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विष्णुगुप्त का लेख : लोकतंत्र का जिंदा रहना आवश्यक

नेपाल के उदाहरण से स्पष्ट है कि कम्युनिस्ट लोकतंत्र की सरकार हिंसाविहीन नहीं चला सकते। चीन और सोवियत संघ के उदाहरण हैं। नेपाल में भी कम्युनिस्टों और माओवादियों ने लोकतंत्र का हरण करने के काफी प्रयास किए हैं, पर उन्हें असफलता ही हाथ लगी है। मध्यावधि चुनाव सीधे तौर पर लोकतंत्र की असफलता की कहानी कहते हैं। नेपाल में राजशाही की वापसी की मांग भी जोर पकड़ रही है। राजशाही अच्छी शासन प्रक्रिया नहीं है। लोकतंत्र ही नेपाल को विकास के मार्ग पर ले जाएगा, लेकिन ओली जैसे नेता लोकतंत्र को इसी तरह रौंदते रहेगे तो अन्य जनशक्ति हासिल करती रहेगी। फिर भी हर परिस्थति में नेपाल में लोकतंत्र जिंदा रहना चाहिए।

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केपी शर्मा ओली

विष्णुगुप्त

मध्यावधि चुनाव की पहली आधारशिला बहुमत का अभाव होता है। इस कसौटी पर नेपाल को मध्यावधि में धकेल देना असंवैधानिक तो है ही, लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था की कसौटी पर भी गैर जरूरी राजनीतिक प्रक्रिया है। सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के पास पूर्ण बहुमत था। सिर्फ प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के पास समर्थन और अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए संसदीय शक्ति का अभाव था। प्रधानमंत्री पद पर बैठे केपी शर्मा ओली की व्यक्तिगत राजनीतिक इच्छाएं पूरी नहीं हो पा रही थी, उनकी पार्टी ही उनके खिलाफ थी, पार्टी के अंदर भी उनका समर्थन नहीं था, ऐसे में पार्टी उन पर लगातार दबाब बना रही थी और इस्तीफा भी मांग रही थी। तात्कालिक कारण उनका वह अध्यादेश था, जिसके खिलाफ उनकी पार्टी ही बगावत की स्थिति में खड़ी थी, विपक्ष ने तो उस अध्यादेश को संविधान और लोकतंत्र विरोधी घोषित कर रखा था। ओली ने ऐसे अध्यादेश को राष्ट्रपति से स्वीकृति दिलाई थी जो लोकतंत्र विरोधी था और ओली को ऐसा अधिकार मिल गया था जिससे संवैधानिक पदों पर अपनी इच्छानुसार मोहरों का पदास्थापन कर सकें। उनकी पार्टी और विपक्ष एक स्वर में उक्त अध्यादेश की वापसी की मांग कर रहे थे। संसद में इस अध्यादेश का शक्ति परीक्षण होने वाला था। शक्ति परीक्षण होता तो निश्चित ही ओली की हार होती। जब ओली ने देखा कि संसद के अंदर उनके अध्यादेश काे समर्थन मिलना मुश्किल है, तब उन्होंने संसद को भंग कर मध्यावधि चुनाव में जाना ही महत्वाकांक्षा के लिए जरूरी समझा।

अतिवाद हितैषी नहीं होता है। प्रधानमंत्री के तौर पर ओली अतिवादी हो गए थे। चीन के पक्ष में उन्होंने अतिवाद दिखाया, चीन का मोहरा बन गए, चीन के हाथों नेपाल की विरासत के साथ खिलवाड़ करवाया, चीन के कहने पर भारत विरोधी का अभियान चलाया। चीन को खुश करने के लिए अपनी पार्टी और अपने नेताओं को हाशिये पर भेज दिया। फलस्वरूप वे घर के रहे न घाट के। पार्टी के साथ ही आम जनता के बीच भी अलोकप्रिय हो गए, नेपाल के भविष्य को चौपट करने के नेता के तौर पर कुख्यात हो गए।

