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Delhi Violence : इस आग को रोकना ही होगा

एक व्यक्ति सरेआम गोलियां चला रहा है। सुनियोजित साजिश के बिना इतने व्यापक पैमाने पर हिंसा नहीं हो सकती। हालांकि स्थिति बिगाड़ने के संकेत 22 फरवरी से ही मिलने लगे थे। जिस ढंग से देखते-देखते कई सड़कों पर धरना-प्रदर्शन कर शाहीनबाग का विस्तार किया गया वह स्वतः स्फूर्त नहीं हो सकता। इसकी पूरी तैयारी की गई होगी।

Delhi Violence: दिल्ली हिंसा में अबतक 8 की मौत, एक पत्रकार को भी लगी गोलीउत्तर पूर्वी दिल्ली में हिंसा

राजधानी दिल्ली में हुई हिंसा डरावनी और चिंताजनक है। देश की राजधानी में दस लोग मौत के घाट उतार दिए जाएं, दर्जनों घायल हो जाएं तथा देखते-देखते वाहनों से लेकर घर, दूकानें, पेट्रोल पंप तक धू-धू कर जलने लगें यह कल्पना से परे है। एक सिपाही भी शहीद हो गए तथा पुलिस के बड़े अधिकारी घायल हुए हैं। इससे पता चलता है कि सांप्रदायिक-हिंसक तत्वों के हमले कितने घातक और शक्तिशाली होंगे। जो कुछ टीवी चैनलों पर दिखा उस पर विश्वास करना कठिन है। एक व्यक्ति सरेआम गोलियां चला रहा है। सुनियोजित साजिश के बिना इतने व्यापक पैमाने पर हिंसा नहीं हो सकती। हालांकि स्थिति बिगाड़ने के संकेत 22 फरवरी से ही मिलने लगे थे। जिस ढंग से देखते-देखते कई सड़कों पर धरना-प्रदर्शन कर शाहीनबाग का विस्तार किया गया वह स्वतः स्फूर्त नहीं हो सकता। इसकी पूरी तैयारी की गई होगी।

जाफराबाद में जब सड़क को घेरकर धरना आरंभ किया गया उसी से साफ हो गया था कि जगह-जगह शाहीनबाग पैदा करना केवल भाषण तक सीमित नहीं था। जब एक समूह ने इसके विरोध में मौजपुर में धरना दिया तो उस पर पथराव किया गया और वहीं से स्थिति बिगड़ने लगी। इसमें इतना तो साफ है कि शाहीनबाग से दिल्ली पुलिस को सबक लेकर जिस तरह के पूर्वोपाय करना चाहिए था। पुलिस की तैनाती भी हुई, लेकिन जाफराबाद शाहीनबाग में न बदले इसके लिए कदम नहीं उठाया गया। तो शाहीनबाग की तरह ही पुलिस की विफलता स्पष्ट है।

एक जगह उनको कड़ाई से न रोक पाने के कारण साजिशकर्ताओं का मनोबल बढ़ा और पूरे उत्तर पूर्व दिल्ली में इस तरह के दृश्य पैदा होने लगे। 23 फरवरी को मौजपुर में पैदा तनाव से ही आशंका बढ़ने लगी थी कि स्थिति कभी भी नियंत्रण से बाहर हो सकती है। कुछ लोग धरना देने वालों की भीड़ में शामिल होकर उकसा रहे थे तो कुछ अपनी योजना से हिंसा में संलिप्त थे। आखिर इतनी संख्या मंें लोग पत्थरबाजी कैसे करने लगे? हमने इस तरह की पत्थरबाजी के दृश्य कश्मीर में देखे थे। दिल्ली की सड़कें बता रही हैं कि कश्मीर दोहराने की पूरी कोशिश हुई। कुछ बातें तो पहले से ही सामने हैं। एक समूह नागरिकता संशोधन कानून, एनपीआर तथा एनआरसी के नाम पर झूठ और गलतफहमी से मुसलमानों के अंदर भय पैदा करने तथा उसे उकसाने में सफल हो चुका है। यह तथ्य बार-बार स्पष्ट किया जा चुका है कि नागरिकता कानून से भारत के नागरिकों का कोई संबंध नहीं है। एनआरसी पर अभी औपचारिक फैसला नहीं हुआ है। अगर कल फैसला हुआ और उसमें कोई आपत्तिजनक या अस्वीकार्य पहलू होगा तो उसका विरोध किया जाएगा। जो अभी है ही नहीं उसका विरोध करने का कारण क्या हो सकता है?

