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लोकतंत्र को वोटतंत्र से बाहर निकालना जरूरी

हमने अब तक लोकतंत्र का मतलब वोट देने की अपनी भूमिका ही समझा।

लोकतंत्र को वोटतंत्र से बाहर निकालना जरूरी
अब तक की तमाम शासन प्रणालियों में से दुनिया की सबसे खूबसूरत शासन व्यवस्था 'लोकतंत्र' की सफलता व्यापक जनभागीदारी पर ही निर्भर है। लोकतंत्र की परिभाषा ही है कि यह जनता के लिए, जनता के द्वारा, जनता का शासन है। इसलिए इसमें जनता की जितनी अधिक भागीदारी होगी, यह शासन तंत्र उतना ही सफल होगा। लेकिन दुर्भाग्य से भारत में लोकतंत्र का यह रचनात्मक पक्ष उभर नहीं पाया। हमने अब तक लोकतंत्र का मतलब वोट देने की अपनी भूमिका ही समझा। राजनीतिक दलों ने ऐसी परिपाटी ही बना दी कि नागरिकों की भूमिका वोट देने तक सिमटती गई। जनता ने एक सरकार चुनी, अच्छा काम नहीं किया तो अगली बार बदल दी। एक तरह से हमारा लोकतंत्र राजनीतिक दलों और जनता के बीच पांच साल के कांट्रैक्ट में तब्दील होता गया।
इसका सबसे खराब परिणाम यह हुआ कि जनता वोट बैंक की मशीन बन गई और राजनीतिक पार्टियां सत्ता के सौदागर बन गईं। दोनों के बीच सत्ता के खेल होने लगे। इस खेल में लोकतंत्र के असल मायने हाशिए पर चले गए। इसमें जनभागीदारी की जगह ही नहीं रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय लोकतंत्र की इन खामियों को बेहतर तरीके से समझा है। इसलिए वे जनसंवाद पर अधिक जोर दे रहे हैं। जनता से सीधे संवाद का कोई भी मौका नहीं छोड़ रहे हैं, बल्कि नए मौके भी गढ़ते हैं। मंच के अच्छे वक्ता होने के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने रेडियो के जरिये 'मन की बात' कार्यक्रम शुरू कर जनता से सीधे संवाद का एक नया मंच तैयार किया। दो साल पहले पीएम ने लोगों से सीधा संपर्क स्थापित करने के लिए मायजीओवी वेबसाइट शुरू की।
इस वेबसाइट के जरिये पीएम नेट सेवी जनता से सीधा संवाद कर सकते हैं और जनता भी अपनी बात सीधे पीएम को कह सकती है। इसी कड़ी में उन्होंने बिटिश प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति की तर्ज पर 'टाउन हॉल' कार्यक्रम आयोजित कर जनता से सीधे संवाद का एक और नया मंच बनाया है। उन्होंने पीएमओ का एप भी लांच किया है। जिसे लोग सीधे मोबाइल पर डाउनलोड कर सकते हैं। जनसंवाद स्थापित करने की प्रधानमंत्री मोदी की सभी कोशिशें लोकतंत्र में जनभागीदारी बढ़ाने की पहल के रूप में देखी जा सकती हैं। किसी भारतीय प्रधानमंत्री के पहले टाउन हॉल कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी ने 'सीधी बात' के जरिये लोकतंत्र का महत्व, गुड गवर्नेंस, विकास, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे गंभीर विषयों पर बात कर जनता के सामने अपनी सरकार के स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत किए।
गोरक्षा के स्वयंभू ठेकेदारों को भी उन्होंने आईना दिखाया। उन्होंने लोकतंत्र में जनभागीदारी बढ़ाने की पैरवी कर जनता को जगाने का काम किया। उन्होंने ठीक ही कहा कि अगर लोकतंत्र को वोटिंग और सरकार चुनने तक ही सीमित कर दिया जाए तो फिर लोकतंत्र की भावना का विकास नहीं होगा। चुनाव जीतने के बाद प्राय: सरकारें यह सोचना शुरू कर देती हैं कि अगला चुनाव कैसे जीता जाए। अच्छे शासन के लिए मतदान ही काफी नहीं है। सरकार के भीतर और बाहर, हर व्यक्ति की जिम्मेदारी के साथ जवाबदेही भी होनी चाहिए। लोकतंत्र में बड़े बदलाव तभी संभव है जब जनता लगातार अपनी भागीदारी बनाए रखे। अपनी चुनी हुई सरकार के भरोसे सबकुछ नहीं छोड़े। लगातार निगरानी करे, सरकार को काम करने के लिए दबाव बनाए रखे।
यह भी सच है कि लोकतंत्र में अगर गुड गवर्नेंस पर ध्यान नहीं दिया गया तो फिर आम लोगों के रोजर्मरा के जीवन में बदलाव नहीं आएगा। विकास और गुड गवर्नेंस के बीच संतुलित संबंध होना चाहिए। भारत को दुनिया में आर्थिक महाशक्ति बनाने के लिए भी पीएम ने कहा कि अगर हम 30 साल तक 8 फीसदी की दर से विकास करते रहे तो हम दुनिया में टॉप पर होंगे। निश्चित ही मोदी के इन प्रयासों से लोकतंत्र 'वोट बैंक' की जकड़न से बाहर निकलेगा और विकासपरक शासन व्यवस्था का अपना असल मकसद हासिल करेगा।
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