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हरवीर सिंह का लेख : सख्त रुख से बढ़ी हैं मुश्किलें

देश के कृषि क्षेत्र और किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए यथास्थिति (स्टेटस को) को बदलने की जरूरत है और इसके लिए कानूनों के साथ ही व्यवस्थागत बदलावों की जरूरत है। यह जरूरत इसलिए पैदा हुई है क्योंकि मौजूदा स्थिति किसानों की समस्याओं को दूर नहीं कर पा रही है। किसानों और गैर-कृषि क्षेत्र से जीवन यापन करने वाले लोगों की बीच आय और आर्थिक स्थिति में अंतर बढ़ता जा रहा है। जाहिर सी बात है कि किसानों की आय बढ़ानी होगी और यह बढ़ोतरी केवल फसलों से होने वाली आय से संभव नहीं है। दूसरा उपाय है कि फसलों की उत्पादन लागत को घटाया जाए ताकि किसानों का मुनाफा बढ़ सके। यह वह पहेली है जिसका हल ढ़ूंढ़ना समय की जरूरत है।

हरवीर सिंह का लेख : सख्त रुख से बढ़ी हैं मुश्किलें
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तीन कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का आंदोलन दूसरे माह में प्रवेश कर गया है। इन कानूनों के विरोध में किसान संगठनों की आवाज छह माह से ही आनी शुरू हो गई थी। 25 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नौ करोड़ किसानों के खाते में 18 हजार करोड़ रुपये की राशि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत हस्तांतरित की और इस मौके पर किसानों के विरोध और आंदोलन पर अपना रुख भी साफ किया। जिसमें वह नए कानूनों को किसानों के हित में बता रहे हैं।

असल में कानून क्या वाकई किसानों के हित में हैं या नहीं असली विवाद इसी बात पर है। यह बात भी सच है कि देश के कृषि क्षेत्र और किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए यथास्थिति (स्टेटस को) को बदलने की जरूरत है और इसके लिए कानूनों के साथ ही व्यवस्थागत बदलावों की जरूरत है। यह जरूरत इसलिए पैदा हुई है क्योंकि मौजूदा स्थिति किसानों की समस्याओं को दूर नहीं कर पा रही है। किसानों और गैर-कृषि क्षेत्र से जीवन यापन करने वाले लोगों की बीच आय और आर्थिक स्थिति में अंतर बढ़ता जा रहा है।

जाहिर सी बात है कि किसानों की आय बढ़ानी होगी और यह बढ़ोतरी केवल फसलों से होने वाली आय से संभव नहीं है। दूसरा उपाय है कि फसलों की उत्पादन लागत को घटाया जाए ताकि किसानों का मुनाफा बढ़ सके। यह वह पहेली है जिसका हल ढ़ूढ़ना समय की जरूरत है और इसी हल को ढ़ूढ़ने के लिए सरकार ने तथाकथित क्रांतिकारी कानूनों को लाने का फैसला लिया है।

पहला कानून है कि फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कामर्स (प्रोमोशन एंड फेसिलिटेशन) एक्ट, दूसरा है द फार्मर्स (इंपावरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट आन प्राइस एश्यूरेंस एंड फार्म सर्विसेज एक्ट और तीसरा द एसेंशियल कमोडिटीज (अमेंडमेंट) एक्ट। सितंबर में संसद में पारित इन कानूनों का किसानों को अभी क्या फायदा मिला है, यह कहना मुश्किल है क्योंकि कुछ राज्यों द्वारा इनको अधिसूचित कर दिये जाने के बावजूद इन पर पूरी तरह अमल शुरू नहीं हुआ है।