यह प्रश्न और ये सब तथ्य उनके लिए मायने रखते हैं जिनका उद्देश्य सच समझना हो। जिनका उद्देश्य सरकार के विरुद्ध पूरे समुदाय को भड़काकर स्थिति बिगाड़नी हो उनके लिए इनका कोई अर्थ नहीं है। अब जो समझ में आ रहा है वह यही कि उच्चतम न्यायालय द्वारा शाहीनबाग धरने को निर्धारित जगह पर अयोजित करने के लिए वार्ताकार नियुक्त किए जाने के साथ ही इसकी तैयारी आरंभ हो गई कि अनेक जगहों पर शाहीनबाग सदृश स्थिति पैदा कर दी जाएं। जो लोग कानून और व्यवस्था की समस्या पैदा कर सरकार को बदनाम करने की फिराक में थे उनके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा भी बड़ा अवसर था। इसमें दोनों तरह की शक्तियां थीं। एक वो जो धरना-प्रदर्शन से ही स्थिति को बिगाड़ देना चाहते थे तथा दूसरे वे जो हिंसा द्वारा ऐसा करने की तैयारी में थे। वे चाहते थे कि किसी तरह दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश तक स्थिति इतनी बिगाड़ दी जाए जिससे ट्रंप की नजर तो जाए ही, अंतरराष्ट्रीय मीडिया के फोकस में भी विरोध आ जाए। अलीगढ़ में अशांति पैदा करने की कोशिशें विफल कर दी गईं। किंतु दिल्ली में ऐसा नहीं हो सका।

यह समझने की आवश्यकता है कि शाहीनबाग का जो धरना सामने दिख रहा है उसके पीछे कई प्रकार के शरारती दिमाग और खतरनाक विचार हैं। पूरे देश ने वो वीडियो देखा जिसमें उच्चतम न्यायालय द्वारा वार्ताकार नियुक्त किए जाने के साथ तीस्ता सीतलवाड अपने साथियों के साथ वहां महिलाओं को प्रशिक्षण दे रही थीं। उस वीडियो ने शाहीनबाग के पीछे छिपे एक श्रेणी के चेहरे को तो उजागर कर दिया था। यह सीधे-सीधे वार्ताकारों को विफल करने की साजिश थी। उच्चतम न्यायालय ने भी शाहीनबाग खाली करने का आदेश देने की जगह पता नहीं वार्ताकार क्यों नियुक्त किया। इससे इन सांप्रदायिक-समाजद्रोही तत्वों का हौंसला बढ़ा। उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के पूर्व शाहीनबाग में उपस्थिति काफी कम हो गई थी। उसी समय से साजिशकर्ता लग गए होंगे कि किसी तरह स्थिति को बिगाड़ो नहीं तो पूरी मेहनत पर पानी फिर जाएगा।

इस तरह तत्काल वो अपनी साजिश में कुछ हद तक सफल हो गए हैं। जो लोग अभी भी नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के नाम पर हो रहे विरोध को संविधान बचाने से लेकर लोकतांत्रिक बता रहे हैं उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि अब क्या होगा जिसके बाद आपका भ्रम टूटेगा? अगर संविधान बचाने का विचार हो तो इसके संवैधानिक-गैर संवैधानिक होने का फैसला न्यायालय पर छोड़ा जाना चाहिए था, लेकिन जब उद्देश्य खतरनाक हो तो ये क्यों ऐसा करेंगे? इनको केवल आग लगाना और उसका विस्तार करना है ताकि केन्द्र सरकार के लिए विकट स्थिति पैदा हो जाए। इस आग को रोकना है तो तथाकथित मानवाधिकारवादियों तथा मीडिया के एक वर्ग की निंदा का जोखिम उठाते हुए भी र्कारवाई करनी होगी। दिल्ली पुलिस ने अभी तक अपना इकबाल नहीं दिखाया है। सड़क घेरना गैर कानूनी है और पुलिस को पूरा अधिकार इसके खिलाफ कार्रवाई करने का है। अगर दिल्ली को संभालना है तो फिर पुलिस प्रशासन को अपनी भूमिका कठोरता से निभानी होगी।

किंतु हमें यह भी समझना होगा कि जिस तरह का माहौल निर्मित किया किया जा चुका है और बल प्रयोग न करने से इनका मनोबल जितना बढ़ा है, उनका समाधान केवल पुलिस कार्रवाई नहीं हो सकती। यह एक वैचारिक संघर्ष में परिणत हो चुका है। आपने कई भाषण सुने होंगे जिनमें कहा जा रहा है कि तीन तलाक के खिलाफ कानून बना और हम चुप रहे, धारा 370 हट गया फिर भी हमने कुछ नहीं किया, अयोध्या का फैसला आ गया और हम खामोश बैठे रहे, अब नागरिकता कानून बन गया आगे एनआरसी होगा, फिर कुछ होगा। इस तरह मुसलमानों को यह समझाया जा रहा है कि वर्तमान सरकार उनकी विरोधी है। खतरनाक झूठ फैला दिया जाए तो अलग-अलग तरह के तत्व अपने-अपने तरीके से विरोध करने लगते हैं। इसका सामना करने के लिए समाज को आगे आना होगा। धरना और विरोध प्रदर्शनों के विरोध में अहिंसक तरीके से जितना प्रचंड धरना-प्रदर्शन हो आयोजित होना चाहिए। झूठ और षड्यंत्र को खत्म करने का उपयुक्त रास्ता प्रदर्शनों और प्रचारों द्वारा सच को प्रभावी तरीके से रखना है। अगर शाहीनबाग के विरोध में अहिंसक तरीके से बड़े धरने आयोजित होते तो स्थिति दूसरी होती।

(वरिष्ठ लेखक अवधेश कुमार की कलम से)

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