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चिंतन: अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने की कहावत सिद्ध

पहली बार अरविंद केजरीवाल को रामलीला मैदान में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और क्या घोषणाएं की गई थीं।

चिंतन: अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने की कहावत सिद्ध
बहुतों को याद होगा। जब पहली बार अरविंद केजरीवाल को रामलीला मैदान में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जाना था, तब वह अपने कुछ साथियों के संग मेट्रो की सवारी करते हुए पहुंचे थे। उनके कुछ दूसरे साथी थ्रीव्हीलर और रिक्शा वगैरा से रामलीला मैदान तक गए थे। बहुत बड़ी बड़ी घोषणाएं की गई थीं। जैसे, वे आम आदमी के प्रतिनिधि हैं। आम आदमी की तरह ही रहेंगे। दिल्ली को वीआईपी संस्कृति से मुक्त कर देंगे। किसी तरह की सुरक्षा नहीं लेंगे। गाड़ियों का काफिला भी साथ नहीं चलने देंगे।
सरकारी गाड़ी और दूसरी सुविधाएं नहीं लेंगे। यह भी कहा गया था कि वे लंबा चौड़ा बंगला नहीं लेंगे, जैसा पूर्व के मुख्यमंत्री लेते रहे हैं। जनता के लिए सचिवालय खोल देने का ऐलान भी हुआ और यह दावा किया गया कि वह साफ सुथरी, भ्रष्टाचारमुक्त शासन देंगे। लेकिन यह सब अब अतीत की बातें हो गई हैं। मुख्यमंत्री केजरीवाल खुद सुरक्षा के पूरे ताम-झाम में चलते हैं। बड़े आवास में रहते हैं। सरकारी गाड़ी ले चुके हैं। उनके मंत्री भी सरकारी गाड़ी का उपयोग करते हैं।
बड़े सरकारी आवासों में रहते हैं। टीम अण्णा के समय वे कांग्रेस और दूसरे दलों के मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों की सार्वजनिक रूप से वे किस तरह लानत मनालत करते थे, सबकी स्मृतियों में आज भी ताजा है। फैसलों में पूरी तरह पारदर्शिता की बातें किया करते थे। सिस्टम के भ्रष्टाचार को जड़ मूल से खत्म करने के लिए जन लोकपाल लाने की बात भी होती थी परन्तु सबने देखा कि किस प्रकार वे और उनकी सरकार पूरी तरह ट्रैक से उतर गई। दिल्ली की जनता को तमाम तरह के सब्जबाग दिखाकर वे सत्ता में लौटे थे, वह भी 70 सदस्यीय विधानसभा में 67 विधायकों के ऐतिहासिक बहुमत के साथ।
तब लोगों को लगा था कि अब उन्हें फैसले लेने के लिए कांग्रेस या भाजपा का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा। थोड़ा वक्त गुजरते ही साफ हो गया कि वह बात बे बात केन्द्र की नरेन्द्र मोदी के साथ पंगे ले रहे हैं। सब जानते हैं कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है। उन्हें भी पता है कि दिल्ली केन्द्र के अधीन है और कोई भी अहम फैसला लेने से पहले केन्द्र की इजाजत लेना संवैधानिक बाध्यता है। केजरीवाल ने संविधान को परे रखते हुए नित नए फैसले लेने शुरू कर दिए।
उप राज्यपाल ने जब उन फैसलों को रद किया तो केजरीवाल ने सीधे प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप जड़ने शुरू कर दिए। 70 सदस्यीय विधानसभा में दस प्रतिशत विधायकों को ही मंत्री पद और सरकारी सुविधाएं दी जा सकती हैं परन्तु केजरीवाल ने मार्च 2015 में 21 विधायकों को सत्ता में शामिल करने के मकसद से संसदीय सचिव पद की शपथ दिलवा दी। नोटिफिकेशन जारी कर उनके रूम वगैरा भी तय कर दिए। संभवत: इसके बाद उन्हें गलती का अहसास हुआ तो तीन महीने बाद जून 2015 में विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर संसदीय सचिव के पद को नॉन प्रोफिट घोषित करते हुए विधेयक पारित कर दिया। लेफ्टिनेंट गर्वनर ने उस पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया।
उन्होंने उसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया। चूंकि यह असंवैधानिक तरीके से पारित किया गया और नियमों के खिलाफ जाकर 21 संसदीय सचिव बनाए गए, इसलिए राष्ट्रपति ने उसे खारिज कर दिया। इससे 21 विधायकों की सदस्यता पर ही तलवार लटक गई है। साफ है, आम आदमी पार्टी के 21 विधायकों की सदस्यता जाती है तो नए सिरे से 21 विस क्षेत्रों में चुनाव होंगे। ऐसे में लोगों को केजरीवाल की लोकप्रियता के ग्राफ का अंदाजा भी हो जाएगा। चूंकि गलती खुद केजरीवाल की है इसलिए उससे ध्यान हटाने के मकसद से वह फिर मोदी पर हमला करके पुरानी टैक्टिस अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। जो कुछ हुआ है, वह ऐसे ही है, जैसे कोई अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी का प्रहार कर बैठे।
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