Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

शंभू भद्रा का लेख : नेतृत्व विकसित करे एशिया

एशिया को अपने भविष्‍य के बारे में सोचना चाहिए। विश्‍व में शक्ति संतुलन बदल रहा है। यूरोप और अमेरिका के पास अब वैश्विक नेतृत्‍व की क्षमता नहीं बची है। इसलिए अब एशिया लीड करे।

शंभू भद्रा का लेख : नेतृत्व विकसित करे एशिया
X

शंभू भद्रा

शंभू भद्रा

पड़ोसी देशों के साथ कोविड प्रबंधन संवाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 21 वीं सदी एशिया की होने की बात कही है। निश्चित रूप से यह उम्‍दा विचार है। एशिया में वो सभी संभावनाएं हैं कि वह ग्रेट बन सकता है, आत्‍मनिर्भर बन सकता है। लेकिन एशियाई इतिहास की विडंबना रही है कि अब तक किसी भी नेतृत्‍व ने एशिया को सर्वशक्तिमान बनाने के बारे में समग्रता से नहीं सोचा है। प्राचीन काल हो, या मध्‍यकाल हो या फिर आधुनिक काल हो, सभी काल में एशियाई देश आपस में ही टकराते रहे हैं। आज भी एशिया के देशों के बीच जितना टकराव, सामरिक तनाव, अविश्‍वास और एकाधिकार के लिए सोच हावी है कि पीएम मोदी की एकजुट एशिया की दृष्टि का साकार होना असंभव सा लगता है, लेकिन यह नामुमकिन नहीं है।

अस्‍सी के दशक तक आत्‍मनिर्भर एशिया की संकल्‍पना ही बेमानी थी, क्‍योंकि सभी औद्योगिक व तकनीकी विकास यूरोप व अमेरिका में हो रहे थे। एशिया को अपने विकास के लिए वह यूरोप-अमेरिका पर निर्भर था। इसका पश्चिमी देशों ने एशिया से खूब आर्थिक फायदा भी उठाया। आज 21 वीं सदी में वक्‍त बदल चुका है। जापान, चीन, भारत, दक्षिण कोरिया, इजराइल आदि एशियाई देश विज्ञान, तकनीक, उद्योग, कृषि आदि सभी दृष्टि से एशिया को आत्‍मनिर्भर बनाने में अहम भूमकिा निभा सकते हैं। कोविड प्रबंधन से लेकर टीका निर्माण तक भारत, चीन व जापान ने उल्‍लेखनीय भूमिका निभाई। एशिया के देश अगर ठान ले कि वे आत्‍मनिर्भर बनेंगे, तो पांच से दस साल के अंदर वे अमेरिका व यूरोप पर से अपनी निर्भरता खत्‍म कर सकते हैं।

लेकिन एशिया की एकजुटता की राह में कुछ रोड़े हैं, जिनके समाधान के बिना वह ग्रेट नहीं बन सकता। सबसे पहले ग्रेट एशिया की सोच से लबरेज नेतृत्‍व चाहिए। ऐसा नेतृत्व किसी भी एशियाई देश से निकल सकता है। हालांकि भारत, चीन, जापान, इजराइल, ईरान व सऊदी अरब साझा नेतृत्व की ओर आगे बढ़े तो बेहतर हेगा। दूसरी अहम बात है कि एशिया के अंदर क्लैश ऑफ रिलिजियस सिविलाइजेशन है। हिंदू, बौद्ध व इस्लाम तीन बड़े धर्म एशिया में हैं। ईसाई धर्म ने भी कुछ देशों में अपनी पैठ जमा ली है। हाल के वर्षों में इस्लाम का रेडिकेलाइजेशन इस कदर हुआ है कि वह दूसरे धर्मो के लोगों को काफिर मानने लगा है, जबकि शिक्षा बढ़ने के साथ-साथ इस्लाम का सुफियाना रूप अधिक उभरना चाहिए। एशिया में धार्मिक टकराव हेमशा यहां की राजनीति को प्रभावित करती रही है। इसलिए अगर एशिया को एकजुट होना है तो इस्लाम को दूसरे मजहबों के प्रति सहिष्णु बनना होगा। कट्टरता की वजह से इस्लामिक फोबिया हावी है।

एशिया की समृद्धि के लिए धार्मिक सहिष्णुता की स्थापना जरूरी है। तीसरी बात कि एशिया में सीमाई झगड़े बहुत हैं। इसमें चीन की विस्तारवादी नीतियों के चलते सीमा पर सबसे अधिक देशों से उसके तनाव हैं। इसका हल संभव है। इस वक्त जब एशियाई देश गहरे विश्‍वास संकट के दौर से गुजर रहे हैं, तब उन्हें इतिहास से सबक लेना चाहिए। पूर्व और पश्चिम जर्मनी का एकीकरण हो, इजराइल-फिलिस्‍तीन शांति समझौता हो, इजराइल का अरब व तुर्की के साथ शांति करार हो, जर्मनी का रूस से कटुता भुलाना हो या 88 साल की दुश्‍मनी के बाद अमेरिका और क्‍यूबा की दोस्‍ती हो, इन ऐतिहासिक सुखद घटनाओं से एशियाई देशों को सीख लेनी चाहिए। कहने का तात्‍पर्य कि उत्‍तर कोरिया और दक्षिण कोरिया अपनी दुष्‍मनी भुला सकते हैं, भारत व चीन अपना तनाव खत्‍म कर सकते हैं, भारत व पाकिस्‍तान अपनी दुश्‍मनी समाप्‍त कर सकते हैं, चीन अपने सीमाई देशों को परेशान करना और दक्षिण चीन सागर में दावा करना छोड़ सकता है। ये सभी बातें यूटोपिया लग सकती हैं, लेकिन ऐसा होने से एशिया बहुत जल्‍द आत्‍मनिर्भर और खुशहाल बन सकता है। उसे यूरोप-अमेरिका की तरफ नहीं ताकना पड़ेगा। एशिया को अपने भविष्‍य के बारे में सोचना चाहिए। विश्‍व में शक्ति संतुलन बदल रहा है। यूरोप और अमेरिका के पास अब वैश्विक नेतृत्‍व की क्षमता नहीं बची है।

बड़ी बात तो यह है कि यूरोपीय-अमेरिकी वैश्विक नेतृत्‍व कम से कम एशिया की प्रगति के लिए कभी नहीं रहा, हमेशा एशिया के शोषण और दोहन के लिए रहा। कितनी बड़ी विडंबना है कि प्राकृतिक व मानवीय संसाधनों से भरपूर एशिया पर आर्थिक नियंत्रण यूरोपीय और अमेरिकी प्रभुत्‍व का रहा है और अभी भी है। कितनी अजीब है कि एशियाई देशों को यूरोप और अमेरिकी नेतृत्‍व तो स्‍वीकार है लेकिन एशियाई नहीं। एशियाई देशों को चाहिए वह अपना नेतृत्व विकसित करे, जो एशिया को वैश्विक नेतृत्व के लायक बना सके।

Next Story