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उमेश चतुर्वेदी का लेख : कांग्रेस में अलग तरह की जंग

कांग्रेस में अलग तरह की जंग चल रही है। इसे अनुभव बनाम आग की जंग के तौर पर देखा जा रहा है। अनुभव यानी बूढ़े कांग्रेसियों की जमात और आग यानी युवा कांग्रेसियों का खेमा। आम कांग्रेसी भी मानता है कि इसके लिए जिम्मेदार कांग्रेस संगठन पर काबिज बुजुर्गों की वह जमात है, जो अब सड़क पर संघर्ष करना भूल चुकी है। उसका एक मात्र उद्देश्य सत्ता में भागीदारी हासिल करना है। सत्ता के एयरकंडीशंड माहौल में खुद को आखिरी दम तक बचाए बनाए रखना है।

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गहलोत- पायलट

उमेश चतुर्वेदी

बलिदान और जौहर के लिए विख्यात राजपूताना की भूमि इन दिनों नए तरह से संघर्ष की साक्षी बनी है। अब दौर मध्यकाल का नहीं, लिहाजा अब तलवारों की बजाए राजनीतिक दांवपेच से रणबांकुरों की धरती पर युद्ध जारी है। यह जंग मध्यकालीन जंग से इस मायने में भी भिन्न है कि इसमें दोनों ही पक्षों में से कोई भी पक्ष राजपूत नहीं है। एक तरफ हैं राजस्थान की राजनीति में जादूगर के मशहूर अशोक गहलोत हैं तो दूसरी तरफ हैं गूर्जर समुदाय का युवा चेहरा सचिन पायलट। वह सचिन पायलट, जो 14 जुलाई तक राज्य की कांग्रेस इकाई के अध्यक्ष थे। दिलचस्प यह भी है कि इस जंग में संगठन का मुखिया ही बर्खास्त कर दिया गया। यह जंग इस मायने में भी दिलचस्प है कि सचिन पायलट, सरकार में जादूगर के सहकारी यानी डिप्टी थे।

कांग्रेस की इस अंदरूनी जंग को अनुभव बनाम आग के तौर पर देखा जा रहा है। अनुभव यानी बूढ़े कांग्रेसियों की जमात और आग यानी युवा कांग्रेसियों का खेमा। भारतीय राजनीति में कांग्रेस का प्रभाव लगातार छीजता जा रहा है। आम कांग्रेसी भी मानता है कि इसके लिए जिम्मेदार कांग्रेस संगठन पर काबिज बुजुर्गों की वह जमात है, जो अब सड़क पर संघर्ष करना भूल चुकी है। उसका एक मात्र उद्देश्य सत्ता में भागीदारी हासिल करना है, भले ही कितने बड़े पद उसने अतीत में संभाले हों, विधान सभा या विधान परिषद तक की सदस्यता हासिल करना और सत्ता के एयरकंडीशंड माहौल में खुद को आखिरी दम तक बचाए बनाए रखना है। अगर वह संघर्ष करते नजर आती भी है तो सिर्फ इसलिए कि उसकी अगली पीढ़ी राजनीति के मैदान में प्रभावी पद हासिल कर ले। इस प्रक्रिया में हकीकत के मेहनती लोगों की मेहनत पर पानी फिरता है तो फिरता रहे। मध्य प्रदेश के दिग्विजय सिंह या कमलनाथ हों या फिर राजस्थान के अशोक गहलोत, इन सबकी एक मात्र कोशिश है, अपने-अपने बेटों को स्थानीय राजनीति में न सिर्फ फिट करना, बल्कि उन्हें स्थापित भी करना। अशोक गहलोत के बेटे वैभव पिछला आम चुनाव हार चुके हैं, जबकि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह इस मायने में कुछ भाग्यशाली कहे जा सकते हैं कि उनके बेटे नकुल नाथ लोकसभा पहुंच चुके हैं तो दिग्विजय के बेटे राज्य में मंत्री तक रहे। कमलनाथ हों या दिग्विजय या फिर अशोक गहलोत, इन्हें अपने बेटों की राह में बड़ा रोड़ा कभी ज्योतिरादित्य सिंधिया नजर आते हैं तो कभी सचिन पायलट। जबकि यह सत्य है कि चाहे मध्य प्रदेश की सत्ता हो या फिर राजस्थान की, दोनों जगहों पर पसीना ज्योतिरादित्य ने बहाया या फिर सचिन ने। सचिन तो राजस्थान अध्यक्ष बनाकर इसी लिए भेजे गए थे कि अगर विस चुनाव में जीत मिली तो उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, लेकिन जीत मिली तो सचिन को उप मुख्यमंत्री पद लेने के सांगठनिक तौर पर मजबूर किया गया तो ज्योतिरादित्य को किनारे कर दिया गया।

