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विष्णु गुप्त का लेख : सुडान में जीत गया लोकतंत्र

सूडान का दुर्भाग्य आज से तीस साल पूर्व शुरू हुआ था। 1989 में तख्तापलट के बाद उमर अल बशीर ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। वह घोर इस्लामिक मानसिकता का परिचायक था और इस्लामिक जिहाद से प्रेरित था।

विष्णु गुप्त का लेख : सुडान में जीत गया लोकतंत्र
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सूडान के प्रधानमंत्री (फाइल फोटो)

विष्णु गुप्त

एक रक्तरंजित अवधारणा के विध्वंस होने की खुशी मनाई जानी चाहिए। यह संदेश उस छोटे से देश से निकला है जो वर्षो से हिंसा से त्रस्त था, गृहयुद्ध झेल रहा था और जहां पर हजारों-हजार बच्चियां हर साल बुराई के कारण दम तोड़ दिया करती थी। वह देश सूडान है। सूडान एक अफ्रीकी देश है। सूडान उन अफ्रीकी देशों में शामिल है जहां हिंसा, आतंकवाद और अमानवीय बर्बरता जारी थी। अभी-अभी सूडान की सरकार और विद्रोही गुटों में एक समझौता हुआ है। सूडान के प्रधानमंत्री अब्दुला हमदोक और सूहान पीपुल्स लिबरेशन मूवमेंट नार्थ विद्रोही गुट के नेता अब्दुल अजीज अल हिलू की समझदारी से यह समझौता हो सका है। समझौते का आधार इस्लामिक शासन व्यवस्था की समाप्ति है। तीस सालों से चली आ रही बर्बर, अमानवीय और लोमहर्षक सत्ता का अंत होगा, एक लोकतंत्र का उदय होगा? जैसा लोकतंत्र ईरान में है, जैसा लोकतंत्र पाकिस्तान में है, जैसा लोकतंत्र तुर्की में है वैसा लोकतंत्र नहीं होगा। ईरान, तुर्की, पाकिस्तान आदि देशों के फर्जीवाड़े के कारण ही रक्तरंजित मानसिकताएं संरक्षित होती हैं और दुनिया की शांति को लहूलुहान करती है। सूडान का लोकतंत्र भारत की तरह होगा, सूडान का लोकतंत्र ब्रिटेन की तरह होगा, सूडान का लोकतंत्र गृहयु़द्धों में फंसे अन्य अफ्रीकी मुस्लिम देशों के बीच एक आईकाॅन की तरह होगा?

सूडान का दुर्भाग्य आज से तीस साल पूर्व शुरू हुआ था। 1989 में तख्तापलट के बाद उमर अल बशीर ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। वह घोर इस्लामिक मानसिकता का परिचायक था और इस्लामिक जिहाद से प्रेरित था। उसने सत्ता पर कब्जा करने के साथ ही साथ उदार कानूनों को समाप्त कर दिया और घोर बर्बर, लोमहर्षक और अमानवीय कानूनों को लाद दिया। कई हजार ईसाइयों को बलपूर्वक मुस्लिम बनाया गया। जिन्होंने विरोध किया उनकी हत्या कर दी गई। यही कारण है कि सूडान में मात्र तीन प्रतिशत ही गैर मुस्लिम बचे हैं। उमर अल बशीर ने यह भी कानून बना दिया था कि जो एक बार भी मुसलमान बन गया वह फिर धर्म नहीं बदल सकता है। इस बर्बर और अमानवीय कानून का प्रयोग भी खूब हुआ।

इस शासन व्यवस्था की सबसे बड़ी कीमत अबोध बच्चियों ने चुकाई। खतना अनिवार्य कर दिया गया था। महिला अधिकारों को गुलाम बनाकर रख दिया गया। अब नए लोकतांत्रिक शासन में बच्चियों के खतना पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। सूडान की सरकार और विद्रोहियों के बीच हुए समझौते के अनुसार बच्चियों के खतना पर प्रतिबंध को कड़ाई के साथ लागू करने पर बल दिया गया है। इसके लिए सजा की भी व्यवस्था होगी। खतना के लिए जो डाॅक्टर, जो नर्स और जो नाई पकड़े जाएंगे उन्हें तीन साल तक की कठोर जेल होगी और उनके लाइसेंस को जब्त कर लिया जाएगा। बच्चियों को खतना के लिए मजबूर करने वाले माता-पिता को भी दंडित करने का प्रावधान कानून में किया जाएगा। इसके लिए व्यवस्था की जा रही है ताकि ये कुप्रथा जड1 से खत्म की जा सके। खतना पर प्रतिबंध से सूडान में प्रतिवर्ष हजारों मुस्लिम बच्चियों की जान बचेगी। इसके अलावा महिलाएं अब घर के पुरूषों के बिना भी सामूहिक स्थलों पर जाने के लिए स्वतंत्र होगी। वे ऐसा करने को स्वतंत्र नहीं थी। उन्हें घर से बाहर निकलने के लिए किसी पुरुष को साथ लेकर ही चलना पड़ता था।

सूडान ही क्यों बल्कि अरब और अफ्रीका महादेश के दर्जनों देश इस्लामिक शासन व्यवस्था के दंश को झेलने के लिए विवश हैं, अधिकतर देशों में गृहयुद्ध की स्थिति है। एक मुस्लिम आतंकवादी संगठन अपने इस्लाम की मान्यताओं को स्थापित कराने के लिए दूसरे मुस्लिम आतंकवादी संगठनों के समर्थकों को गाजर मूली की तरह काटता है। ऐसी स्थिति सूडान के साथ ही साथ नाइजीरिया, इथोपिया, इराक, सीरिया आदि देशों में आसानी से देखी जा सकता है। इसके अलावा अरब के कुछ देशों जैसे लेबनान, अफ्रीका महादेश के दर्जनों देशों में मुसलमानाें और ईसाइयों के बीच गृहयुद्ध जारी है। इसमें ईसाई एक पीडि़त है। लाखों इसाइयों को मुस्लिम बनने के लिए बाध्य होना पडा था। इसी पर आधारित एक फिल्म यूनोसेंट आफ मुस्लिम्स ने दुनिया भर में तहलका मचाया था। इस फिल्म के खिलाफ अरब और अफ्रीका मे मुस्लिम आतंकवादी संगठनों ने बहुत बड़ी और रक्तरंजित प्रतिक्रिया दी थी। फिल्म को प्रतिबंधित करने की मांग की गई थी।

अब दुनिया को सूडान के प्रस्तावित लोकतंत्र को मुस्लिम देशों के लिए एक आईकाॅन शासन प्रणाली के तौर पर प्रस्तुत करना चाहिए, प्रोत्साहित करना चाहिए। इस्लामिक शासन व्यवस्था पर लोकतंत्र की स्थापना से ही मुस्लिम आतंकवाद और घृणा पर विजयी हासिल हो सकती है। हमें इस बर्बर, लोमहर्षक, अमानवीय इस्लामिक शासन के पतन और नए लोकतंत्र की स्थापना पर खुशी मनाना ही चाहिए। उम्मीद भी यही है कि अन्य अर्फीकी और अरब के देश भी सूडान के प्रस्तावित लोकतंत्र का स्वागत करेंगे। लोकतांत्रिक होने पर ही अरब और अफ्रीकी देशों की समृद्धि संभव होगी। तानाशाही या फिर कट्टरपंथ में विकास की उम्मीद बेमानी है।

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