मध्यावधि चुनाव को लेकर नेपाल में विवाद गहराना ही था, लोकतंत्र की स्थिरता पर प्रश्नचिह्न खड़ा ही होना था, अर्थव्यवस्था की कसौटी पर उफान उत्पन्न होना ही था। विवाद इस विषय को लेकर है कि एक ऐसे प्रधानमंत्री को जिनके पास अपनी पार्टी के अंदर ही समर्थन नहीं है, वह क्या संसद को भंग कर मध्यावधि चुनाव की घोषणा करवा सकता है, क्या राष्ट्रपति को संसद भंग करने और मध्यावधि चुनाव कराने के अधिकार हैं? इसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट मे कई चुनावी याचिकाएं दायर हो चुकी हैं। याचिकाओं में नेपाल को मध्यावधि चुनाव में धकेलने को लेकर प्रश्न खड़े किए गए हैं। लोकंतत्र में संविधान ही सर्वश्रेष्ठ होता है, मध्यावधि चुनाव से लेकर शासन और प्रशासन की सभी प्रक्रियाएं भी संविधानगत ही होती है। अब यहां यह प्रश्न खड़ा होता है कि मध्यावधि को लेकर संविधान की दृष्टि क्या है। क्या संविधान मध्यावधि चुनाव की स्वीकृति प्रदान करता है? क्या संविधान अल्पमत के प्रधानमंत्री की सिफारिश को सीधे स्वीकार करने की अनुमति प्रदान करता है? जहां तक संविधान की बात है तो लोकतंत्र को हतोत्साहित ही करता है। मध्यावधि चुनाव को लेकर नेपाल का संविधान खामोश है। जब संविधान मध्यावधि चुनाव को लेकर खामोश्ा है तब राष्ट्रपति को अपने विवेक से काम लेना चाहिए था। अन्य विकल्पों पर भी विचार करना चाहिए था। किसी अन्य नेता या फिर किसी अन्य दल को सरकार बनाने का अवसर दिया जाना चाहिए था। यदि ऐसा किया होता तो मध्यावधि चुनाव से बचा जा सकता था। माओवादी नेता प्रचंड स्थायी सरकार बना सकते थे। प्रचंड इसके लिए सक्रिय भी थे। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी सक्रिय सरकार देने के लिए तैयार बैठी थी।

कहा तो यह जा रहा है कि नेपाल के राष्ट्रपति और ओली के बीच इस मामले में जुगलबंदी रही है। नेपाल के वर्तमान राष्ट्रपति ने स्वयं के बल पर नहीं बल्कि ओली की कृपा पर राष्ट्रपति की कुर्सी हासिल की थी, इसलिए राष्ट्रपति ने संसद भंग कर मध्यावधि चुनाव की घोषणा करते समय अन्य विकल्पों पर ध्यान ही नहीं दिया।

नेपाल का वर्तमान राजनीतिक गतिरोध लोकतंत्र के लिए हानिकारक साबित होने वाला है। अभी-अभी तो नेपाल में लोकतंत्र का अंकुर फूटा था। बाल्यावस्था में ही लोकतंत्र की हत्या हो गई। यह हत्या व्यक्तिगत अहंकार और अति महत्वाकांक्षा से हुई है। माओवादी हिंसा का लंबा इतिहास रहा है। माओवादी हिंसा कभी नेपाल की राजशाही पर कब्जा करने के लिए तत्पर थी। उस काल में भारत ने राजशाही सेना को मदद की थी, सेना को हथियार देने के साथ ही साथ लड़ने का प्रशिक्षण भी दिया था। अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण राजशाही को झुकना पड़ा, माओवादी भी झुके। माओवादियों और अन्य कम्युनिस्टों ने मिलकर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी बनाई थी। पिछले संसदीय चुनावों में माओवादियों और कम्युनिस्टों के गठबंधन को सत्ता मिली थी। पुराने कम्युनिस्ट नेता केपी शर्मा ओली को प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला था। माओवादियों और कम्युनिस्टों को नेपाल में सत्ता इसलिए मिली थी कि लोकतांत्रिक राजनीतिक धारा का प्रतिनिधित्व करने वाली नेपाली कांग्रेस खुद अलोकप्रिय हो गई थी, उनके अंदर भी अहंकार,अराजकता की लड़ाई तेज थी। ऐसी स्थिति में नेपाल की जनता के पास माओवादियों और कम्युनिस्टों को सत्ता सौंपने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था।

नेपाल के उदाहरण से स्पष्ट हो गया कि कम्युनिस्ट लोकतंत्र की सरकार कुशलता और हिंसाविहीन चला नहीं सकते हैं। चीन और सोवियत संघ की तानशाही इसके उदाहरण हैं। नेपाल में भी कम्युनिस्टों और माओवादियों ने लोकतंत्र का हरण करने और अपनी तानाशाही चलाने के काफी प्रयास किए हैं, पर उन्हें असफलता ही हाथ लगी है। मध्यावधि चुनाव सीधे तौर पर लोकतंत्र की असफलता की कहानी कहते हैं। नेपाल में राजशाही की वापसी की मांग भी जोर पकड़ रही है। राजशाही की मांग आश्चर्यजनक घटना मानी जा रही है। राजशाही भी कोई अच्छी शासन प्रक्रिया नहीं है। लोकतंत्र ही नेपाल को विकास के मार्ग पर ले जाएगा, लेकिन लोकतंत्र इसी तरह बार-बार पराजित होता रहेगा, केपी शर्मा ओली जैसे नेता अपने अहंकार में लोकतंत्र को इसी तरह रौंदते रहेगे तो फिर जनविरोधी अन्य राजनीतिक विचार प्रकियाएं भी जनशक्ति हासिल करती रहेंगी। फिर भी हर परिस्थति में नेपाल में लोकतंत्र जिंदा रहना चाहिए। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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