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महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं सपनों की दिल्ली

43 फीसदी महिलाएं असुरक्षा से परेशान होकर दिल्ली छोड़ना चाहती हैं।

महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं सपनों की दिल्ली
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नई दिल्‍ली. यह दुखद संयोग है कि जिस दिन दिल्ली हाईकोर्ट ने निर्भया कांड के चार दोषियों की मौत की सजा को बरकरार रखने का फैसला सुनाया, उसी दिन पीएचडी चैंबर ऑफ कॉर्मस एंड इंडस्ट्री के एक सर्वे में यह बात सामने आई की देश के अन्य राज्यों से दिल्ली जाकर काम कर रहीं 43 फीसदी महिलाएं असुरक्षा से परेशान होकर दिल्ली छोड़ना चाहती हैं। सर्वे में शामिल ज्यादातर महिलाओं का कहना है कि वे देर शाम या रात में काम नहीं करना चाहतीं, क्योंकि यातायात के साधनों, सार्वजनिक शौचालयों तथा सड़कों व गलियों में रोशनी की कमी जैसी समस्याओं ने उनमें असुरक्षा की भावना को बढ़ा दिया है।

16 दिसंबर, 2012 को दिल्ली के वसंत विहार में निर्भया के साथ हुई नृशंस घटना ने लोगों के रोंगटे खड़े कर दिए थे। हर ओर से दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग उठने लगी थी। अदालत ने भी घटना की बर्बरता को देख इसे दुर्लभ से दुर्लभतम की र्शेणी में रखा और एक नाबालिग दोषी को छोड़ बाकी दोषियों को फांसी की सजा सुनाई। कठोर सजा देने के पीछे तर्कयही था कि इससे समाज में कानून का खौफ पैदा होगा।

हालांकि गत एक वर्ष में महिलाओं के खिलाफ अपराध की घटनाओं में कोई कमी आती दिखाई नहीं दे रही है। देश की राजधानी दिल्ली में महिलाओं के मन में असुरक्षा की यह भावना क्षुब्ध करने वाली है। जब देश की राजधानी में ही सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है तो बाकी हिस्सों की क्या स्थिति होगी सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं।

यहां यह सवाल उठना भी लाजमी है कि आखिर क्या वजह है कि प्रशासन महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों-अत्याचारों पर अंकुश लगाने में कामयाबी नहीं हो पा रहा है। दिल्ली तो केंद्रशासित प्रदेश है और यहां कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी केंद्रीय गृह मंत्रालय की है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार राजधानी दिल्ली में दस लाख से अधिक मजदूर ऐसे हैं जो दूसरे प्रदेशों से आए हैं। इनमें भी यूपी, बिहार, झारखंड और बंगाल जैसे पिछड़े राज्यों के लोगों की तादाद ज्यादा है। वहीं इन राज्यों से आने वालों में पुरुषों के साथ-साथ बड़ी संख्या में कामकाजी महिलाएं और छात्राएं भी हैं।

बड़ी संख्या में छात्राएं विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं में पढ़ रही हैं। वहीं बड़ी संख्या में निरक्षर और पढ़ी लिखी महिलाएं घरों और निजी क्षेत्र में काम कर रही हैं। जहां आर्थिक शोषण और शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना आम बात है। महिलाओं के खिलाफ अपराध की कई र्शेणियां हैं मसलन आर्थिक, शारीरिक और नस्ली पूर्वाग्रह। हाल ही में एक सर्वे में कहा गया था कि दिल्ली में रहने वाली पूवरेत्तर राज्यों की 81 फीसदी महिलाओं को आए दिन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। वहीं 95 फीसदी विदेशों से आने वाली महिलाओं ने भी दिल्ली में भयानक आबोहवा को महसूस किया है।

आधी आबादी के प्रति देश की राजधानी की यह तस्वीर शर्मनाक है। बेहतर रोजगार और शिक्षा की उम्मीद में आई महिलाओं को सुरक्षित माहौल नहीं दे पाना सरकार व कानून-व्यवस्था की बड़ी नाकामी तो है ही साथ ही इसे गणतंत्र के रूप में एक देश की असफलता भी कही जाएगी, जिसने अपने नागरिकों को उसके मौलिक अधिकारों की रक्षा का वादा किया है।

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