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केजरीवाल को देना होगा इन बातों पर ध्यान, वरना खिसक जाएगी दिल्ली की कुर्सी

दिल्ली सरकार की अपनी मर्यादाओं को लेकर अक्सर केजरीवाल और उनके समर्थक यह आरोप लगाते रहे हैं कि दो करोड़ लोगों द्वारा चुनी गई सरकार को दरकिनार किया जा रहा है।

केजरीवाल को देना होगा इन बातों पर ध्यान, वरना खिसक जाएगी दिल्ली की कुर्सी

लोकतांत्रिक समाज की कई खूबियों के बीच एक खामी यह भी है कि रणनीतिक रूप से चतुर राजनेता और व्यक्ति चाहे तो वह नैरेटिव को ही बदल सकता है। हकीकत के उलट वह उस तथ्यहीन नए नैरेटिव को लोकप्रिय भी बना सकता है। दिल्ली में यही हो रहा है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की पूरी सरकार ने उपराज्यपाल के खिलाफ उनके ही घर में धरना दिया।

बहाना तो राज्य के अधिकारियों के न काम करने का था, लेकिन केजरीवाल सरकार यह संदेश देने में कामयाब रही है कि उसे काम नहीं करने दिया जा रहा है। वह यह भी संदेश देने में सफल रही है कि दिल्ली के करीब डेढ़ करोड़ निवासियों की किस्मत तभी बदली जा सकेगी, जब उसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जा सके।

दिल्ली सरकार की अपनी मर्यादाओं को लेकर अक्सर केजरीवाल और उनके समर्थक यह आरोप लगाते रहे हैं कि दो करोड़ लोगों द्वारा चुनी गई सरकार को दरकिनार किया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या दिल्ली का चुनाव लड़ते वक्त केजरीवाल और उनके सहयोगियों को पता नहीं था कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम 1991 के तहत दिल्ली सरकार के पास कितने अधिकार हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट भी अपने एक फैसले में जाहिर कर चुका है कि दिल्ली सरकार के बॉस उपराज्यपाल ही हैं। आम आदमी पार्टी के सत्ता में आने के बाद उपराज्यपाल और मोदी सरकार के खिलाफ जिस तरह हंगामा बरपता रहा है, उससे दिल्ली राज्य की स्थिति, मौजूदा सरकार के अधिकारों और उसकी असल ताकत को लेकर जनमानस में छाया कुहासा साफ होने की बजाय और गहरा ही हुआ है।

इसे लेकर दिल्ली विधानसभा के सचिव रहे सुदर्शन कुमार शर्मा ने सुचिंतित तरीके से दिल्ली सरकार की शक्तियां और सीमाएं नाम से किताब ही लिख दी। इस किताब के विमोचन के मौके पर दो तीन साल पहले लोकसभा के महासचिव सुभाष कश्यप ने अधिकारों को लेकर विवाद की दिल्ली के आसमान पर छाए दुर्योग के काले बादलों से तुलना की थी।

हकीकत तो यह है कि दिल्ली सरकार अपने अधिकारों की सही व्याख्या की बजाय 70 सदस्यीय विधानसभा में 67 सीटों पर जीत पर ज्यादा जोर दे रही है। केजरीवाल सरकार का आरोप है कि मोदी सरकार उपराज्यपाल के जरिए अपना एजेंडा थोप कर दिल्ली की जनता का अपमान कर रही है। ऐसा करते वक्त वह 69वें संविधान संशोधन अधिनियम,

जिसे व्यवहार में राष्ट्रीय राजधानी राज्य क्षेत्र शासन अधिनियम 1991 कहा जाता है, को नकार रही है। ऐसा करते वक्त संविधान के अनुच्छेद 239 कक और 239 कख को छोड़ दिया जा रहा है। जिसमें दिल्ली सरकार की व्यवस्था है। संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त और 239 कक के अधीन यथा पदाभिहीत दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्य क्षेत्र का उपराज्यपाल।

दिल्ली के अलावा दूसरे केंद्र शासित प्रदेश पुदुचेरी में ही विधानसभा है। उसकी भी शक्तियां सीमित हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर जब सीमित शक्तियां ही दी जानी थीं तो फिर विधानसभा का गठन ही क्यों किया गया। सुभाष कश्यप तर्क है कि विधानसभा और सीमित अधिकारों वाली सरकार का प्रावधान इसलिए किया गया,

ताकि दिल्ली में सक्रिय कुछ नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं संतुष्ट की जा सके, उन्हें मंत्री आदि जैसी सहूलियत देकर उनके राजनीतिक वजूद को स्वीकार किया जा सके। जब अंग्रेजों ने दिल्ली को राजधानी बनाया और इसका शासन अलग तरीके से चलाने का फैसला किया तो उसकी असल व्यवस्था चीफ कमिश्नर के हाथों में सौंप दी।

आजादी के बाद उसे भावी राज्य का दर्जा देने के लिए पट्टाभि सीतारमैया की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई। कमेटी इस नतीजे पर पहुंची कि राष्ट्रीय राजधानी के चलते दिल्ली को समूह ग वर्ग का राज्य रहने दिया जाए। 1953 में जब फजल अली आयोग बना और उसने 1955 में राज्यों के पुनर्गठन का सुझाव दिया तो दिल्ली की वह व्यवस्था बदल दी गई,

जिसके तहत 1952 में सीमित अधिकारों वाली विधानसभा दी गई थी और उसके तहत चौधरी ब्रह्म प्रकाश को मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के बाद दिल्ली की विधानसभा व्यवस्था नवंबर 1956 में वापस ले ली गई। फिर 1991 के अधिनियम में भी यही व्यवस्था लागू है।

इसी अधिनियम में एक व्यवस्था है कि संसद के कानून की राह में दिल्ली के कानून बाधा नहीं बनेंगे। इससे साफ है कि दिल्ली विधानसभा को राज्यसूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार भले ही हो, लेकिन उनमें भी संसद को सर्वोच्चता रहेगी। दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने की मांग को लेकर राजनीतिक दलों के अपने तर्क हैं।

जब 1993 में दिल्ली में विधानसभा अस्तित्व में आई और उसमें भाजपा को बहुमत मिला, मदनलाल खुराना की सरकार ने बाकायदा विधानसभा से पूर्ण राज्य का प्रस्ताव तक पारित करा दिया। तब केंद्र में कांग्रेस सरकार थी। ठीक पांच साल बाद जब केंद्र में भाजपा काबिज हुई, तब दिल्ली में कांग्रेस की सरकार बनी और पूर्ण राज्य की मांग को लेकर अपने-अपने तर्क जारी रहे।

2003 में एनडीए सरकार ने संसद में दिल्ली राज्य अधिनियम पेश तो किया। लेकिन इसे पारित होने के पहले ही लोकसभा भंग हो गई। इसके बाद पूर्ण राज्य को लेकर कोई कोशिश नहीं हुई।

केजरीवाल के धरने को समझने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का बयान मानीखेज है। उन्होंने कहा है, केजरीवाल संविधान बदलने की बात क्यों कर रहे हैं ये साफ़ समझ आ रहा है। हमने भी सरकार चलाई है, काम किया है, दिल्ली यूनियन टेरीटरी है, यहां काम कर पाने में अक्षम हैं वो।

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