राजस्थान में तो सचिन पायलट को सत्ता में भागीदारी तो मिली, लेकिन अपने अधीन वाले मंत्रालयों तक में अधिकारियों के स्थानांतरण या बदलाव की छूट नहीं मिली। अपने मंत्रालयों के लिए वे नीतिगत फैसले तक नहीं ले सकते थे। ऐसे में वह कब तक चुप रहते। चाहे मध्य प्रदेश का संकट हो या राजस्थान का, कांग्रेस इनके लिए भारतीय जनता पार्टी को जिम्मेदार ठहराती है। अब भारतीय जनता पार्टी तो सधुक्कड़ी तपस्वी तो रही नहीं। लोकतांत्रिक समाज में वह अपने राजनीतिक फायदे के दांवपेच से क्यों चूकती। अगर वह चूकती भी है तो वह उसकी राजनीतिक कमजोरी ही मानी जाएगी। इसलिए उसने चारा फेंक दिया। भाजपा को जिम्मेदार ठहराने वाली कांग्रेस की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह अपने घर को चाक-चौबंद रखे। वह अपने नेताओं के साथ इंसाफ करती दिखे ताकि उसके नेता दूसरों की ओर राहत की उम्मीद ना लगा सकें।

राजस्थान की विधानसभा में दो सौ सीटें हैं। जिनमें से 122 पर कांग्रेस का कब्जा था। इनमें से 16 विधायक बागी हो गए हैं। सोलह विधायकों को पार्टी से अभी तक बाहर नहीं निकाला है, अलबत्ता अनुशासनहीनता के आरोप में वह स्पीकर सीपी जोशी की अदालत में पहुंच गई और पायलट समेत सभी सोलह विधायकों की सदस्यता खारिज कराने में जुट गई। सीपी जोशी ने भी देर नहीं लगाई और वे भूल गए कि दलबदल कानून इन विधायकों पर इसलिए लागू नहीं हो सकता, क्योंकि अभी विधानसभा का सत्र नहीं चल रहा है। चूंकि सत्र नहीं चल रहा है तो उन पर पार्टी ह्वीप भी प्रभावी नहीं होता। उन्होंने इन विधायकों को नोटिस जारी कर दिया।