इन कानूनों में सबसे अधिक विवाद पहले कानून को लेकर है जिसमें राज्यों के एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (एपीएमसी) एक्ट के दायरे के बाहर के हिस्से को ट्रेड एरिया घोषित कर दिया गया है जहां कोई भी व्यक्ति एक परमानेंट अकाउंट नंबर (पैन) कार्ड के साथ किसी भी उत्पाद की खरीद कर सकता है। उसके ऊपर कोई कर नहीं लगेगा जबकि मंडी में राज्यों द्वारा अलग-अलग दरों से कर, शुल्क व सेस लगाये जाते हैं। साथ ही यह व्यक्ति किसी भी किसान से उसके साथ तय कीमत पर उत्पाद की कितनी भी मात्रा खरीद सकता है और उसे देश कहीं भी ले जा सकता है। विवाद यहीं से शुरू होता है कि अगर ऐसा होगा तो मंडी व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी और बाद में यह व्यापारी किसानों का शोषण करेंगे। दो कानून किसान के उत्पाद की खरीद से जुड़े हैं और इनमें कहीं भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का कोई जिक्र या प्रावधान नहीं है। न ही कीमत तय करने के लिए कोई मानदंड या पैमाना है केवल सहमति से दाम तय करने की बात कही गई है। इसी तरह आवश्यक वस्तु अधिनियम में किसी भी मात्रा में भंडारण करने पर प्रतिबंध समाप्त कर दिये गये है। केवल आपदा के समय में सरकार जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं की कीमत में 100 फीसदी और अधिक समय तक भंडारण वाले उत्पादों के मामले में 50 फीसदी कीमत बढ़ने पर स्टाक लिमिट जैसे कदम उठा सकती है। इस पर किसानों का तर्क है कि कारोबारी फसल आने के समय में कीमतें गिरा देंगे और बाद में दाम बढ़ा लेंगे। जहां तक विवाद निपटारे की बात है तो कानूनों में एसडीएम के द्वारा एक विवाद निपटारा समिति बनाकर मामले को हल करने की व्यवस्था है जो केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव तक जा सकती है। लेकिन न्यायालय में मामला नहीं जा सकता है। यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी केंद्र सरकार या राज्य सरकार के अधिकारी के फैसले के खिलाफ किसी न्यायालय में केस दर्ज नहीं किया जा सकता है। यानी नौकरशाही ने अपने आप को कानूनी रूप से बचाने की व्यवस्था का पूरा खयाल रखा है।

बहरहाल सरकार कह रही है कि कानून किसानों की बेहतरी के लिए हैं और किसान कह रहे हैं कि यह हमें बरबाद कर देंगे। इसलिए इन कानूनों को रद्द किया जाए। साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी बनाने के साथ ही उस पर खऱीद की व्यवस्था की जाए। इसके नीचे कृषि उत्पादों की खरीद को गैरकानूनी माना जाए। अब सरकार जब यह तीन कानून ला रही थी जो उसे एमएसपी को लेकर किसानों की संवेदनशीलता का ध्यान ही नहीं था। यह बात अलग है कि साल 2017 से आल इंडिया किसान संघर्ष कोआर्डिनेशन कमेटी (एआईकेएससीसी) एमएसपी को कानूनी गारंटी और कर्ज माफी को लेकर आंदोलन चला रही थी। इन दोनों मांगों पर कानून बनवाने के लिए कमेटी के सदस्यों ने पिछली लोक सभा के सांसद राजू शेट्टी जो एआईकेएससीसी के पदाधिकारी भी हैं के जरिये प्राइवेट मेंबर बिल भी संसद के पटल पर पेश कराया। मौजूदा विवाद ने इस मुद्दे को भी आंदोलन की मांग का हिस्सा बना दिया।

अब सवाल है कि आगे का रास्ता क्या होगा। सरकार अपने फैसले को जायज ठहराने के लिए तमाम विकल्पों का इस्तेमाल कर रही है। मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंच गया है। आंदोलन दिनोंदिन बड़ा होता जा रहा है। बेहतर होगा कि आंदोलन को लंबा खींचने से बचा जाए और दोनों पक्ष खुले मन से बातचीत कर कोई रास्ता निकालें। सरकार को भी मानना होगा कि लोकतंत्र में कोई फैसला थोपा जाना उचित नहीं है। जिसके लिए फैसला लिया गया है उसमें उसकी भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी है। किसानों के प्रतिनिधियों को भी कहीं एक प्वाइंट पर आना होगा ताकि उनके आंदोलन का परिणाम उनकी मांगों के अनुरूप निकले। साथ ही सभी को यह मानना होगा अगर कानून किसानों के हितों के खिलाफ हैं तो यथास्थिति भी उनके पक्ष में नहीं है क्योंकि इसके चलते ही उनकी आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही है। कृषि एक पेशा होने के साथ ही एक आर्थिक गतिविधि है और उस पर केवल घरेलू ही नहीं वाह्य कारक भी असर डालते हैं। कोई नीति जो 55 साल पहले बनी उसके बदलने की जरूरत है साथ ही उसे नाकाम भी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि इन पांच दशकों में देश के किसान और कृषि क्षेत्र को उसका फायदा मिला है और हम अधिकांश कृषि उत्पादों के मामले में आत्मनिर्भर हैं। इसमें उन किसानों की मेहनत भी है जो इस समय आंदोलनरत हैं। इसलिए उनके हितों और भावनाओं को ध्यान में रखते हुए ही इस संकट का रास्ता निकालने के लिए सरकार को पहल करनी चाहिए। सरकार व किसानों के बीच जारी विवाद का हल निकाला जाना अति आवश्यक है।

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