात्रा के कूटनीतिक मायने

कूटनीति बिखरे हुए संबंधों में सामंजस्य स्थापित करने की एक कला है।

भूटान की यात्रा के कूटनीतिक मायने
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नई दिल्‍ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भूटान को चुना। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक हैकि कूटनीतिक संदर्भ में थिंपू (भूटान की राजधानी) को उन्होंने विशेष महत्व क्यों दिया है। इससे पहले मोदी अपने शपथ ग्रहण समारोह में मॉरीशस और सार्क देशों के प्रमुखों, जिसमें भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग टॉबगे भी शामिल हुए थे, को बुलाकर भारतीय विदेश नीति को बिल्कुल अलग रूप देने की कोशिश कर चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंधों का सिद्धांत भी यही कहता है कि कूटनीति बिखरे हुए संबंधों में सामंजस्य स्थापित करने की एक कला है। दूसरे मुल्कों से समान व्यवहार कर ही आप खुद के लिए प्रतिष्ठा हासिल कर सकते हैं।

जाहिर है, भूटान एक तो हमारा पड़ोसी है और दूसरा इसका सामरिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक महत्व है। इस लिहाज से मोदी की भूटान यात्रा पड़ोसी देशों के साथ अच्छे रिश्ते बनाने की उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। रविवार से शुरू हुई इस दो दिवसीय यात्रा में दोनों देशों के प्रमुख आपसी रिश्तों को मजबूत बनाने, आपसी कारोबार बढ़ाने और पनबिजली परियोजना में साझेदारी पर चर्चा करेंगे। नरेंद्र मोदी ने इस यात्रा के बारे में कहा हैकि भूटान और भारत के बीच एक खास रिश्ता है जो समय की कसौटी पर हमेशा खरा उतरा है। इसीलिए पहली विदेश यात्रा के लिए भूटान मेरी स्वाभाविक पसंद था। यह दक्षिण एशिया में अच्छे पड़ोसी से संबंधित हमारी नीति और मित्रता के तहत सबसे अच्छा देश है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह दौरा कई मायनों में ऐतिहासिक साबित होगा। यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री भूटान की संसद के संयुक्त सत्र को भी संबोधित करेंगे। भारत की मदद से चलाई गई परियोजना के तौर पर खोतोंगचू पनबिजली परियोजना की आधारशिला रखने के साथ ही भूटान के सुप्रीम कोर्ट की इमारत का भी उद्घाटन करेंगे।

इसके अलावा भी शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग, निवेश व उद्योग, आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग बढ़ाने पर बात होगी। भूटान को चुनने का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि चीन ने हाल के दिनों में इस देश को अपने साथ लाने के प्रयास तेज कर दिये हैं और थिंपू के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किये हैं। वैसे भी भूटान भारत और चीन के बीच स्थित है जिसके कारण इसका सामरिक महत्व और भी बढ़ जाता है। पन बिजली, सीमेंट और सूचना प्रौद्योगिकी सहित भारत भूटान की 16 महत्वपूर्ण परियोजनाओं में मदद कर रहा है। दोनों देशों के बीच पन बिजली क्षेत्र में सहयोग भूटान और भारत दोनों के लिए बहुत लाभकारी सिद्ध हो रहा है। भूटान और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2012 में 6830 करोड़ रुपयों का हुआ। इसमें वृद्धि की काफी संभावना है, जिसकी तलाश में मोदी भूटान गए हैं।

इसके बाद प्रधानमंत्री की अगली यात्रा जुलाई में जापान की होनी है। दोनों के बीच संबंधों की अपनी ऐतिहासिकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान के प्रधानमंत्री के साथ व्यक्तिगत मित्रता भी है। ऐसे में जब चीन के साथ उसके संबंधों में खटास आई है तब यह दौरा भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फिर सितंबर में मोदी संयुक्त राष्ट्र के कार्यक्रम में भाग लेने न्यूयॉर्क जाएंगे जहां उनकी मुलाकात अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से होगी। इन यात्राओं के बाद भारत की विदेश नीति को एक स्पष्ट दिशा मिलने की उम्मीद है।

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