इससे स्पीकर सवालों के घेरे में आ गए, लेकिन बहुत कम लोगों को याद है कि जिस तरह 2018 में सचिन की मेहनत का फल अशोक गहलोत खा रहे हैं, उसी तरह 2008 में इन्हीं सीपी जोशी की मेहनत का फल भी अशोक गहलोत प्यार से पांच साल तक चखते रहे। तब सीपी जोशी राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष थे। उनकी अगुआई में पार्टी तो जीत गई, लेकिन वे महज एक वोट से खुद चुनाव हार गए और हाथ आई सत्ता उनके हाथ से रेत की मानिंद फिसल गई। यह भी याद रखना चाहिए कि राजस्थान की राजनीति में सीपी जोशी, अशोक गहलोत के विरोधी माने जाते हैं। सीपी जोशी, मोहन प्रकाश और डॉ चंद्रभान साथी हैं। 2009 में राजस्थान कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने को लेकर कांग्रेस में केंद्रीय स्तर पर तकरीबन फैसला हो चुका था। लेकिन अशोक गहलोत ने लंगड़ी मार दी। जब राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बने तो अशोक गहलोत उनके गुरू के तौर पर उभरे। इसका असर यह हुआ कि वे राहुल गांधी के और नजदीक हो गए। नजदीक होते ही उन्होंने सीपी जोशी और मोहन प्रकाश को निबटाया। दोनों न सिर्फ कांग्रेस की सर्वोच्च नीति निर्धारक और नियामक कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य थे, बल्कि महासचिव भी थे। लेकिन राहुल के संगठन में दोनों का पत्ता कट गया। सीपी जोशी इस अपमान को शायद ही भूले होंगे। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यही वजह है कि उन्होंने गहलोत की कांग्रेस की अर्जी को फौरन स्वीकार कर लिया। दरअसल वे जानते हैं कि उनके फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है और वह कोर्ट के सामने टिक भी नहीं सकता। इससे अशोक गहलोत को मुंह की खानी पड़ सकती है। वही हुआ, हाईकोर्ट ने भी सचिन पायलट खेमे की अर्जी पर स्पीकर को फैसला लेने से रोक दिया। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाकर स्पीकर ने एक बार फिर गहलोत खेमे को ही चोट पहुंचाई है। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट को फैसला देने से रोकने से इनकार कर दिया।

चूंकि अभी तक सचिन पायलट ने पार्टी नहीं छोड़ी है, लिहाजा माना जा सकता है कि सीपी जोशी को सर्वानुमति का उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस मुख्यमंत्री बना सकती है। चूंकि राजस्थान में मध्य प्रदेश जैसी मजबूत हालत में भारतीय जनता पार्टी नहीं है, लिहाजा भाजपा खुद इस मामले में आगे बढ़ती नजर नहीं आ रही है। वैसे अशोक गहलोत जिस तरह हंगामा मचा रहे हैं और राजभवन में जबरदस्ती विधानसभा सत्र बुलाने के लिए विधायकों समेत धरना दिया। उसे लेकर माना जा रहा है कि वे खीझ निकाल रहे हैं। उन्होंने राजभवन को घेरने की चेतावनी देकर अपनी चिढ़ को ही जाहिर कर रहे हैं। हालांकि यह मामला राज्य में कानून व्यवस्था के फेल होने का बन सकता है। जो राज्य में अनुच्छेद 356 लागू करने का जरिया भी बन सकता है।

इस पूरी जंग में एक दिलचस्प ट्वीट पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। सारा पायलट ने एक ट्वीट किया कि जब हम दिल्ली का रूख करते हैं तो अच्छे-अच्छे जादूगरों के पसीने छूट जाते हैं। निश्चित तौर पर अशोक गहलोत को पसीने छूट रहे हैं। लेकिन इस जंग का अंजाम क्या होगा, अभी स्पष्ट नहीं है। सिर्फ इतना स्पष्ट है कि पहले मध्य प्रदेश और फिर राजस्थान में कांग्रेस के युवा खून के विद्रोह ने कांग्रेस की भावी राजनीति पर सवालों की लंबी फेहरिश्त फेंक दी है। कांग्रेस के युवा नेतृत्व के कुछ बड़े नामों जैसे संजय निरूपम, प्रिया दत्त, मिलिंद देवड़ा और जितिन प्रसाद ने जिस तरह कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति पर सवाल उठाया है और सचिन का साथ दिया है, उससे साफ है कि अगर कांग्रेस ने अपनी रणनीति नहीं बदली, बुजुर्ग नेताओं की स्वार्थ और सत्ता लिप्सा पर लगाम नहीं लगाई तो उसके आने वाले दिन कत्तई बेहतर नहीं रहने वाले हैं।

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